अपने राजनीतिक जीवन के सर्वाधिक संकट काल में हैं मायावती

इस समय मायावती अपने राजनीतिक जीवन के सर्वाधिक संकट काल में हैं लिहाजा वो सब कुछ कर रही हैं। ग्यारह साल बाद मायावती को बौद्ध धर्म और आंबेडकर की याद आ रही है यानि मामला काफी गंभीर है.
दरअसल, वह आरएसएस-भाजपा को चेतावनी दे रही हैं कि मैं दलितों की विशाल आबादी का धर्म बदलकर उन्हें बौद्ध बना दूंगी तो तुम हिंदुत्व की राजनीति कैसे करोगे! अर्थात वे कुछ शर्तों पर हिंदू बनी रहेंगी वरना अपने साथ करोड़ों दलितों को भी बौद्ध बना देंगी.
आरएसएस-भाजपा की यह दुखती रग है. हिंदुत्ववादी खुद हिंदुओं को डराते रहे हैं कि अगर उन्होंने ज़्यादा बच्चे पैदा करके अपनी आबादी नहीं बढ़ाई तो वो आगे अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जाएंगे.
मायावती हिंदुत्ववादियों के हाथों धर्म-परिवर्तन करने वालों के उत्पीड़न से बहुत चिंतित हैं. उन्होंने धमकी दी है कि अगर भाजपा ने दलितों, मुसलमानों और आदिवासियों के प्रति अपनी सोच नहीं बदली तो वे लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म अपना लेगी.
इतनी चिंतित तो वो तब भी नहीं हुई थीं जब 2001 से 2010 के बीच (जिस दौरान वो दो बार मुख्यमंत्री रहीं) उनके अपने सूबे में बौद्धों की आबादी में भारी गिरावट दर्ज की गई. बौद्ध संगठनों ने ध्यान भी दिलाया लेकिन इस पर वो चुप ही रहीं.
इसी अवधि में मायावती नरेंद्र मोदी के साथ भाजपा का चुनाव प्रचार करने गुजरात गईं, बहुजन समाज पार्टी का ब्राह्मणों के साथ चुनावी गठबंधन करने के बाद वो इसे सर्वजन समाज पार्टी कहने लगीं. उन्होंने लखनऊ में अपनी कोठी के मुख्यद्वार पर गणेश की मूर्ति स्थापित करवाई और बसपा के चुनावचिन्ह हाथी का एक नया रूप सामने आया. जो हाथी कांशीराम के ज़माने में मनुवादियों को कुचलने चला था, बसपा का नया नारा बना- “हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश हैं.”
इसी बीच के ‘सर्वजन समय’ में बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के एतिहासिक नागपुर धर्म परिवर्तन के पचास साल पूरे हुए. मायावती 14 अक्तूबर 2006 को नागपुर दीक्षाभूमि गईं जहां उन्हें पहले किए गए वादे के मुताबिक बौद्ध धर्म अपना लेना था. यह वादा कांशीराम ने किया था कि बाबा साहेब के धर्म परिवर्तन की स्वर्ण जयंती के मौके पर वह खुद और उनकी उत्तराधिकारी मायावती बौद्ध बन जाएंगे.
मायावती ने वहां बौद्ध धर्मगुरुओं से आशीर्वाद तो लिया लेकिन सभा में कहा, “मैं बौद्ध धर्म तब अपनाऊंगी जब आप लोग मुझे प्रधानमंत्री बना देंगे.” बौद्ध भिक्षु सकते में आ गए.
बसपा के पीछे से सिर्फ़ दलित वोट नहीं खिसका है बल्कि वह बुरी तरह कई दूसरे संकटों में भी घिर गई हैं. अगर वह भाजपा के हिसाब से नहीं चलतीं तो उनके लिए एक बार फिर जेल जाने की नौबत आ खड़ी हुई है.
मोदी सरकार ने यूपी चुनाव से पहले अपने विरोधियों की आर्थिक बुनियाद तोड़ने की रणनीति के तहत नोटबंदी लागू की. तब बसपा को कई सौ करोड़ रुपये के पुराने नोट बैंक में जमा कराने पड़े. यह पैसा चंदा था या किसी और स्रोत से आया था, यह मामला आयकर विभाग के सामने लंबित है.
इधर आय से अधिक संपत्ति का मामला भी बंद नहीं हुआ है. उनके भाई आनंद कुमार की फर्ज़ी कंपनियों में भारी निवेश का मामला भी खुला हुआ है. मुख्यमंत्री रहते यूपी की चीनी मिलों को बहुत कम दाम पर एक शराब कारोबारी को बेचने का मामला भी अदालत में पहुंच गया है.
इस समय मायावती अपने राजनीतिक जीवन के सर्वाधिक संकट काल में हैं, लिहाजा वो सब कुछ बाबा साहेब की तर्ज पर कर रही हैं. वो कह रही हैं कि उन्होंने संसद से इस्तीफ़ा भी बाबा साहेब का अनुकरण करते हुए दिया.
दलित चिंतक और यूपी के पूर्व आइपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी का कहना है “बाबा साहेब हिंदू स्त्रियों को अधिकार दिलाने वाले हिंदू कोड बिल को संसद में लटकाने पर नेहरू सरकार से नाराज़ थे इसलिए उन्होंने इस्तीफ़ा दिया था लेकिन मायावती दस मिनट में अपनी बात नहीं रख सकती थीं इसलिए नाराज़ होकर संसद से बाहर चली गईं. धर्म व्यक्तिगत मामला है. वह चाहे कोई धर्म अपना लें इसके लिए धमकी देने की क्या ज़रूरत है?”
दारापुरी का कहना है कि बाबा साहेब ने बौद्ध बनने का फैसला किसी राजनीतिक मजबूरी में नहीं इक्कीस साल तक धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन और हिंदू धर्म के सुधार के प्रयासों के विफल होने के बाद किया. फिर भी अगर मायावती बौद्ध हो ही जाएं तो दिलचस्प नज़ारा होगा.
उन्हें सबसे पहले अपनी कोठी से गणेश की मूर्ति हटवानी पड़ेगी और बाबा साहेब की उन बाईस प्रतिज्ञाओं का पालन करना पड़ेगा जिसमें ब्राह्मणवाद और कर्मकांड का विरोध भी शामिल है. तब वो चुनावी गठबंधन कैसे करेंगीं? ज़ाहिर है यह उनके लिए मुमकिन नहीं है.
-अनिल यादव