सिर्फ तापसी पन्‍नू की अदाकारी के देखी जा सकती है Game Over

नई दिल्‍ली। तापसी पन्‍नू की फिल्‍म Game Over आज रिलीज हो गई, सूरमा और मनमर्जियां से बनीं तापसी की इमेज के ठीक उलट Game Over  में तापसी पन्नू को डरा हुआ दिखाने का पहली बार एक्‍सपेरीमेंट किया गया है। तापसी पन्नू की हिंदी सिनेमा में अलग पहचान ही इसीलिए बनी है कि उनके प्रशंसक उन्हें एक बिंदास और दबंग महिला के रूप में देखते हैं पर Game Over  सांड़ की आंख की राह का रोड़ा भी ये फिल्म बनती दिखती है। गेम ओवर न हॉरर फिल्म है और न ही साइकोल़ॉजिकल थ्रिलर। ये दोनों के बीच की ऐसी एक्सपेरीमेंटल है जिसमें हर चौथे सीन में कहानी का पांचवा सूत्र खुल जाता है। मकड़ी के जाले से फैली फिल्म में मकड़ी कौन है और जाले में फंसी मक्खी कौन, इसी गुत्थी को पूरी फिल्म सुलझाती रहती है।

कहानी गुरुग्राम की है। घर में अकेली रह रही एक लड़की का सिर काटकर कोई फुटबॉल के गोलपोस्ट में गेंद की तरह किक कर गोल करता है। लाश को कुर्सी पर रखकर जला देता है। ये है फिल्म की प्रस्तावना। और, फिर दिखती हैं घुंघराले बालों वाली तापसी। जॉगिंग करते। देखकर लगता नहीं कि ये किसी चीज से डर भी सकती है। अतीत का हादसा उसका पीछा कर रहा है। टैटू की स्याही में किसी की अस्थियों का घोल उसे पागल कर रहा है। और, वीडियो गेम की तरह रीयल लाइफ के हादसे उसकी बाकी बची लाइफ लाइनें खत्म करने की कोशिश में हैं।

अश्विन श्रवनन के करियर की ये दूसरी फिल्म साउथ में पनप रहे हॉरर फिल्मों के नए जॉनर से थोड़ा छिटककर अपना नया वर्गीकरण चाहती है। फिल्म चूंकि मूल रूप से हिंदी में बनी नहीं है तो क्लोज अप में कलाकारों के संवाद थोड़े अटपटे लगते हैं। विनोदिनी की डबिंग किसी अकुशल डबिंग आर्टिस्ट ने कर दी है जिसे सीन के इमोशन ही नहीं समझ आते, आवाज उम्र के हिसाब से भी नहीं है।

फिल्म गेम ओवर जिस ऊंचाई से शुरू होती है, उसका ग्राफ निर्देशक बरकरार नहीं रख पाते हैं। इंटरवल तक मामला उलझता रहता है और फिर जब सुलझना शुरू भी होता है तो काफी देर हो चुकी होती है। फिल्म देखनी हो तो सिर्फ तापसी पन्नू की अदाकारी के लिए देखी जा सकती है। पल पल बदलते भावों को चेहरे पर यूं ले आना आसान काम नहीं है। बाकी फिल्म में कुछ खास है नहीं।

-एजेंसी

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