धर्म के धंधे में मीडिया भी है पूरी तरह सहभागी

धर्म के धंधे में नेताओं के साथ-साथ मीडिया भी पूरी तरह सहभागी था, सहभागी है और आगे भी पता नहीं कब तक सहभागी रहेगा क्‍योंकि मीडिया ने अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत अब भी महसूस नहीं की है। हालांकि हरियाणा के बवाल में मीडिया डेरा समर्थकों के निशाने पर रहा लेकिन लगता नहीं कि उससे मीडिया ने कोई सबक सीखा हो।
डेरा सच्‍चा सौदा प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह इंसा को दो साध्‍वियों के साथ दुराचार के मामले में 20 साल की सजा हो गई। दुराचार के ही मामले में आसाराम बापू सलाखों के पीछे है। हरियाणा का ही एक अन्‍य कथित संत रामपाल भी जेल में बंद है। नित्‍यानंद तथा भीमानंद जैसे दुष्‍कर्मियों के केस फिलहाल अदालतों में लंबित हैं।
दुराचार के आरोपी रहे कृपालु महाराज अब इस दुनिया में नहीं हैं। देश ही नहीं, देश के बाहर तक महिला यौन उत्‍पीड़न के आरोपी रहे कृपालु महाराज की त्रिनिदाद एण्‍ड टोबेगो में गिरफ्तारी भी हुई थी।
कृपालु महाराज के शिष्‍य प्रकाशानंद को यौन उत्‍पीड़न के केसों में दोषी ठहराए जाने के बाद अमरीकी पुलिस आज तक तलाश रही है।
”कृपालु महाराज” का यह शिष्‍य दरअसल दो युवा लड़कियों का यौन उत्‍पीड़न करने के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद अमरीकी अदालत को चकमा देकर भाग खड़ा हुआ। प्रकाशानंद को टेक्सास की हेज काउन्टी ज्यूरी द्वारा 14 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई थी।
इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक धर्म की आड़ में किस तरह लोगों को आतंकवाद के लिए प्रेरित करता था और किस तरह उसने धर्म को धंधा बनाकर बेहिसाब संपत्ति अर्जित कर ली, इसका भी खुलासा हो चुका है और अब वह कानून की गिरफ्त में है।
इस्‍लामिक रिसर्च फांउडेशन की आड़ में वह क्‍या रिसर्च कर रहा था, इसकी पोल तब खुली जब बांग्‍लादेश में पकड़े गए आतंकियों ने बताया कि वह जाकिर नाइक के उपदेशों से प्रेरित थे।
ईसाई धर्म में भी अंधश्रद्धा और पाखंड की भरमार है। विभिन्‍न ईसाई धर्मगुरुओं पर उनके क्रिया-कलापों को लेकर उंगलियां उठती रही हैं। भारत को अपना कार्यक्षेत्र बनाने वाली नन मदर टेरेसा भी पूरी तरह निर्विवाद नहीं रहीं।
स्‍वर्ण मंदिर पर हुए ऑपरेशन ब्‍ल्यू स्‍टार में मारा गया आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाला भी खुद को ताजिंदगी बतौर सिख धर्मगुरू पेश करता रहा। मंदिर को वह अपना अड्डा भी सिख धर्म की आड़ लेकर बना पाया।
दिव्‍य पाठ और अपने बीज मंत्रों से लोगों की असाध्‍य बीमारियों को ठीक करने तथा जीवन के हर क्षेत्र में असफल रहने वाले लोगों को सफलता दिलाने का दावा करने वाला ”कुमार स्‍वामी” भी भले ही अभी कानून की पकड़ से दूर हो लेकिन गतिविधियां उसकी भी पूरी तरह संदिग्‍ध हैं।
बाबा जयगुरुदेव भी धर्मगुरुओं की ऐसी ही फेहरिस्‍त का हिस्‍सा था जिसने अपने अंधभक्‍तों को सतयुग आने का सपना दिखाकर अरबों की संपत्‍ति इकठ्ठी की। यह बात अलग है कि न सिर्फ बाबा जयगुरुदेव की संदिग्‍ध मौत हुई बल्‍कि उसके अनुयाई आज उसकी विरासत के लिए एक-दूसरे की जान के दुश्‍मन बने हुए हैं।
बाबा जयगुरुदेव द्वारा हड़पी गई सरकारी और गैर सरकारी जमीन से बाबा के अनुयायियों को बेदखल करने के लिए अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़े आदेश जारी किए हैं।
280 एकड़ में फैले सरकारी उद्यान विभाग को हड़पने की कोशिश में जयगुरुदेव के ही कथित शिष्‍य रामवृक्ष यादव ने किस तरह यहां खूनी खेल खेला और किस तरह दो पुलिस अधिकारियों की निर्मम हत्‍या कर दी, यह सर्वविदित है।
ये पुलिस अधिकारी भी कोर्ट के आदेश पर उद्यान विभाग से रामवृक्ष और उसके गुर्गों को बेदखल करने पहुंचे थे।
ऐसे सभी मामलों में इस बात की पुष्‍टि कदम-कदम पर हुई कि इनके सरगनाओं को राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त था और राजनीतिक संरक्षण के चलते प्रशासन इनके सामने हाथ बांधे खड़ा रहा। वोट बैंक की राजनीति ने नेताओं को इनके सामने नतमस्‍तक रखने पर मजबूर किया।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि राजनीति के संरक्षण से धर्म को धंधा बनाने वालों का एक लंबा इतिहास है और हर दौर में धर्म के धंधेबाज सक्रिय रहे हैं। इनके तौर-तरीके अलग-अलग हो सकते हैं किंतु मकसद सबका अधिक से अधिक दौलत एवं शौहरत बटोरना रहा।
लेकिन ऐसे सभी मामलों में एक सवाल हमेशा अनुत्तरित रह जाता है, और वह सवाल यह है कि धर्म के धंधेबाजों की हवस को परवान चढ़ाने में क्‍या मीडिया की कोई भूमिका नहीं है ?
क्‍या मीडिया उतना ही निष्‍पक्ष है जितना कि वह खुद को तब दिखाने की कोशिश करता है जब किसी कथित धार्मिक गुरू का काला चिठ्ठा सार्वजनिक होता है अथवा वो कानून के शिकंजे में फंसकर सलाखों के पीछे जाता है ?
सच तो यह है कि मीडिया सिर्फ सुर्खियां बटोरता है, अन्‍यथा वह धर्म के हर धंधेबाज को बुलंदियों तक पहुंचाने में पूरा सहयोग करता रहा है और अब भी कर रहा है।
इस दौर के मीडिया पर पूरी तरह बिकाऊ होने का ठप्पा आमजन यूं ही नहीं लगाने लगा। उसके पीछे ठोस वजह है।
किसी भी किस्‍म के मीडिया को देख लें। विज्ञापन के जरिए पैसा उगाहने की खातिर मीडिया जगत हर स्‍तर तक गिरने को बेताब रहता है। एक ओर वह सबकुछ जानते व समझते हुए भी विभिन्‍न उत्‍पादों के फर्जी दावों वाले विज्ञापन प्रकाशित व प्रसारित करता है तो वहीं दूसरी ओर धर्म को ”धंधे की तरह” ग्‍लैमराइज करके परोसने से भी कोई परहेज नहीं करता। मीडिया भली-भांति जानता है कि अंडरगारमेंट्स से लेकर परफ्यूम तक और तेल व साबुन से लेकर मिर्च-मसालों तक के विज्ञापनों में उनके दावों का सच्‍चाई से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है परंतु वह फिर भी दिन-रात उनका प्रसारण कर रहा है क्‍योंकि उसे विज्ञापनों के भ्रमजाल से नहीं, अपनी कमाई से मतलब है। यही कारण है कि जिस किसी उत्‍पाद को जब कभी परखा गया है, तब उसके बारे में किया गया हर दावा फर्जी साबित हुआ है।
रियल एस्‍टेट के कारोबार में आज बड़ी-बड़ी नामचीन कंपनियों का सामने आ रहा फर्जीवाड़ा क्‍या मीडिया की सहभागिता के बिना हो गया। मीडिया ने बिना किसी छानबीन के उनके विज्ञापन प्रकाशित व प्रसारित नहीं किए होते तो निश्‍चित ही इतनी बड़ी संख्‍या में लोग रियल एस्‍टेट कंपनियों के फ्रॉड का शिकार नहीं बनते। आज जिन बातों को लेकर कोर्ट उनके खिलाफ आदेश-निर्देश दे रहा है, यदि उनकी असलियत विज्ञापन निकालने से पहले पता कर ली होती तो अनेक लोग धोखाधड़ी का शिकार होने से बच सकते थे।
बात चाहे तंत्र-मंत्र के माध्‍यम से किसी महिला का प्‍यार दिलाने के दावेदार सड़क छाप बाबा बंगाली के विज्ञापन की हो अथवा मसाज पॉर्लर से हजारों रुपए रोज की कमाई कराने वाले विज्ञापन की, मोबाइल टावर लगवाने जैसी धोखाधड़ी के लिए विज्ञापन कराने की हो या फिर रंगीन मिजाज लोगों के लिए अश्‍लील बातें कराने के प्रचार-प्रसार की, मीडिया को किसी से गुरेज नहीं है। उसे गुरेज है तो इस बात से कि उसका धंधा न छिन जाए। बाकी तो पैसा देकर कोई कुछ भी प्रकाशित व प्रसारित कराने के लिए स्‍वतंत्र है।
कुमार स्‍वामी के शत-प्रतिशत झूठे दावों को लाखों रुपए लेकर जैकेट पेज विज्ञावन के रूप में प्रकाशित करने का काम भी मीडिया करता है और निर्मल बाबा द्वारा समौसे व चटनी से कैसी भी समस्‍या का समाधान कराने जैसे सोकॉल्‍ड सत्संगों को टीवी पर मीडिया ही दिखाता है।
आसाराम बापू की सारी सच्‍चाई सामने आ जाने के बावजूद उसके प्रवचनों को विज्ञापन बनाकर अब भी मीडिया लाखों रुपए की कमाई कर रहा है और विभिन्‍न तरीकों से तंत्र-मंत्र की दुकानें भी टीवी पर मीडिया ही चलवा रहा है।
शायद ही ऐसा कोई ‘फ्रॉड’ हो जिसमें विज्ञापन के माध्‍यम से मीडिया सहभागी न रहता हो लेकिन जब बात आती है उसे जिम्‍मेदार ठहराने की तो कहीं किसी कॉर्नर में एक छोटा सा डिस्‍क्‍लेमर देकर वह अपनी जिम्‍मेदारी पूरी कर लेता है।
पंचकूला की विशेष सीबीआई कोर्ट से गुरमीत राम-रहीम के खिलाफ आए निर्णय को मीडिया भले ही आज सुर्खियां बना रहा है और बोर करने की हद तक दिन-रात परोस रहा है किंतु कल यदि उसके कथित चमत्‍कारों का विज्ञापन मिलने लगेगा तो यही मीडिया उसे दिखाने में कोई परहेज, कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं करेगा। कहीं किसी कोने में ”विज्ञापन” लिखकर वह डेरा सच्‍चा सौदा से लाखों रुपए कमाता रहेगा और अपनी दुकान उसी तरह पूरी बेशर्मी के साथ चलाऐगा जैसे कि कल तक राम-रहीम या आसाराम चलाता था। जिस तरह कृपालु की संस्‍था आज भी चला रही है और जिस तरह कुमार स्‍वामी भी अब तक चला रहा है।
सच पूछें तो कोई फर्क नहीं है ऐसे धर्म गुरुओं, व्‍यापारियों, कारोबारियों, नेताओं या मीडिया घरानों में। सबकी दुकानें एक-दूसरे के सहयोग से चलती हैं और शायद आगे भी चलती रहेंगी। कभी किसी कोर्ट का आदेश ज्‍वार-भाटा की तरह मीडिया की टीआरपी बढ़ाने के काम जरूर आ जाता है लेकिन जैसे ही उसका गुबार ठंडा होता है सब अपने-अपने धंधे में लग जाते हैं।
चार दिन ठहर जाइए, गुरमीत राम-रहीम की खबरें भी सिकुड़ कर सिर्फ सिंगल कॉलम और टिकर व फुटर पर चलने वाली पट्टियों तक सीमित रह जाएंगी।
ये बात अलग है कि निर्मल बाबा के समौसे, आसाराम के प्रवचन, कृपालु की कथाएं तथा राधे मां का ग्‍लैमरस धर्म, विज्ञापन के रूप में हमेशा मीडिया का हिस्‍सा बना रहेगा क्‍योंकि यहां भी सवाल धंधे का जो है। फिर धंधा चाहे धर्म का हो या अधर्म का, धंधा तो धंधा है। कीचड़ में पूरी तरह लिप्‍त रहकर कमल खिलाने की कला सिर्फ राजनीतिक पार्टियां ही नहीं जानतीं, मीडिया भी जानता है, और वह उसी कला का बखूबी इस्‍तेमाल कर रहा है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी