स्‍मृति शेष: बीसवीं शदी के सशक्त लेखकों में से एक थे कमलेश्‍वर

06 जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में जन्‍मे हिन्दी लेखक कमलेश्वर का देहावसान 27 जनवरी 2007 को हुआ था. बीसवीं शदी के सबसे सशक्त लेखकों में शुमार कमलेश्वर ने कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फिल्म पटकथा जैसी अनेक विधाओं में अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दिया.
कमलेश्वर का लेखन केवल गंभीर साहित्य से ही जुड़ा नहीं रहा बल्कि उनके लेखन के कई रंग देखने को मिलते हैं. उनका उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ हो या फिर भारतीय राजनीति का एक चेहरा दिखाती फ़िल्म ‘आंधी’, कमलेश्वर का काम एक मानक के तौर पर देखा जाता रहा है. उन्होंने मुंबई में जो टीवी पत्रकारिता की, वो बेहद मायने रखती है.
कमलेश्वर ने ‘सारिका’ ‘धर्मयुग’, ‘जागरण’ और ‘दैनिक भास्कर’ जैसे प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया और दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक जैसा महत्वपूर्ण दायित्व भी संभाला.
एकबार कमलेश्‍वर से जब किसी पत्रकार ने पूछा कि ‘आप कई शहरों में रहे हैं. मैनपुरी, इलाहाबाद, मुंबई और दिल्ली…इनमें से किस शहर को अपने सबसे नज़दीक पाते हैं?’
कमलेश्वर ने मुस्कराते हुए जवाब दिया था, ‘इनमें से कोई ऐसा शहर नहीं है, जिसे मैं भूल सकूं. मेरी बहुत ख़ूबसूरत यादें मैनपुरी की हैं. एक हमारे यहाँ ईशान नदी हुआ करती थी, जिसे लोग ‘ईसन’ कहते थे. उसके किनारे घूमने जाना, शैतानियाँ करना, जंगलों में चले जाना, वहाँ से बेर तोड़ना, आम तोड़ना, खेतों से सब्ज़ियों की चोरी करना… ये सब चलता था और बहुत आनंद आता था.’
मैनपुरी में ही पहला इश्क
‘सबसे बड़ी चीज़ थी कि मैनपुरी में ही मेरा पहला इश्क हुआ था. इश्क के बारे में कुछ मालूम तो था नहीं. कोई अच्छा लगने लगा तो इश्क हो गया. एक बंधी बंधाई रवायत सी थी कि मेरे और उसके बीच में बहुत ही घटिया समाज बीच में आ रहा था. उससे कहने की हिम्मत ही नहीं होती थी. न उसकी हिम्मत होती थी कि भर-आँख मुझे देख ले. ये समझ लीजिए कि करीब ढाई तीन फ़र्लांग से ये इश्क चला करता था.’
‘जब उसकी शादी होने लगी तब मामला थोड़ा गंभीर हो गया. उस वक्त महसूस किया कि कुछ खो रहा है. उस ज़माने में मेरे बाल बहुत बड़े होते थे जो माँ को पसंद नहीं थे. उसकी शादी में जाना था लेकिन मन भीतर से रो रहा था. माँ ने घर पर नाई बुलवा कर बाल इतने छोटे करवा दिए जैसे आर्मी वालों के होते हैं. फिर मैं उस शादी में गया ही नहीं.’
इलाहाबाद में हुआ था कमलेश्वर का साहित्यिक ‘बपतिस्मा’
इलाहाबाद के बारे में कमलेश्वर ने लिखा था, ‘एक सोचता हुआ शहर था वो… कोई क्या खाता है, क्या पहनता है, कैसे रहता है, इस सबसे ऊपर इलाहाबाद के आदमी की पहचान ही यही थी कि वो क्या सोचता है…?’
कमलेश्वर ने बताया था, ‘वो दौर इलाहाबाद का बहुत सुनहरा दौर था. बड़े से बड़े लेखक इलाहाबाद में मौजूद थे. मेरे अपने गुरु बच्चनजी विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे, फ़िराक साहब थे. सुमित्रानंदन पंत थे, महादेवीजी थीं, निरालाजी थे…किस किस को याद करें. हम लोग सब थे नई पीढ़ी के, धर्मवीर भारती थे, मार्कंडेय थे, दुष्यंत थे, अजित थे यानि कितने ही लोग.. यानि ‘इट वाज़ अ गैलेक्सी ऑफ़ पीपुल.’ इसकी वजह ये है कि इलाहाबाद में इस तरह का बौद्धिक माहौल हुआ करता था.. चाहे वो हाईकोर्ट के जज या वकील हों या विश्वविद्यालय में जो हमारे प्राध्यापक होते थे, उनके लिए नवरत्न तो बहुत छोटा जुमला हो जाएगा. वो एक तरह से सैकड़ों रत्नों की एक मंजूषा थी.’
मोहन राकेश थे कमलेश्वर के जिगरी दोस्त
कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव ने स्थापित किया था ‘नई कहानी’ का त्रिकोण. उस ज़माने में मोहन राकेश उनके सबसे करीबी दोस्त हुआ करते थे.
दुष्यंत कुमार से दोस्ती
कमलेश्वर के एक और करीबी दोस्त थे दुष्यंत कुमार. बाद में उनके पुत्र आलोक से उनकी बेटी मानो की शादी हुई.
100 से अधिक फिल्में लिखने वाले कमलेश्वर को खुद फ़िल्में देखने का शौक नहीं था. हाँ अच्छा संगीत और अच्छी ग़ज़लें सुनना उनका शग़ल हुआ करता था. उन्होंने कभी बताया था कि उन्हें दुष्यंत कुमार की ये ग़ज़ल बहुत प्रिय है-
तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ

तेरी आँखों में एक जंगल है, जहाँ मैं राह भूल जाता हूँ.

-Legend News

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