श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर अजन्मे का स्वागत करने को आतुर है मथुरा नगरी

प्रकाषिताखिलगुणः स्मृतः पूर्णतमो बुधैः।
असर्वव्यअंकः पूर्णतरः पूर्णोऽल्पदर्षकः ।।

‘‘भगवान जब अपने अशेष गुणों को प्रकट करते हैं, तब वे ‘पूर्णतम’ कहे जाते हैं, जब सब गुणों को प्रकट न करके बहुत-से गुणों को प्रकट करते हैं, तब ‘पूर्णतर’ और जब उनसे भी कम गुणों को प्रकट करते हैं, तब ‘पूर्ण’ कहलाते हैं। ’’

उस अनन्तकालजीवी, सर्वव्यापी के आविर्भाव स्थल में स्वयं को समर्पित करना एक अलौकिक एवं पवित्र आनन्द की अनुभूति है। इस अलौकिक परिसर में प्रवेश करते ही आप इस सूक्ष्म जगत का अंश बन जाते हैं और शान्ति एवं श्रद्धा का भाव आपके हृदय में स्वयं उत्पन्न हो उठता है। आदि वाराह पुराण, पद्म पुराण, श्रीमद्भागवत आदि में स्पष्ट उल्लेख है कि भगवान के जन्म महोत्सव के दर्शन का पुण्य जो मथुरा में है, वह अन्यत्र बैकुण्ठ आदि में भी नहीं है, चूंकि भगवान ने जन्म की लीला मथुरा में की है। भगवान के ऐसे दिव्य जन्म महाभिषेक के दर्शन करने मात्र से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से छूटकर साक्षात हरि को प्राप्त करता है। अजन्में के जन्म महोत्सव का दर्शन, श्रवण एवं आयोजन परम् पुण्यप्रद है।

भविष्य पुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठ‍िर को श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी महोत्सव एवं व्रत के विधान को उद्घाट‍ित किया है। मथुरा में सदैव से ही दिव्य एवं भव्य समारोह के साथ श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन व्रत आदि विधि के साथ संपन्न किये जाते रहे हैं। कालान्तर में श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी महोत्सव का प्रचार-प्रसार हुआ और जन्माष्टमी महोत्सव आज लोकोत्सव के रूप में मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी महोत्सव-व्रत की परंपरा एवं विधि श्रवण कर महाराज युधिष्ठ‍िर कृत-कृत हो उठे और उन्होंने हस्तिनापुर में श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी का प्रचार-प्रसार किया।

साक्षात् परात्पर पूर्ण ब्रह्म, पूर्ण पुरूषोत्तम, सर्व-व्यापक, सर्वकर्ता, सर्वमय, सर्वातीत, अप्रमेय, दिव्यानन्दस्वरूप, प्राकृतिक गुणरहित, स्वरूपभूतदिव्यकल्याणगुणगणवारिधि, आनन्दाकार, सर्वशक्तिविश‍िष्ट, अंशकलापूर्ण ‘पूर्णावतार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म महोत्सव का आयोजन रसिक एवं वैष्णव सन्तों की मान्यता के अनुसार स्वयं श्रीजी ही करती है।

भगवान का प्रादुर्भाव होने के कारण उपवास, जागरण, विश‍िष्ट रूप से प्रभु का सेवा-श्रृंगार आदि का इस दिन विशेष महत्व है। उपवास, रात्रि जागरण, भाव अनुसार एवं यथा उपलब्ध उपचार से भगवान का पूजन, कीर्तन इस उत्सव के प्रधान अंग हैं। भक्ति-भाव, उल्लास, प्रेम का प्रतीक श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर सम्मिलित होना वास्तव में प्रभु की साक्षात कृपा रूपी अमृत का पान करने के समान ही है।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।

‘अर्जुन ! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है– इस प्रकार जो तत्व से जानता है, वह शरीर का त्याग करके पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता, मुझे प्राप्त होता है।’

जिसके जन्म का रहस्य जानने पर, जानने वाले का जन्म नहीं होता, उसका वह जन्म दिव्य है– इसमें क्या संदेह है।
अजन्मे ने इस पवित्र भूमि पर जन्म की लीला कर इस पवित्र मथुरानगरी को तीर्थो में भी वन्दनीय बना दिया।

पुरीष्वरीं कृश्णपुरीं व्रजेष्वरीं
तीर्थेष्वरीं यज्ञतपोनिधीष्वरीम्।
मोक्षप्रदां धर्मधुरंधरां परां
मधोर्वने श्रीमथुरां नमाम्यह्म् ।।

जो समस्त पुरियों के ईश्वरी, ब्रजेश्वरी, तीर्थेश्वरी, यज्ञ तथा तप की निधीश्वरी, मोक्षदायिनी तथा परम धर्म-धुरंधरा है, मधुवन में वह श्रीकृष्णपुरी मथुरा वन्दनीय है।

भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के कारागार में जन्म लेकर न केवल वसुदेव-देवकी को बन्धन मुक्त किया, अपितु उस काल में पृथ्वी पर फैले हुए समस्त अत्याचारियों का अन्त कर दिया। उनका अवतार दुष्टों का संहार, सज्जनों का परित्राण, अधर्म का विनाश और धर्म का अभ्युत्थान करने के लिए हुआ था। उनका जीवन-चरित्र सम्पूर्ण सद्गुणों का भण्डार है। उनके व्यापक कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत हमारे जीवन के सभी पक्ष आ जाते हैं। उन्होंने आध्यात्मिक, धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक और पर्यावरण आदि सभी क्षेत्रों में अलौकिक कार्य किये तथा मानव-जगत् को परम कल्याणकारी एवं व्यवहारिक विचार-धाराएं प्रदान कीं। उनकी गीता के उपदेश तो ऐसे अनमोल-रत्न हैं, जिनकेसामने संसार के सभी मनीषी-महापुरुष श्रद्धापूर्वक सिर झुकाते हैं। आदि-व्याधियों से पीड़ित और मोह-माया ग्रसित मानव-समाज को सुख-शान्ति प्रदान करने के लिए श्रीकृष्ण ने गीता में विविध आध्यात्मिक सिद्धान्तों का निरूपण किया।
ज्ञान-साधना के अनुसार आत्मा की अमरता का उपदेश , शक्ति-साधना के अनुसार आज्ञाकारी होने का आदेश एवं कर्मयोग के अनुसार कर्तव्य पालन का निर्देश श्रीकृष्ण ही दे सकते थे। वे सच्चे अर्थो में जगद्गुरू सिद्ध हुए।

भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य दिवस पर जन्म महोत्सव का अयोजन यूं तो असंख्य वैष्णव के हृदय एवं घरों के साथ-साथ देवालयों में भव्य एवं दिव्य रूप से मनाया जाता है। समय के साथ-साथ कृष्ण नाम रूपी अमृत का पान कर श्रीकृष्ण तत्व को प्राप्त कर चुके असंख्य विदेशी भक्त भी आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन विभिन्न देशों में करते हैं। आज से लगभग 170वर्ष पूर्व जहाजी मजदूर के रूप में गये हजारों श्रीकृष्ण चरणानुरागी भक्तों ने अन्य संस्कृतियों में रचे-बसे देशों में श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी महोत्सव सीमित संसाधनों एवं प्रतिबंधों के कारण सूक्ष्म रूप से मनाना शुरू किया। जो आज बहुत ही वृहद रूप में विभिन्न देशों में मनाया जा रहा है। अनेकानेक संतों एवं मनीष‍ियों से कृष्ण नामरूपी अमृत का पान कर भौतिक जीवन की चकाचैंध से दूर कृष्णभक्ति में लीन लाखों विदेशी भक्तजन भी इस आयोजन को अत्यन्त मर्यादित रूप से भिन्न-भिन्न देशों में मनाते हैं।

कप‍िल शर्मा , सच‍िव , श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा

– कपिल शर्मा,
सचिव,
श्रीकृष्ण-जन्मस्थान सेवा-संस्थान,
मथुरा

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