स्‍मृति शेष: 1 सितंबर 1933 को जन्‍मे थे दुष्यंत कुमार

हिन्दी के कवि और ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार का जन्‍म 1 सितंबर 1933 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद की तहसील नजीबाबाद अंतर्गत ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था।
जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे, उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। हिन्दी में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़ 42 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की।
निदा फ़ाज़ली उनके बारे में लिखते हैं
“दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है।”
बहुत आसान है यह कह देना कि दुष्यंत एक बे-बेहरा शायर है, बहुत आसान है यह कह देना कि दुष्यंत हिंदी का शायर है इसलिए उसके यहां व्याकरण का बचकाना दोष है और बहुत आसान यह भी कह देना है कि मुट्ठी भर ग़ज़लें कह कर कोई बड़ा शायर नहीं बन जाता।
मगर बहुत कठिन है यह बात स्वीकार कर पाना कि मुट्ठी भर ग़ज़लें कहने वाला यह बे-बेहरा शायर अपनी झोली में कम से कम दो दर्जन ऐसे शेर लिए बैठा है जो अब इतने बड़े हो गए हैं कि किताबों की क़ैद से बाहर निकल आए हैं और इतने तेज़ रफ्तार भी हो गए हैं कि सरहदों को मुंह चिढ़ाते हुए शायरी समझने वाले लगभग सभी देशों में घूम आए हैं।

रहनुमाओं की अदाओं पे फिदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कवंल के फूल कुम्लहाने लगे हैं

अब नई तहज़ीब के पेशे – नज़र हम
आदमी को भून कर खाने लगे हैं

कैसी मशालें ले के चले तीरगी में आप
जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही

खड़े हुए थे अलाव की आंच लेने को
सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए

लहूलुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो
शरीफ लोग उठे, दूर जाके बैठ गए

हो गयी है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

मत कहो आकाश में कोहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है
हर किसी का पैर घुटनों तक सना है

भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेरे बहस यह मुद्दआ

यहां तक आते-आते सूख जाती हैं सभी नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा

देखिए उस तरफ़ उजाला है
जिस तरफ़ रौशनी नहीं जाती

-एजेंसियां

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