बदनाम गलियों में मुल्‍ला नसरुद्दीन

क्‍या वास्‍तव में हम समय के साथ बदलते हैं। क्‍या वाकई कोई भी कभी बदलता है, या फिर हम बदलने का सिर्फ नाटक भर करते हैं। यूं भी कह सकते हैं कि बदलाव केवल शरीर पर दिखाई देता है क्‍योंकि समय उसके ऊपर अपने निशान बनाए बिना नहीं रहता।
विचार कीजिए कि क्‍या ऐसा नहीं है:
-शरीर तो बदल जाता है उम्र के प्रभाव से किंतु मन नहीं।
-शरीर अशक्‍त होने से शक्‍ति तो क्षीण होती है लेकिन वासना नहीं।
मुल्‍ला नसरुद्दीन के बदन पर भी समय का साया पड़ने लगा था। बाल पक रहे थे और चेहरे पर सिकुड़न दिखाई दे रही थी।
एक रात वैश्‍यालय की ओर जाते हुए मुल्‍ला नसरुद्दीन के किसी पुराने परिचित ने कहा- मुल्‍ला अब तो तुम्‍हारे चेहरे पर झुर्रियां साफ दिखाई देने लगी हैं, दाड़ी के बाल पक गए हैं। वो सफेद हो चुके हैं। अब तो वैश्‍यालय जाना छोड़ दीजिए।
इस पर मुल्‍ला का जवाब था- बात तो तुम ठीक कहते हो लेकिन उस दिल का क्‍या करूं जो अब तक उतना ही काला है जितना भरी जवानी के दिनों में हुआ करता था।