कल से शुरू हो रही हैं नवरात्रि, प्रथम दिन घटस्थापना कैसे करें

अनेक परिवारों में यह व्रत कुलाचार के स्वरूप में किया जाता है। आश्विन की शुक्ल प्रतिपदा से इस व्रत का प्रारंभ होता है।घटस्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त का समय सबसे उत्तम माना गया है। 17 अक्टूबर को घटस्थापना करने का समय प्रात: 06 बजकर 23 मिनट 22 सेकेंड से प्रात: 10 बजकर 11 मिनट 54 सेकेंड तक है। नवरात्रि के प्रथम दिन सूर्य निकलने से पहले विस्तार का त्याग कर देना चाहिए और स्नान करने के बाद कलश स्थापना की क्रिया आरंभ करनी चाहिए।

प्रथम दिन घटस्थापना

नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना करते हैं। घटस्थापना करना अर्थात नवरात्रि की कालावधि में ब्रह्मांड में कार्यरत शक्तितत्त्व का घट में आवाहन कर उसे कार्यरत करना। कार्यरत शक्तितत्त्व के कारण वास्तु में विद्यमान कष्टदायक तरंगें समूल नष्ट हो जाती हैं। कलश में जल, पुष्प, दूर्वा, अक्षत, सुपारी एवं सिक्के डालते हैं।

घटस्थापना की विधि में देवी का षोडशोपचार पूजन किया जाता है । घटस्थापना की विधि के साथ कुछ विशेष उपचार भी किए जाते हैं । पूजाविधि के आरंभ में आचमन, प्राणायाम, देश काल कथन करते हैं । तदुपरांत व्रत का संकल्प करते हैं । संकल्प के उपरांत श्री महागणपति पू्जन करते हैं । इस पूजन में महागणपति के प्रतीक स्वरूप नारियल रखते हैं । व्रतविधान में कोई बाधा न आए एवं पूजास्थल पर देवीतत्त्व अधिकाधिक मात्रा में आकृष्ट हो सकें इसलिए यह पूजन किया जाता है । श्री महागणपति पूजन के उपरांत आसनशुद्धि करते समय भूमिपर जल से त्रिकोण बनाते हैं। तदउपरांत उसपर पीढा रखते हैं। आसन शुद्धि के उपरांत शरीर शुद्धि के लिए षडन्यास किया जाता है। तत्पश्चात पूजा सामग्री की शुद्धि करते हैं ।

वेदी पर मिट्टी में बोए जानेवाले अनाज

नवरात्रि महोत्सव में कुलाचारानुसार घटस्थापना एवं मालाबंधन करें। खेत की मिट्टी लाकर दो पोर चौडा चौकोर स्थान बनाकर, उसमें पांच अथवा सात प्रकार के धान बोए जाते हैं । इसमें (पांच अथवा) सप्तधान्य रखें । जौ, गेहूं, तिल, मूंग, चेना, सांवां, चने सप्तधान्य हैं ।

कुछ स्थानोंपर जौ की अपेक्षा अलसीका, चावल की अपेक्षा सांवां का एवं कंगनी की अपेक्षा चने का उपयोग भी करते हैं । मिट्टी पृथ्वीतत्त्व का प्रतीक है । मिट्टी में सप्तधान के रूप में आप एवं तेज का अंश बोया जाता है ।

कलश में रखी गई वस्तुएंं
जल, गंध (चंदन का लेप), पुष्प, दूर्वा, अक्षत, सुपारी, पंचपल्लव, पंचरत्न व स्वर्णमुद्रा अथवा सिक्के आदि वस्तुएं मिट्टी अथवा तांबे के कलश में रखी जाती हैं ।

हमारे ऋषिमुनियोंने इन अध्यात्मशास्त्रीय तथ्यों का गहन अध्ययन कर हमें यह गूढ ज्ञान दिया । इससे उनकी महानता का भी बोध होता है । नवरात्रि में घटस्थापना के अंतर्गत वेदीपर मिट्टी में सात प्रकार के अनाज बोते हैं ।

सप्तधान एवं कलश (वरुण) स्थापना

सप्तधान एवं कलश (वरुण) स्थापना के वैदिक मंत्र यदि न आते हों, तो पुराणोक्त मंत्र का उच्चारण किया जा सकता है । यदि यह भी संभव न हो, तो उन वस्तुओं का नाम लेते हुए ‘समर्पयामि’ बोलते हुए नाममंत्र का विनियोग करें । माला इस प्रकार बांधें कि वह कलश में पहुंच सके

घटस्थापना का शास्त्र एवं महत्त्व
‘मिट्टी अथवा तांबे के कलश में पृथ्वीतत्त्वरूपी मिट्टी में सप्तधान के रूप में आप एवं तेज का अंश बोकर, उस बीज से प्रक्षेपित एवं बंद घट में उत्पन्न उष्ण ऊर्जा की सहायता से नाद निर्मिति करनेवाली तरंगों की ओर, अल्पावधि में ब्रह्मांड की तेजतत्त्वात्मक आदिशक्तिरूपी तरंगें आकृष्ट हो पाती हैं । मिट्टी के कलश में पृथ्वी की जडत्वदर्शकता के कारण आकृष्ट तरंगों को जडत्व प्राप्त होता है और उनके दीर्घकालतक उसी स्थानपर स्थित होने में सहायता मिलती है । तांबे के कलश के कारण इन तरंगों का वायुमंडल में वेग से ग्रहण एवं प्रक्षेपण होता है और संपूर्ण वास्तु मर्यादित काल के लिए लाभान्वित होती है । घटस्थापना के कारण शक्तितत्त्व की तेजरूपी रजतरंगें ब्रह्मांड में कार्यमान होती हैं, जिससे पूजक की सूक्ष्म-देह की शुद्धि होती है ।

संदर्भ – सनातन के ग्रंथ,
द्वारा- कु. कृतिका खत्री,
सनातन संस्था, दिल्ली

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