‘नामदार’ के पास खेल के अपने नियम हैं, वह नफरत और स्‍नेह का प्रदर्शन उसी से तय करते हैं: प्रधानमंत्री

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीम एक इंटरव्यू में मौजूदा सियासी हालात और अगले आम चुनाव के मद्देनजर विपक्षी दलों के गठबंधन की कोशिशों समेत तमाम मुद्दों पर विस्तार से बात की। 2019 के लोकसभा चुनाव, असम विवाद, भीड़ की हिंसा, सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर लगाम, युवाओं की शिक्षा और रोजगार जैसे मसलों पर प्रधानमंत्री मोदी ने सवालों के जवाब दिए। एक तरफ जहां उन्होंने तमाम गंभीर मुद्दों पर चिंता जताई, वहीं सुधारों के प्रति आश्वस्त भी नजर आए।
पेश हैं प्रधानमंत्री से पूछे गए सवाल और उनके जवाब-
किन तीन बड़े मुद्दों को लेकर आप चुनावी अभियान शुरू करेंगे? 5 साल बाद क्या आप मानते हैं कि 2014 का प्रदर्शन दोहराएंगे? कितनी सीटें बीजेपी जीत सकती है और एनडीए की सीटों को लेकर आप क्या सोचते हैं ?
विकास, तेज विकास और सबके लिए विकास। जिन लोगों के पास दिखाने और बताने के लिए कुछ नहीं होता, वे नारों से लोगों को भ्रमित करने का प्रयास करते हैं। हमने पिछले 4 साल में कठोर मेहनत की है और मैं अपने विकास के ट्रैक रेकॉर्ड के आधार पर लोगों के बीच जाऊंगा। मैं आश्वस्त हूं कि मेरी पार्टी को जनता का स्नेह उसी तरह मिलेगा, जैसा 4 साल पहले हमें मिला था। निश्चित रूप से एनडीए पिछली बार की तुलना में ज्यादा सीटें हासिल करेगा और हम और बेहतर इतिहास बनाएंगे। लोग हमारे साथ हैं और हमें किसी बात का भय नहीं है।
विपक्ष आपके खिलाफ महागठबंधन की तैयारी कर रहा है। क्या आपको लगता है कि अगर सभी गैर एनडीए पार्टियां एक हो गईं, तो इससे बीजेपी की चुनावी संभावनाओं पर असर पड़ेगा ?
कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि हमारी सरकार के सत्ता में आने के बाद दुनिया की नजर में देश की छवि सुधरी है। महागठबंधन या चाहे जो नाम भी आप दें, यह निर्वाचक वर्ग का गठबंधन नहीं कर सकता है। देश की जनता ने राष्ट्रीय हितों को हमेशा ऊपर रखा है और मुझे भरोसा है कि वे इस चीज से किसी कीमत पर ऐसे किसी समूह से समझौता नहीं कर सकती, जो सत्ता में येन-केन प्रकारेण आने के लिए लालायित हों और एकमात्र एजेंडे पर चल रहे हों- मोदी हटाओ। महागठबंधन और कुछ नहीं केवल सियासी फितूर है। यह विचार 1979, 1990 और 1996 में भी विफल हो चुका है। 2014 में भी राजनीतिक पंडित विफल साबित हो चुके हैं।
एनडीए के कुछ धड़ों में बेचैनी देखने में आ रही है। शिवसेना ने अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट नहीं दिया और जेडीयू भी ऐसे बयान बीच-बीच में जारी कर देती है, जिससे विवाद खड़ा हो जाता है। आपकी प्रतिक्रिया ?
हाल में हुए राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव के जरिए उम्मीद है सारे संदेह दूर हो गए होंगे। हमारे विपक्षी जो बड़ी उम्मीदें पाले हुए हैं, उन्हें केवल निराशा ही हाथ लगने वाली है।
गोरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा का आपने पहले भी विरोध किया है और इसकी निंदा भी की है, लेकिन घटनाएं लगातार हो रही हैं और कुछ धड़े भड़काऊ बयान भी देते रहते हैं। ऐसी घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है? साथ ही, भीड़ की हिंसा भी लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में अल्पसंख्यक और पिछड़े समुदाय को आप अपने ‘सबका साथ, सबका विकास’ के साथ कैसे जोड़ पाएंगे ?
बेहद दुखद है कि ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। ऐसी एक भी घटना का देश में होना दुखद है और इसकी कड़े शब्दों में निंदा करने की जरूरत है। मेरी सरकार कानून का राज स्थापित करने और जीवन की सुरक्षा और स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए समर्पित है। इस मुद्दे पर किंचित मात्र भी संदेह नहीं होना चाहिए। इस मुद्दे पर हमारी सरकार ने राज्यों को स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं। मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि भीड़ की हिंसा एक अपराध है, भले ही इसके पीछे कोई भी उद्देश्य हो। कोई भी व्यक्ति, किसी भी हालात में, कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता और हिंसा नहीं कर सकता।
राज्य सरकारों को भीड़ की हिंसा पर लगाम कसने के लिए प्रभावी उपाय करने चाहिए और अपने नागरिकों की रक्षा करनी चाहिए, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति, समुदाय से आते हों। मैं यह भी उम्मीद करता हूं कि सरकार और सरकार के अंगों और राजनीतिक दलों की यह जिम्मेदारी है कि वे इस घृणित कार्य से लड़ें। इस मुद्दे पर नई सिफारिशें देने के लिए सरकार ने केंद्रीय गृह सचिव के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय समिति भी बनाई है। इसके अलावा, सरकार ने गृह मंत्री के नेतृत्व में मंत्रियों का समूह भी बनाया है, जो उच्च स्तरीय समितियों की सिफारिशों पर गौर करेगी।
सोशल मीडिया अफवाहें, प्रॉपेगैंडा और फर्जी खबरें फैलाने का जरिया बन गया है। आपकी सरकार ने इन प्लेटफॉर्मों को फर्जी खबरों पर नियंत्रण के लिए आदेश भी दे रखा है। क्या आप इसे एक नए सिरदर्द के तौर पर देख रहे हैं ?
डिजिटल सशक्तीकरण अपने साथ कुछ चुनौतियां भी लेकर आया है। सोशल मीडिया को किसी तरह की भौतिक सीमा में नहीं बांधा जा सकता। यह न केवल हमारे लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चुनौती हैं। सोशल मीडिया के दुरुपयोग के चलते बीते कुछ समय में दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हुई हैं, सरकार ने डिजिटल वर्ल्ड और सोशल मीडिया से जुड़े स्टेकहोल्डर्स से अपनी तरफ से प्रभावी कदम उठाने को कहा है। सरकार भी अपनी तरफ से प्रयास कर रही है और ऐसी उम्मीद है कि लोग भी अफवाहों और उनके बुरे नतीजों को लेकर सतर्क रहेंगे और किसी भी प्रकार के बहकावे में आने से बचेंगे।
नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी के मुद्दे पर तीखी और कड़वी राजनीति इस बीच देखी है। बीजेपी पर विभाजनकारी राजनीति के आरोप लग रहे हैं। आप क्या कहेंगे इस पर? साथ ही, नागरिकता से बेदखल 40 लाख लोगों के लिए क्या योजना है ?
अवैध शरणार्थियों को रोकने के लिए 1972 में इंदिरा-मुजीब समझौता हुआ था और उसके बाद 1985 में राजीव गांधी-AASU समझौता हुआ। कांग्रेस ने इसे भले ही स्वीकार कर लिया लेकिन इस पर विरोध होता रहा, वोट बैंक की राजनीति के चलते कांग्रेस ने इसे वास्तविकता में लागू करने से परहेज किया। कांग्रेस के पास राजनीतिक इच्छाशक्ति और साहस की कमी थी। एनआरसी प्रक्रिया पूरी करने का हमने देश के नागरिकों से वादा किया था। हमने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया है। यह प्रक्रिया जारी है और जो सूची जारी की गई है। वह केवल ड्राफ्ट लिस्ट है। जो इस मुद्दे पर विवाद खड़ा कर रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही है। हमारे विपक्षियों को भारत के प्रधान न्यायाधीश में भरोसा नहीं है और न ही वे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही प्रक्रिया पर ही विश्वास रखते हैं।
राफेल सौदे के बारे में कांग्रेस ने बार-बार सवाल उठाए हैं। वे दावा करते है कि तकनीकी विशेषताएं गोपनीय हैं, जिनका जिक्र नहीं किया जा सकता, लेकिन इसकी कीमत के बारे में बताया जा सकता है। क्या इस विवाद को खत्म करने का कोई रास्ता है ?
कांग्रेस पार्टी हमेशा अपने बोफोर्स भूत को उखाड़ फेंकने की कोशिश करती रही है इसलिए उसके नेता झूठ बोलने पर जोर देते हैं और फिर इसे दोहराते हैं और बिना किसी साक्ष्य के दोहराते हैं। उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीज के खिलाफ भी ऐसा किया। राफेल हमारी वायुसेना की परिचालन क्षमता के लिए जरूरी था, जिसे कांग्रेस ने उपेक्षित कर दिया था। यह दो सरकारों के बीच का समझौता है। यह एक ईमानदार और पारदर्शी सौदा है।
अविश्वास प्रस्ताव में मुख्य मुद्दा क्या था? राहुल गांधी के गले लगने के फैसले पर आप कैसे प्रतिक्रिया देंगे और कहेंगे कि वह नफरत की राजनीति में विश्वास नहीं करते ?
मैं खुद भी इस सवाल का जवाब ढूंढ रहा हूं। हमें उनसे पूछना चाहिए जो अविश्वास प्रस्ताव लाए। उनके पास न तो संख्याएं थीं, न ही मुद्दे थे। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह उनका अहंकार था कि वह अविश्वास प्रस्ताव लाए। आप सभी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि ‘नामदार’ के पास खेल के अपने नियम हैं। वे तय करते हैं कि कब, कैसे और कहां नफरत करें। वे यह भी तय करते हैं कि कब, कैसे और कहां स्नेह दिखाना है। हम ‘कामदार’ हैं, हमारे पास ऐसा कोई विशेषाधिकार नहीं है।
आपकी सरकार की विजय माल्या, नीरव मोदी और ललित मोदी जैसे फरार उद्योगपतियों के मामलों पर नजर है। आप उन्हें भारत में वापस लाने के लिए अपनी सरकार की संभावनाओं को कैसे रेट करते हैं ?
पिछली सरकार की नीतियों में लोगों के लिए उधार लेना और भागना आसान था। हमने आर्थिक भगोड़ा अपराध कानून को बनाया है। यह खासकर भगोड़ों को दबोचने के लिए बनाया गया है। मैं हमारी सरकार के स्टैंड की पुष्टि करना चाहता हूं कि कोई भी जो धोखाधड़ी से सार्वजनिक धन लेकर भागता है, उसे बचाया नहीं जाएगा।
पाकिस्तान में एक नई सरकार बनने जा रही है। क्या इससे आपके संबंधों में सुधार होगा? क्या आपको लगता है कि पाकिस्तान की नई सरकार के साथ पाक आर्मी से भी बातचीत करनी चाहिए ?
क्षेत्र में शांति और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए पड़ोसी देश से अच्छे संबंध सरकार का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है। इसके लिए हमने अपनी शुरुआत से ही कई प्रसिद्ध पहल की हैं। हाल में मैंने पाकिस्तान के आम चुनावों में पार्टी की सफलता पर इमरान खान को बधाई दी। हमें आशा है कि पाकिस्तान आतंक और हिंसा से मुक्त, सुरक्षित, स्थिर और समृद्ध क्षेत्र के लिए काम करेगा।
आपने 2022 तक न्यू इंडिया बनाने की बात कही थी। इसमें काफी शिक्षित और नवोन्मेषी समाज की जरूरत है, लेकिन उच्च शिक्षा में महज 26 के ग्रॉस एनरॉलमेंट रेशो और बेहद निचले शैक्षिक मानकों के बलबूते यह सपना कैसे पूरा कर पाएंगे? क्या यूजीसी और तमाम रेग्युलेटरी सिस्टम उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा दे पाने में विफल नहीं हुए हैं?
न्यू इंडिया को लेकर मेरा लक्ष्य यह है कि हर युवा को उसकी पसंद के मुताबिक उच्च शिक्षा हासिल हो, वह अपना कौशल विकास करे और उसे राष्ट्र निर्माण में इस्तेमाल करे। हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था में विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाले प्रमुख संस्थान जैसे आईआईटी या आईआईएससी ही आते हैं, जबकि बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान भी हैं, जिनकी गुणवत्ता दोयम दर्जे की है और उनमें सुधार की जरूरत है। हम ‘साधारण के नियंत्रण’ की बजाय ‘उत्कृष्टता को स्वायत्तता’ में भरोसा करते हैं। कॉलेजों से पढ़कर निकलते युवाओं की उम्मीदों और आकांक्षाओं को मैं महसूस कर सकता हूं, इसलिए हमने शिक्षा व्यवस्था में सुधार का बीड़ा उठाया है। हमें एक ऐसे सिस्टम की जरूरत है जो सबकी पहुंच में हो, उसका खर्च वहन किया जा सके, समानता पर आधारित हो और उत्कृष्ट हो। इसके लिए प्राइवेट सेक्टर, पब्लिक सेक्टर, राज्य सरकार, केंद्र सरकार, उद्योग और शिक्षा जगत से जुड़े लोगों को साथ मिलकर काम करना होगा और सभी का लक्ष्य एक हो कि हमें अपने शिक्षा के मंदिरों को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ जगह बनानी है। संस्थान खड़े करने वाले उद्यमियों के लिए हमें उचित माहौल प्रदान करना होगा और अच्छे मानक बनाने होंगे। जब हम सत्ता में आए, तो रेग्युलेटरी सिस्टम लाल फीताशाही, शोषण, भ्रष्टाचार में जकड़ा हुआ था। हमने इसे बदलना शुरू किया।
अच्छा प्रदर्शन करने वाली यूनिवर्सिटीज को ग्रेडेड ऑटोनॉमी दी गई। ये संस्थान अपने पाठ्यक्रम खुद तय कर सकते हैं, बाजार की जरूरत के मुताबिक सिलेबस बदल सकते हैं और खुद ही परीक्षाएं आयोजित कर सकते हैं। संक्षेप में, इनको यूजीसी से मुक्त कर उत्कृष्टता की राह पर आगे बढ़ाया गया। आईआईएम को पूरी आजादी दी गई। 600 से अधिक कॉलेजों को यूनिवर्सिटीज के नियंत्रण से अलग किया गया। 20 इंस्टिट्यूट्स ऑफ एमिनेंस को अपनी राह खुद चुनने की छूट दी गई। गुणवत्तापरक शिक्षा की दिशा में हमने पिछले 4 साल में ज्यादा से ज्यादा आईआईटी, आईआईएम, आईआईएसईआर, एनआईटी, आईआईआईटी और केंद्रीय यूनिवर्सिटीज खोलीं। इसके अलावा, हमने ओपन डिस्टैंस लर्निंग पर भी नए नियमन बनाने पर काम किया। इससे 20 लाख छात्रों को फायदा मिलेगा। हमने तय किया कि हर संस्थान को मान्यता मिलनी चाहिए। यूजीसी ने सैकड़ों नियमों से शिक्षा व्यवस्था को जकड़ रखा था, जिसे हमने खोलना शुरू किया है। हमने स्वयं प्लैटफॉर्म के जरिए 15 लाख शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की व्यवस्था की है।
अमेरिका-रूस, रूस-चीन जैसे दिग्गज ताकतों के बीच बढ़ रहे तनाव को देखते हुए उनसे संबंध आगे बढ़ाना क्या ज्यादा नाजुक होता जा रहा है?
हम तेजी से बदल रही दुनिया में रह रहे हैं, जो अनिश्चितताओं से भरी हुई है। यह हमारी परिपक्व विदेशी नीति का सबूत है कि भारत ने सभी साझीदारों के साथ संबंध गहरे किए हैं। हम लगातार बहुध्रुवीय और लोकतांत्रिक विश्व में संबंधों को मजबूत करने का अथक प्रयास कर रहे हैं।
नेपाल और श्री लंका की चीन के साथ सामझौते को लेकर आपके क्या विचार हैं? मालदीव में हालात और भारत के प्रयासों पर भी कुछ कहें?
भारत के लोगों के अपने पड़ोसियों के साथ हजारों सालों से काफी सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं। श्री लंका के साथ हमारे संबंध काफी गहरे हैं और मुझे उम्मीद है कि हमारे श्रीलंकाई मित्र सुरक्षा और संवेदनशीलता की स्थिति को समझेंगे। मालदीव में भी हाल की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं चिंतित करती हैं। भारत हमेशा मालदीव के साथ खड़ा है और लोकतांत्रिक व्यवस्था सुचारू बनाने के लिए हर सहयोग देने को तैयार है।
आप अपने पार्टी के स्टार प्रचारक होंगे। 2014 में आप राष्ट्रीय सरकार नहीं चला रहे थे और पीएम के रूप में आपके पूर्ववर्ती ने ज्यादा प्रचार नहीं किया था। देश को चलाने और पूरे देश में प्रचार करने के लिए आप इन दो विशाल कर्तव्यों को कैसे संतुलित करेंगे?
2014 में मैंने प्रचार के लिए देश के सभी हिस्सों में बड़े पैमाने पर यात्रा की। उस समय भी मैं एक प्रगतिशील राज्य का मुख्यमंत्री था और मुझे समझौता किए बिना दोनों का प्रबंधन करने का अनुभव है। मेरे अभियान के बारे में यह भी कहा जा सकता है कि झारखंड में एक सुदूर गांव में एक गरीब महिला उज्ज्वला योजना के तहत उसे दिए गए गैस स्टोव पर खाना बनाती है, जब उसका घर धुएं से भरा नहीं होता है और उसका स्वास्थ्य पीड़ित नहीं होता है, तब उसे अपने बच्चों की देखभाल करने और आर्थिक रूप से उत्पादन के लिए अतिरिक्त समय भी मिलता है, तो वह महिला नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार करेगी। ऐसे ही एक गांव जिसने 70 वर्षों के बाद बिजली पाई है, वह गांव भी नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार करेगा। एक व्यक्ति जिसे मूल बैंकिंग सुविधाओं से वंचित कर दिया गया था, जब वह व्यक्ति अपने जनधन खाते का उपयोग करता है, तो वह नरेंद्र मोदी के लिए प्रचारक होगा।
-एजेंसियां

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