यादें शेष: मशहूर उर्दू शायर क़तील शिफ़ाई की पुण्‍यतिथि आज

24 दिसम्बर 1919 को अविभाजित भारत में जन्‍मे क़तील शिफ़ाई का इंतकाल 11 जुलाई 2001 को पाकिस्‍तान के लाहौर में हुआ था। मशहूर उर्दू शायर क़तील शिफ़ाई का असली नाम मुहम्मद औरंगजेब था और ‘क़तील शिफ़ाई’ नाम उन्‍होंने 1938 में अपना कलम नाम बनाया।
“क़तील” उनका “तख़ल्लुस” था और “शिफ़ाई” उनके उस्ताद (शिक्षक) हकीम मोहम्मद याहया शिफ़ा ख़ानपुरी के सम्मान में था, जिसे वे अपना गुरु मानते थे।
1935 में अपने पिता की मृत्यु के कारण “क़तील” को अपनी उच्च शिक्षा छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने अपने खेल के सामान की दुकान शुरू की। व्यवसाय में असफल होने के कारण उन्होंने रावलपिंडी जाने का फैसला किया, जहाँ उन्होंने एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के लिए काम किया और फिर1947 में फिल्म गीतकार के रूप में पाकिस्तानी फिल्म उद्योग से जुड़ गए। “उनके पिता एक व्यापारी थे और उनके परिवार में शायर-ओ-शायरी की कोई परंपरा नहीं थी। शुरू में उन्होंने सुधार और सलाह के लिए हकीम याह्या शिफा खानपुरी को अपनी कविता दिखाई। “क़तील” ने उनसे उनका काव्य उपनाम ‘शिफ़ाई’ निकाला। बाद में वह अहमद नदीम कासमी के शिष्य बन गए जो उनके दोस्त और पड़ोसी थे।
“1946 में उन्हें 1936 के बाद से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘आदाब-ए-लतीफ’ के सहायक संपादक के रूप में काम करने के लिए नजीर अहमद द्वारा लाहौर बुला लिया गया। उनकी पहली गज़ल लाहौर के साप्ताहिक स्टार “एडिट” में प्रकाशित हुई थी।
जनवरी 1947 में क़तील को लाहौर के एक फिल्म निर्माता, दीवान सरदारी लाल द्वारा फिल्म के गीत लिखने के लिए कहा गया। पहली फिल्म के लिए उन्होंने पाकिस्तान में तेरी याद (1948) के बोल लिखे। कुछ प्रसिद्ध कवियों के सहायक गीतकार बतौर काम करने के बाद वे अंततः पाकिस्तान के एक अत्यंत सफल फिल्म गीतकार बन गए और कई पुरस्कार जीते।
उन्होंने कई भारतीय फिल्‍मों के लिए भी गीत लिखे।

जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं

मुझ से तू पूछने आया है वफ़ा के मानी
ये तिरी सादा-दिली मार न डाले मुझ को

तू ने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी
ख़ुद-परस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझ को

थक गया मैं करते करते याद तुझ को
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं

क्या जाने किस अदा से लिया तू ने मेरा नाम
दुनिया समझ रही है कि सच-मुच तिरा हूँ मैं

हालात के क़दमों पे क़लंदर नहीं गिरता
टूटे भी जो तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता

गिरते हैं समुंदर में बड़े शौक़ से दरिया
लेकिन किसी दरिया में समुंदर नहीं गिरता

चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
वर्ना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते

वो दिल ही क्या तिरे मिलने की जो दुआ न करे
मैं तुझ को भूल के ज़िंदा रहूँ ख़ुदा न करे

ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई में
ख़ुदा किसी को किसी से मगर जुदा न करे

किया है प्यार जिसे हम ने ज़िंदगी की तरह
वो आश्ना भी मिला हम से अजनबी की तरह

बढ़ा के प्यास मिरी उस ने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल-लगी की तरह

यूँ लगे दोस्त तिरा मुझ से ख़फ़ा हो जाना
जिस तरह फूल से ख़ुशबू का जुदा हो जाना

कुछ कह रही हैं आप के सीने की धड़कनें
मेरा नहीं तो दिल का कहा मान जाइए

मैं अपने दिल से निकालूँ ख़याल किस किस का
जो तू नहीं तो कोई और याद आए मुझे

हुस्न को चाँद जवानी को कँवल कहते हैं
उन की सूरत नज़र आए तो ग़ज़ल कहते हैं

यूँ तसल्ली दे रहे हैं हम दिल-ए-बीमार को
जिस तरह थामे कोई गिरती हुई दीवार को

रक़्स करने का मिला हुक्म जो दरियाओं में
हम ने ख़ुश हो के भँवर बाँध पाँव में

-Legend News

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