अब E-Village बन चुका है मुंशी प्रेमचंद का गांव

आज जयंती के अवसर पर प्रेमचंद के गांव को E-Village बनाने के साथ लमही को हेरिटेज विलेज घोषित करने की कवायद शुरू

नई दिल्‍ली। अपनी कहानियों में गरीबी और किसानों की जिंदगी को बखूबी बयां करने वाले उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद का गांव लमही अब E-Village बन चुका है, इस E-Village की हर जानकारी अब एक क्लिक पर मिलती है। गांव का भौगोलिक क्षेत्र व आबादी, जमीन की खसरा-खतौनी, कुटुंब रजिस्टर की नकल, जाति, निवास, जन्म- मृत्यु, आय प्रमाण पत्र, राशनकार्ड, पेंशन समेत तमाम सुविधाएं सब एक क्लिक पर मुहैया है।

E-Village का तोहफा उस महान लेखक को श्रद्धांजलि स्वरूप सरकार ने दिया है

ग्राम प्रधान मीरा देवी कहती हैं कि मुंशी प्रेमचंद के गांव भारतीय इतिहास में बहुत मायने रखता है। इस गांव के अस्तित्व को बचाने के लिए सरकार ने ही गांव में तमाम आधुनिक सुविधाएं विकसित कर दी। जिससे सभी जानकारी गांव में ही लोगों को मुहैया हो रही है। आने वाले दिनों में ग्रामीणों का एक विशिष्ट कोड बनाने की भी योजना है। जिससे वे खुद गौरवान्वित महसूस कर सकें।

किसी मॉडल कॉलोनी से कम नहीं है E-Village
करीब ढाई हजार की आबादी वाला यह गांव खुले में शौच से (ओडीएफ) मुक्त हो चुका है। यह केवल सरकारी प्रयास से ही नहीं बल्कि गांव के युवाओं, महिलाओं की जागरूकता के चलते भी हुआ। पक्की सड़क, बिजली से रोशन गांव, घर-घर शौचालय, डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन, घर-घर पानी की आपूर्ति, स्वच्छता के मामले में यह गांव शहर की किसी मॉडल कॉलोनी से कम नहीं। यही कारण है कि इस गांव के आसपास कालोनियां विकसित होने लगी हैं और करोड़ों के मकान गांव की आधुनिकता की कहानी बयां कर रहे हैं।

गांव देखने आते हैं देशी-विदेशी सैलानी
मुंशी प्रेमचंद इस गांव को देखने के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं। लमही के पास गोइठहां गांव के सुरेशचन्द्र दुबे को प्रेमचंद के साहित्य ने इतना प्रेरित किया कि वह इसके प्रसार में जुट गए। उन्होंने एक लाइब्रेरी बना रखी है। सुरेश चंद्र दूबे ने बताया कि हिंदी जानने, समझने, पढ़ने या लिखने वाले किसी व्यक्ति के लिए प्रेमचंद का नाम अनजाना नही हैं। रोजाना देशी-विदेशी सैलानी व स्कूली छात्र गांव को देखने एवं उनकी पुस्तकों का अध्ययन करते आते हैं। विदेशी भाषाओं में उनकी पुस्तकों का अनुवाद हैं जिसे बाहर से आने वाले लोग पढ़ा करते हैं।

नहीं दिखती अब दो बैलों की जोड़ी
प्रेमचंद की अमर कहानी दो बैलों की जोड़ी अब इस गांव में नहीं दिखती। समय के साथ लोग भी बदल गये। गांव आधुनिकता की राह पर निकल पड़ा। अब ना यहां किसी के घर बैल हैं न ही बैल के बारे में कोई बात करना चाहता है।

हेरिटेज विलेज बनाने का प्रस्ताव
प्रेमचंद के गांव लमही को हेरिटेज विलेज घोषित करने की कवायद शुरू हुई है। इसका प्रस्ताव छह माह पूर्व संस्कृति विभाग ने केन्द्र सरकार को भेजा था। तत्कालीन क्षेत्रीय सांस्कृतिक अधिकारी रहे डॉ. रत्नेश वर्मा कहते हैं कि गांव में बने मुशी प्रेमचंद स्मारक के अलावा राष्ट्रीय संग्रहालय और पूरे गांव को धरोहर के रूप में संरक्षित का प्रस्ताव भेजा गया था। योजना थी कि गांव के प्रवेश द्वार पर बूढ़ी काकी, घीसू और माधव-होरी जैसे कथा पात्रों की प्रतिमाएं भी संरक्षित होंगी। इसके लिए प्रथम चरण में यूनेस्को द्वारा तय दस नियम व शर्तें को लेकर सर्वे होगा। जहां कुछ कमी होगी उसे पूरा करने के बाद हेरिटेज विलेज घोषित करने की प्रक्रिया पर अमल होगा।

संग्रहालय-पुस्तकालय पर करोड़ों खर्च, मगर सब खाली
लमही में मुंशी प्रेमचंद के घर के ठीक सामने आलीशान मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल रिसर्च सेंटर तो एक साल पहले बनकर तैयार कर लिया गया मगर भवन अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर पा रहा। केंद्र सरकार की पहल पर इस रिसर्च सेंटर की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य था कि मुंशी प्रेमचंद, उनके उपन्यास, कहानियों और किरदारों पर शोध हो लेकिन ना तो यहां शोध कार्य शुरू हो सका न ही प्रेमचंद की पुस्तकों को संजोया जा सका।

क्या कहते हैं गांववाले
प्रेमचंद स्मृति संस्थान से जुड़े दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव कहते हैं कि जिस तरह मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल रिसर्च सेंटर को लेकर बात कही जा रही थी वह नही हो पाया। उम्मीद थी कि यहां शोध कार्य और पुस्तकालय होने से देश-विदेश के लोग प्रेमचंद की कृतियों और उनके बारे में शोध करेंगे। इससे जहां पर्यटन का बढ़ावा मिलेगा वहीं रोजगार से द्वार भी खुलेंगे लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ। रोजाना सैकड़ों की संख्या में पहुंचने वाले विद्यार्थी पुस्तकालय की तलाश में यहां आते है और निराश होते हैं। सरकार अगर इस दिशा में पहल करती तो शोध समेत अन्य कार्य शुरू हो जाते।
-एजेंसी

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