गौलोक की भूमि है Mathura

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मस्थान Mathura, भारत की प्रसिद्ध सप्त पुरियों में से एक है । Mathura को श्रीकृष्ण के धाम गौलोक की भूमि भी कहा जाता है । मथुरा का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है । कथाओं के अनुसार मधु नामक दैत्य ने Mathura नगरी का निर्माण किया था । उसी के नाम पर इस नगर का नाम मथुरा पड़ा था। भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न ने अत्याचारी राक्षस लवणासुर को मार कर मथुरा को मुक्त कराया था तथा काफी समय तक मथुरा पर शासन किया था । भगवान श्रीकृष्ण के बाद मथुरा नगरी अनेकों बार उजड़ी और बसी ।
बौद्धकाल में भी मथुरा काफी प्रख्यात हुई। इसका गवाह यहां का राजकीय संग्रहालय और पुरातन विभाग है। मुगलकाल में मथुरा की छवि काफी धूमिल हुई थी। मुगल शासकों ने तलवार के जोर से तथा अत्याचारों के दम से इस्लाम धर्म की वृद्धि के लिये यहां के प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़ कर उनके स्थान पर मस्जिदें बना दीं और धार्मिक महत्व के स्थानों को नष्ट कर दिया । ब्रिटिष हुकुमत ने हिन्दुओं के धर्म के मामले में अधिक दखल नहीं दिया ।
बंगाल से आये श्रीकृष्ण के परम भक्त चैतन्य महाप्रभु ने मथुरा सहित पूरे ब्रज क्षेत्र का उद्धार किया । उन्होंने वृन्दावन, बरसाना, गोवर्धन, मथुरा सहित पूरे ब्रज के सभी धार्मिक महत्व के स्थानों का पता लगा कर उनको सार्वजनिक किया। चैतन्य महाप्रभु को श्रीराधाकृष्ण के युगल स्वरूप का अवतार भी कहा जाता है । उन्होंने ही पूरी दुनियां को श्रीराधाकृष्ण की महिमा से अवगत कराया। इसके बाद अनेकों महापुरूषों, संतों ने लोगों के सहयोग से ब्रज के तीर्थ स्थलों का विकास किया ।
वर्तमान में मथुरा सहित पूरा ब्रज क्षेत्र भारत ही नहीं बल्कि पूरे विष्व की आस्था का केन्द्र बना हुआ है । वर्ष भर में देष-विदेष से करोड़ों श्रद्धालु श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, श्रीराधाष्टमी, होली, मुड़िया पूर्णिमा, अधिकमास, सावन का महीना सहित अनेकों अवसरों पर ब्रज के मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, बरसाना, बल्देव, में आते हैं। ब्रज में हजारों की संख्या में विदेषी श्रद्धालु स्थायी रूप से रह कर श्रीराधाकृष्ण की भक्ति में लीन हो रहे हैं।
ब्रज में कुछ प्रमुख मंदिर इस प्रकार हैं – मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान, पोतरा कुण्ड, केषवदेव मंदिर, द्वारकाधीष मंदिर, विश्राम घाट यमुना मंदिर, रंगेष्वर मंदिर, भूतेष्वर मंदिर, कंकाली टीले पर काली मंदिर, गल्तेष्वर मंदिर, ध््राुव मंदिर, सप्तऋषि मंदिर, गिर्राज महाराज का मंदिर प्रमुख हैं । वृन्दावन में बांके बिहारी मंदिर, राधा दामोदर मंदिर, निधिवन, रंगजी मंदिर, प्रेम मंदिर, इस्काॅन मंदिर, पागल बाबा मंदिर, गोदाबिहार मंदिर, राधामाधव मंदिर सहित लगभग पांच हजार छोटे-बड़े मंदिर हैं । बरसाना में राधारानी का मंदिर, गोवर्धन में दानघाटी मंदिर, मुखारबिन्द मंदिर, कुसुम सरोवर तथा गिर्राजजी की सप्तकोसी परिक्रमा आदि प्रमुख है । बल्देव में दाऊजी महाराज का मंदिर है। गोकुल, नन्दगांव के मंदिर भी दर्षनीय हैं । कहते हैं कि चार्तुमास में हिन्दुओं के 33 कोटि देवी-देवता ब्रज में ही निवास कर विश्राम करते हैं। यह सत्य है कि ब्रज में पूरे विष्व के तीर्थस्थान विराजमान हैं ।
मथुरा सहित पूरे विष्व में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी बड़े ही धूमधाम से मनायी जाती है । मथुरा सहित भारत के प्रत्येक हिन्दु घर में लोग उपवास रख कर अपने लड्डू गोपालजी को नवीन वस्त्र-आभूषणों से सजाते हैं और मध्य रात्रि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कराते हैं तथा व्रत खोलते है । इसी प्रकार ब्रज के सभी मंदिरों में श्रीराधाष्टमी भी धूमधाम से मनाये जाते हैं। इनके अलावा सावन के होली, दिवाली, रक्षाबन्धन, षिवरात्रि, बल्देव छठ, यमुना छठ, बसन्त पंचमी सभी त्यौहार यहां के सभी मंदिरों में मनाये जाते हैं । ब्रज के लोकगीत, लोक परम्परायें, हवेली संगीत, समाज गायन, होली गीत, लोकनृत्य, चरकुला नृत्य, विष्व प्रसिद्ध हैं ।
मथुरा प्रेम एवं सौहार्द की नगरी है । यहां मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सभी धर्म एवं जाति के लोग मिलजुल कर रहते हैं तथा ईद, क्रिसमस, गुरूपर्व सहित सभी त्यौहारों को प्रेम से समान रूप से मनाते हैं । इसीलिये कहा जाता है कि Mathura प्रेम की नगरी है । पूरा ब्रज क्षेत्र श्रीराधाकृष्ण के प्रेम की गवाह है और साधु संतों की तपस्थली भी है। देवता भी यहां मानव रूप में ब्रजरज चूमने के लिये आते हैं। यहां जहां भी जाओ राधे-राधे या जयश्रीकृष्ण की गूंज मिलेगी ।

मुक्ति कहे गोपाल से कोई मेरी मुक्ति बताये।
ब्रजरज उड़ मस्तक लगे मुक्ति मुक्त हो जाये।।

– पं. अनुराग देव शर्मा
एम.ए, बी.एड.

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