Surat में संपन्न हुआ राष्ट्रीय स्तर के ‘भारतीय वैज्ञानिक सम्मेलन’

Surat  के भारतीय वैज्ञानिक सम्मेलन  में ‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ की ओर से ‘परंपरागत भारतीय आचारों और आधुनिक आचारों की तुलना’ विषय पर शोधनिबंध प्रस्तुत

सूरत। आजकल हमारी आधुनिक भारतीय पीढी खुलकर पश्‍चिमी सभ्यता के आचारों का अंधानुकरण करती दिखाई देती है; उदा. जन्मदिन परंपरागत ढंग से न मनाकर, पाश्‍चात्य ढंग से मनाती है ।

जानकारी का अभाव तथा पाश्‍चात्य आचारों का अंधानुकरण होने के कारण अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों को परांगत भारतीय आचारों के पालन का महत्त्व वैज्ञानिक ढंग से नहीं समझा पाते । इसके लिए ‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ ने विविध आधुनिक उपकरणों की सहायता से ‘परंपरागत भारतीय आचारों का वैज्ञानिक आधार क्या है और क्या आधुनिक आचारों के स्थान पर परंपरागत आचारों का पालन आवश्यक है ?’ इस विषय में विस्तृत तथा गहन शोध किया है ।

इस शोध पर आधारित ‘परंपरागत भारतीय और आधुनिक आचारों की तुलना’ यह शोधनिबंध सूरत (गुजरात) के ‘समग्र विज्ञान शोध केंद्र’ में आयोजित ‘भारतीय तत्त्वज्ञ परिषद’ के राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया ।

इस शोधनिबंध को महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले ने लिखा है, जिसका यहां श्रीमती क्षिप्रा जुवेकर ने वाचन किया । इस शोधनिबंध के सहलेखक हैं, सद्गुरु (डॉ.) चारुदत्त पिंगले और श्रीमती क्षिप्रा जुवेकर । ५ से ७ जनवरी २०१८ तक चला यह तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन, ‘जीवन और जीने की समग्र पद्धति (Holistic way of life and living)’ विषय पर आधारित था ।

इस शोधनिबंध में शोध हेतु ‘पिप (पॉलीकॉन्ट्रास्ट इंटरफेरन्स फोटोग्राफी)’ की प्रभामंडल मापक तंत्र और ‘यू.टी.एस्. (युनिवर्सल थर्मो स्कॅनर)’ नामक ऊर्जामापी उपकरण तथा सूक्ष्म-परीक्षण का उपयोग किया गया था ।

इस शोध के अंतर्गत, ‘नववर्षदिन ३१ दिसंबरके स्थानपर चैत्रप्रतिपदाको मनाना’; महिलाआें की केशरचना के अंतर्गत ‘केश खुले छोडने के स्थान पर जूडा बनाना’, महिलाआें के वर्तमानमें प्रचलित ‘विचित्र बेलबूटोंवाले अलंकारों के स्थान पर परंपरागत सात्त्विक बेलबूटोंवाले अलंकार धारण करना’, ‘मांसाहार के स्थान पर शाकाहार करना’ तथा ‘काले रंग के स्थान पर श्‍वेत रंग के कपडे पहनना’, इन कुछ चुने हए आचारों से संबंधित शोध इस निबंध में प्रस्तुत किए गए । इस शोधनिबंधके माध्यमसे प्रभामंडल और ऊर्जा के स्तर पर उपर्युक्त ५ कृत्य ‘भारतीय पद्धति के अनुसार करने से होनेवाले लाभ’ तथा ‘पाश्‍चात्य पद्धतिके अनुसार करने से हानि’, इस विषयको विविध निरीक्षणोंके द्वारा समझाया गया ।

इस शोधनिबंधको अच्छा जनसमर्थन मिला । इस अवसर पर अलीगढ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय के प्रो. काजमी ने इस शोध-निबंध की प्रशंसा करते हुए कहा कि सबको आध्यात्मिक शिक्षा देना आवश्यक है ।

Surat में हुए इस सम्‍मेलन में शोधनिबंध पर नेपाल स्थित त्रिभुवन विश्‍वविद्यालय के डॉ. गोविंद शरण उपाध्याय ने भी इस विषयमें उत्सुकतापूर्वक संपूर्ण जानकारी प्राप्त की ।