पश्‍चिम की नकल में अपनाया गया शॉर्टकट है #MeToo

अमेरिका की सामाजिक कार्यकर्ता तराना बर्के ने अमेरिका में यौन शोषण के खिलाफ 2006 में एक मुहिम शुरू की थी जिसका नाम #MeToo था। इस अभियान ने तब और जोर पकड़ा जब 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के पूर्व अटार्नी जनरल व बोलेनिया जिले की अमोल अदालत के 53 वर्षीय जज बं्रट कवानफ को सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए मनोनीत किया गया था उन पर एक महिला क्रिस्टीन ब्लेसी फोर्ड ने यह आरोप लगाया जब वह 15 साल की थी एवं कवानफ 17 साल के थे, एक पार्टी में उन्होंने तेज संगीत के बीच एक कमरे में ले जाकर मुंह दबाकर बलात्कार करने की कोशिश की थी। 30 वर्ष के पश्चात् आरोप लगाना कई मायनों में संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, हालांकि, कवानफ ने इस आरोप को एक सिरे से नकार दिया है।

अमेरिका से चला ये #MeToo का तूफान जब भारत की सीमा में प्रवेश किया तो क्या राजनीति, क्या फिल्म इंडस्ट्री खेल, पत्रकार, मीडिया, नेता अभिनेता, खिलाड़ी धीरे-धीरे दायरा बढ़ता ही जा रहा है, आरोपों की चपेट में आते ही जा रहे हैं। इनमें से कुछ सच के कुछ निगेटिव प्रसिद्धि के संदेह के दायरे से इंकार भी नहीं किया जा सकता।

कहने को तो भारत 1947 में ही आजाद हो गया लेकिन मानसिक रूप से हम आज भी गुलाम है। अंग्रेजी एवं अंग्रेजों का हमारे मन मस्तिष्क पर इतना जबरजस्त प्रभाव है कि प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से वे ही हमें नियंत्रित कर रहे हैं। अब तो हमारे भारतीय नेता भी अपनी बात विदेश की भूमि पर ही जाकर कहते है, शायद प्रचार प्रसार पूरी दुनियां में शीघ्र फैल सके। अमेरिका का #MeToo अभियान गुलामों की तरह हमने हाथों हाथ लिया जबकि भारत में इस बाबत पहले से ही नियम अधिनियम अस्तित्व में फिर इंतजार क्यों? किसका।

इस अभियान पर आगे मैं कुछ कहूं उसके पहले कुछ मूल बातों को समझ लेना उचित होगा ताकि, आगे गलत सोच और गलत व्याख्या न हो।

मसलन अमेरिका में नारी की स्थिति, संस्कृति, परिस्थिति, खुला परिवेश, जहां अधिकांश, शिक्षित जागरूक, कार्य के प्रति समर्पित, जवाबदेह जन समुदाय है या यूं कहे ये उनकी संस्कृति है फिर बात चाहे पार्टियों, ड्रिंक पार्टियों या आधुनिकता की हो बहुत आगे है। वहां यौन शिक्षा एवं यौन पर बात करे को बुरा नहीं माना जाता।

ऐसी स्थिति, ऐसे वातावरण में, शिक्षित, जागरूक महिला का यौन शोषण हो और वह चुप रहे बात कही से गले नही उतरती। वास्तव में वहां की महिला तो इतनी सक्षम में कि वो छेड़ने वाले पुरूष का मार-मार पर हुलिया ही बिगाड़ दे। कम से कम चुपचाप तो सहन नहीं कर सकती क्योंकि यह वहां की संस्कृति एवं प्रकृति के ही विरूद्व है।
दूसरी ओर मेरा भारत महान जहां त्रेता, द्वापर से लेकर आज तक महिला का भारतीय समाज में एक उच्च स्थान है फिर चाहे वह माँ हो, पत्नी हो, बहिन हो या अन्य हमारे भारतीय धर्म और संस्कृति में तो महिला को देवी का दर्जा दिया गया है, भले ही वह ज्यादा पढी लिखी न हो पर परिवार की धुरी रहती है और स्वास्थ्य परंपराओं का निर्वहन कर अपना एक अलग ही स्थान कायम किये हुए है।

भारतीय महिला के साथ हो सकता है कई बार पारिवारिक मजबूरियों के चलते वह अपनी आवाज नहीं उठा पाती हो लेकिन उठाना चाहिए ये भी उतना सच है, समय बदल रहा है, भारत में पश्चिम के बढते प्रभाव के बावजूद भी महिला अपने सम्मान व इज्जत की रक्षा कर रही है। चूंकि भारत एक गांवों का देश है या यूं कहे भारत में गांव की आत्मा बसती है अपने संस्कारों के ही चलते भारतीय महिलाओं ने देश विदेश में श्रद्वा पाई है जो एक हद तक ठीक भी है। निःस्वार्थ समपर्ण का कार्य भाव महिला का ही एक विशेष गुण होता है, तभी तो उसने देवी का दर्जा पाया है। लेकिन पश्चिम के प्रभाव के चलते अपने को तथाकथित बुद्धिजीवी समझने वाले लोग भारतीय संस्कृति के विरूद्ध पश्चिमी सभ्यता को बिना सोचे समझे एक अन्धे की तरह अपना फिर भारतीय मूल्यों की दुहाई देना वास्तव में दोहरा चरित्र ही हैं, बस यही घातक होता है, आज प्रतिस्पर्धा के दौर में कुछ कम समय में शार्टकट लगा मुकाम, मनचाही चीज हासिल करने में अनैतिक राह पर चलने में भी गुरेज नहीं करती। इस अन्धी दौड़ की हवस में, चकाचौंध में वह कुछ भी कर गुजरती है जिसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

हम विदेशी अभियानों को इतनी शिद्दत से लेते हैं जैसा कि हमारे यहां तो हो ही नहीं सकता और अपने को तथाकथित बुद्धिजीवी साबित करने में भी पीछे नहीं रहते ‘‘मी टू’’ अभियान को ही ले लीजिए, इसमें भाग लेने वाली वही महिलाऐं हैं जो हाई प्रोफाईल, पढ़ी-लिखी कान्‍वेंट शिक्षित हैं जिनका कोई भी पुरूष यौन शोषण नहीं कर सकता जब तक कि वह किसी स्वार्थ सिद्धि के तले न दबे। वह पूर्ण सक्षम होती है सब तरह से सामना करने के लिये लेकिन बड़ी हैरत है कि उन्‍होंने बताने में इतनी देर क्यों की? इसके पीछे और अब ऐसा क्या परिवर्तित हो गया जो पहले नहीं था? यहां एक बात पूर्णतः स्पष्ट समझ लेना चाहिए। अन्याय का हमेशा डटकर विरोध करना चाहिये। निःसंदेह अन्याय करने वाला तो दोषी होता ही है लेकिन सहने वाला उससे भी ज्यादा। अब भारत में ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जहां महिलाएं न हों अब तो पश्चिम कल्चर की तरह पुरूषों में महिला मित्र बनाना भी एक फैशन सा हो गया है यहां हमें अर्थात् महिलाओं को अपनी सीमाएं खुद तय करना पड़ेगी नहीं तो रावण तो चारों और है।

भारत में एक समय था जब महिलाओं का फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था लेकिन आज हम परिवर्तित हुए है मानसिकता, स्थिति, परिस्थिति भी बदली है लेकिन जो हमें घुट्टी में भारतीय संस्कार मिले उसका क्या? वह बहकने से रोकते हैं? आज हम पश्चिम की संस्कृति में इतना डूब गए हैं कि खुद को उच्च प्रोफाइल एवं अन्य को पिछडा ही मानते हैं। निःसंदेह दोनों के अपने-अपने फायदे और नुकसान है। अब श्रृंगार रस के कवियों के लिए बुरा दौर शुरू हो सकता है #MeToo।

अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुरूष महिला से या महिला पुरूष से किस भाव, किस संदर्भ, किस स्थिति, किस परिस्थिति में क्या और क्यों कह रही है। यह मात्र बोलने वाला एवं सुनने वाला ही जान सकता है और तीसरा देखने वाला धोखा खा सकता है। महिलाएं गलत न करें, गलत न सहें, लोगों की नकल में शार्टकट न अपनाऐं हमारी संस्कृति एवं संस्कार अनमोल है बचाए।

shashi-tiwari
shashi-tiwari

 

– डॉ. शशि तिवारी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »