यादें: जब अजीत कुमार ने गर्व से सजाया प‍िता का बलिदान प्रतीक

मथुरा। मैं अजीत कुमार मथुरा ट्रैफिक बल का आरक्षी अपने पूज्य पिताजी की यादों को सब सभी के समक्ष रखता हूं सन् 2013 में पिताजी के गुजर जाने के बाद आज वर्षों बाद उनका बक्सा खोलकर उनके रखे कपड़े, वर्दी और सामान की साफ सफाई करने का मन हुआ। मुद्दतों पुराना उनका कोट मिला जिस पर आज भी पैराशूट रेजिमेंट का बैज और बलिदान का प्रतीक-चिन्ह लगा हुआ था। जिसे रिटायर्डमेन्ट के बाद पिताजी गर्व से सजाकर पहनते थे।

मुझे गर्व होता है पिताजी एक वायु सैनिक (पैरा कमांडो) थे सेना की वो रेजिमेंट जिसे भारत सरकार द्वारा स्पेशल फोर्स का नाम दिया गया था। जिसकी ट्रैनिंग के बारे में सुनते ही रूह कांप जाती है।

देश के सच्चे संरक्षक तीन युद्ध लड़े उन्होंने … एक भारत चीन युद्ध, जब मैं पैदा भी नहीं हुआ था तब उन्होंने भारत पाकिस्तान युद्ध लड़ा था। माँ बताती हैं सीमा से रोज शहादत की ख़बरें आया करती थी, कभी तिरंगे में लिपटे शहीदों के शव अंतिम दर्शनों के लिए लाए जाते थे। उस समय सूचना का माध्यम सिर्फ रेडियो हुआ करता था माँ समाचार सुनने के रेडियो के पास बैठी रहती थीं। युद्ध समाप्त हुआ तो रेडियो पर वो खबर सुनने को मिली जिसे बर्दाश्त कर पाना एक परिवार के लिए बहुत कठिन था।

खबर थी क‍ि उ०प्र० राज्य के मैनपुरी जिले दो जाबांज कमांडो गाँव सेलामऊ (करहल के पास) के महेश यादव और गांव कटैना हर्षा के धीरी सिंह शहीद हो गए । परिवार और गांव में गम का माहौल था फिर तीन दिन बाद खबर मिली दो जवान बर्फ़ में दबे हुए मिले जो जीवित थे जिनके पैर और कमर पर गोली लगी थी, इसी लड़ाई में पापा को पैरा कमांडो सेना का गैलंट्री अवार्ड संग्राम मेडल मिला था। जिसे मैं आज आपके साथ साझा कर रहा हूँ। पिताजी को पैरा कमांडो की सेवा के दौरान 6 मैडल मिले थे। मुझे उनके संघर्ष भरे जीवन से बहुत प्रेरणा मिलती है और गर्व होता है।

आज जो कुछ भी हम है उनकी मेहनत हैं,आज भी पिता जी आप मेरे में हैं।

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