#Metoo केवल नामीगिरामी नारियों के लिए या गरीब नारी के लिए भी?

एक फ्रेंच कामेडी फिल्म भी है #Metoo जिसे भाई निकोलस चार्लेट और ब्रूनो लावाइन ने निर्देशित किया था
मिट्ठू…मिट्ठू…तोते को मिट्ठू कहते हैं। यही समझ रहे थे कि मी-टू शायद मिट्ठू का शार्टफार्म है। फिर लगा कि 2016 में जॉन एम चू निर्देशित फिल्म #Metoo की चर्चा चल रही होगी। फिर भी शांति नहीं मिली। एक फ्रेंच कामेडी फिल्म भी है #Metoo जिसे भाई निकोलस चार्लेट और ब्रूनो लावाइन ने निर्देशित किया था। मगर यहां भी मी-टू समझ में नहीं आ रहा था। और जब सुना तो हैरानी होने लगी कि #Metoo का गड़बड़झाला अलग ही है। नामचीन हस्तियां (नारी) नामचीन हस्तियों (पुरुष) पर शोषण का आरोप लगा रही हैं। इसीलिए ये नामचीन हस्तियां (पुरुष)कंपकंपा रही हैं कि कहीं कोई नामचीन हस्ती (नारी) उनको नहीं ले बैठे। हैरानी वाली बात यह है कि समझ में नहीं आता कि नारी को अबला कहें कि सबला। आज की नारी पहलवानी तक में नाम कमा रही है, वहीं आज की नारी पुरुष के शोषण का शिकार भी हो रही है। कानफ्यूज मामला है। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने भी मी-टू मामले को लेकर गंभीरता जताई है और कमेटी गठन के निर्देश दिए हैं जो जांच कर दूध का दूध पानी का पानी करेगी। (अच्छा है इस काम के लिए कोई कमेटी गठित कर दी है। अगर किसी थाने को जांच काम सौंपते तो थाने वाले पैसे लेकर लूट का केस दारू के केस में बदल देते।)

राजनीति, फिल्म, खेल, व्यापार, समाज….की एक से बढ़कर एक हस्ती को नारी जगत ने समाज और देश के सामने खड़ा कर दिया है। (नंगा?) जो जितना फेमस वह उतना ही नारी शोषण में आगे। रास्ते चलते चप्पल निकालने वाली नारी इतनी अबला। कोई बिचारी घरेलू बर्तन पोछा करने वाली, कचरा बिनने वाली हो तो लगे भी, लेकिन धुरंधर नारियों का शोषण। कानफ्यूज मामला है। यहां साफ कर दिया जाए कि मी-टू का मतलब है मैं भी या मेरे साथ भी। यानी किसी के द्वारा किया गया शोषण का शिकार पीड़ित भी हुआ/हुई है या उसके साथ भी शोषण हुआ है।

नारी शोषण का शिकार केवल हमारा देश ही नहीं अमेरिका जैसा देश भी हुआ है। जहां 2017 में कई महिलाओं ने वर्कप्लेस पर यौन उत्पीड़न, शोषण, बलात्कार आदि की शिकायतें की थी। भारत में इस अभियान को गति मिली ताजा साल 2018 के उत्तरार्ध में और फिल्म अदाकारा तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर शोषण के खिलाफ खुलकर आरोप लगाए। वैसे नारी शोषण के खिलाफ बरसों से आवाज उठ रही है और कानून भी बन गए हैं, लेकिन सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। तनुश्री की देखा देखी और भी अदाकाराएं सामने आई और एक्टर, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर को कठघरे में ले लिया। मी-टू के घेरे में फिल्म लाइन के अलावा प्रेस जगत और राजनीति भी आ गए।

राजनीति और पत्रकारिता से जुड़े केंद्र सरकार के विदेश राज्यमंत्री एम.जे. अकबर जिसे दुनियाभर में पढ़ा जाता है, पर भी मी टू के अंतर्गत आरोप लगाए गए हैं।

किसने क्या आरोप लगाया: अकबर पर सबसे बड़ा आरोप अभी न्यूज मैग्जीन फोर्स की एग्जीक्यूटिव एडिटर गजाला वहाब ने लगाया। दि वायर पर अपने आर्टिकल में उन्होंने लिखा, मैं अकबर की लिखी किताबों की वजह से उनकी फैन थी। मुझे 1994 में दि एशियन एज के दिल्ली आॅफिस में काम करने का मौका मिला और मेरे भ्रम टूट गए। मैंने अकबर को आॅफिस में चिल्लाते और ड्रिंक करते देखा। लोग एशियन एज के दिल्ली वाले आॅफिस को अकबर का हरम कहते थे। नौकरी के तीसरे दिन अकबर की निगाह मुझ पर पड़ी और वहीं से मेरे बुरे दिन शुरू हो गए। मेरी डेस्क उनके केबिन के बाहर शिफ्ट की गई और जब भी दरवाजा खुलता, वह मुझे घूरते और आॅफिस नेटवर्क पर अश्लील मैसेज भेजते। 1997 में एक बार अकबर ने पीछे से मेरी कमर पकड़ ली। उन्होंने मेरे स्तन और नितंब छुए, अंगूठे से मेरे स्तन रगड़े और मुझे कसकर पकड़े रहे। अगली शाम अकबर ने मुझे अपने केबिन में बुलाकर किस करने की कोशिश की। आखिरकार मैंने नौकरी छोड़ दी। गजाला के अलावा पत्रकारिता से जुड़ी प्रिया रमानी ने भी आरोप जड़े हैं। इसके अलावा दि एशियन एज की पत्रकार सुपर्णा शर्मा ने आरोप में कहा कि एक दिन वह (अकबर) मेरे पीछे आकर खड़े हो गए, मेरी ब्रा की स्ट्रेप खींची और कुछ कहा भी, जो मुझे अब याद नहीं है। मैं उन पर जोर से चिल्लाई थी। राइटर शुमा राहा ने बताया, कि अकबर ने मुझे 1995 में नौकरी के इंटरव्यू के लिए कोलकाता के एक होटल में बुलाया। वहां उन्होंने मुझे ड्रिंक पर आने को कहा। अकबर के बर्ताव की वजह से मैंने नौकरी नहीं की। ऐसी कई महिला पत्रकारों ने प्रेस जगत की नामचीन हस्तियों पर शोषण का आरोप लगाया है।

राजनीति में शोषण होना आम बात कही जा सकती है, लेकिन फिल्मों और पत्रकारिता जगत में इस तरह का शोषण होना आश्चर्य का विषय लगता है। फिल्मों की व्यवसायिकता ने कॉम्पटीशन को बढ़ावा दिया है और काम्पटीशन में अपने को बनाए रखना बड़ा मुश्किल होता है। इसका फायदा उठाने से कोई नहीं चूकता। हैरत की बात यह कि जब पीड़ित नारी के साथ अत्याचार होता है, तब विरोध की आवाज क्यों नहीं उठती। उस दौरान मजबूरी कैसी, कैसा समर्पण? (या फिर खुद का स्वार्थ) पत्रकारिता में तो कहा गया है कि तोप हो मुकाबिल तो अखबार निकालो। कलम की ताकत को तलवार से भी पैना माना जाता है, फिर शोषण का ये सहन कैसा।

नामचीन नारी हस्तियों के शोषण पर बवाल मच गया है, मगर कोई घरेलू कामकाजी महिला अपने मालिक के खिलाफ थाने पर जाए तो उल्टा थाने वाले उसे ही झूठे इल्जाम में फंसाकर धर ले। कई बेचारी घरेलू नौकरानियां बलात्कार का शिकार हो जाती हैं, मगर पैसा मंत्री तक को खिला देने से आरोपी साफ बच जाते हैं। यहां ये गौरतलब है कि जब बड़े-बड़े प्रतिष्ठानों और पदों पर काम कर रही नारी शोषण के आरोप लगा रही हैं तो आम नारी का तो भगवान ही मालिक कहा जा सकता है।

नारी पर अत्याचार और शोषण हो रहा है तो उसे आज नारीशक्ति के रूप में देखना विपरीत लगता है। क्योंकि खुद नारी शोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठा रही है। इसे क्या कहा जाए। नारी को शोषण सहने की क्या मजबूरी या स्वार्थ है?

इस बात में कोई मतैक्य नहीं कि नारी का शोषण हर जगह हो रहा है, फिर भी नारी को चंडी या दुर्गा बताया जा रहा है तो आखिर क्यों नारी अबला बनी है क्यों नहीं चंडी और दुर्गा बनती है। ये विपरीत दो तरफा बातें कैसी। पुरुष चाहे मजदूर हो या धन्ना सेठ, नेता, अफसर या कोई नामीगिरामी हस्ती उसके अंदर भी जानवर होता है, तो नारी के अंदर भी चंडी चेतती है। लेकिन नामीगिरामी हस्ती पर आरोप लगाना भी टेढ़ी खीर है। मसलन एम.जे.अकबर पर आरोप लगाए गए हैं, ये आरोप लगाने में संभवत: इसलिए ही टाइम लगा है कि एम.जे. अकबर जैसी हस्ती के चारों तरफ कानून का संरक्षण है, फिर गवाह सबूतों की खींचतान। मी-टू केवल नामी हस्तियों के लिए है या किसी गरीब नारी के लिए भी।

  • अनिल शर्मा

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