मुल्‍ला नसरुद्दीन और हमारी फितरत

हमारे जीवन का आधार ही शायद दूसरों के दुख, परनिंदा तथा दूसरों की बुराई ढूंढकर उनकी चर्चा करने आदि में ही निहित है।
मुल्‍ला नसरुद्दीन अपने पड़ोसी की दीवार से कान लगाकर कुछ सुन रहा था।
इतने में मुल्‍ला की पत्‍नी आ गई और उसने पूछा- पड़ोसी की दीवार से कान लगाकर क्‍या सुन रहे हो ?
मुल्‍ला ने उसे इशारे से अपने पास आने को कहा और बोला- तुम खुद ही सुन लो न अपने कानों से।
पत्‍नी बहुत देर तक मुल्‍ला के साथ पड़ोसी की दीवार से कान सटाकर बैठी रही, फिर कहने लगी- मुझे तो कुछ सुनाई नहीं दे रहा।
इस पर मुल्‍ला का जवाब था- तुमने अभी सुना ही कितनी देर है। मैं पिछले तीन महीने से सुन रहा हूं, लेकिन मुझे अब तक कुछ सुनाई नहीं दिया। और तू है कि चंद मिनटों में सबकुछ सुन लेना चाहती है।