Mate Mahadevi : जिन्होंने कर्नाटक में चुनावी एजेंडा बदल दिया

73 साल की लिंगायत धर्मगुरु हैं Mate Mahadevi

गेरुआ रंग की सूती साड़ी पहने 73 वर्षीय Mate Mahadevi इस बार कर्नाटक विधानसभा चुनाव में एजेंडा सेट करने में अव्वल रहीं। बालों को सिर के ऊपर गोलकार तरीके से बांधे हुए और उस में चमेली की माला लगाए हुए माते महादेवी लकड़ी के सिंहासन ‘गद्दीज’ पर बैठती हैं। इस बार चुनाव से पहले उन्होंने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर कर्नाटक में कई रैलियों को संबोधित किया।

कर्नाटक में वीरशैव-लिंगायत समुदाय की आबादी 14 से 17 फीसदी है। कर्नाटक की आबादी करीब 6.5 करोड़ है। कर्नाटक के 224 विधानसभा सीटों में 90 पर लिंगायत बहुतायत है। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने से ठीक पहले कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा दिए जाने की मांग को मान लिया है। अब इस पर अंतिम फैसला केंद्र सरकार को करना है।

लिंगायत समुदाय के लोग लंबे समय से मांग कर रहे थे कि उन्हें हिंदू धर्म से अलग धर्म का दर्जा दिया जाए। कर्नाटक सरकार ने नागमोहन समिति की सिफारिशों को स्टेट माइनॉरिटी कमीशन ऐक्ट की धारा 2डी के तहत मंजूर कर लिया। अब इसकी अंतिम मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जाएगा। कांग्रेस सरकार के इस कदम को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वोट बैंक को विभाजित करने के कदम के रूप में आलोचना की गई। बीजेपी को लिंगायतों का समर्थन माना जाता है। बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा भी लिंगायत हैं।

लिंगायत का ज्यादा प्रभाव उत्तरी कर्नाटक में है। इस समुदाय को कर्नाटक के अगड़ी जातियों में गिना जाता है। इस समुदाय की पहली महिला संत माते महादेवी मुख्य रूप से उत्तर कर्नाटक में अनाथालयों और शैक्षणिक संस्थानों का एक समूह चलाती है। उनका कहना है, लिंगायत हिंदुओं से अलग हैं। दरअसल 12 वीं शताब्दी में लिंगायत धर्म के संस्थापक बासवन्ना यानी बासवेश्वराने हिंदू धर्म के प्रथाओं के खिलाफ विद्रोह किया। हमारे बीच कुछ भी एक समान नहीं है। बीजेपी परेशान क्यों है अगर हम अलग धर्म की स्थिति तलाश रहे हैं?

वीरशैव समुदाय हिंदू धर्म में सात शैव संप्रदायों में से एक है। वे हिंदू भगवान शिव की पूजा करते हैं जिन्हें उमापति (उमा का पति) के रूप में वर्णित किया गया है। लिंगायत सम्प्रदाय के लोग ना तो वेदों में विश्वास रखते हैं और ना ही मूर्ति पूजा में। लिंगायत हिंदुओं के भगवान शिव की पूजा नहीं करते। हालांकि वे भगवान को “इष्टलिंग” के रूप में पूजते हैं। इष्टलिंग अंडे के आकार की गेंदनुमा आकृति होती है जिसे वे धागे से अपने शरीर पर बांधते हैं। 12वीं सदी के धर्म-सुधारक बासवन्ना लिंगायत समुदाय के संस्थापक माने जाते हैं। लिंगायत समुदाय उनके वचनों का पालन करता है।

बासवन्ना ने गरीब जातियों कुम्हार, नाई, दर्जी, मोची जैसे 99 जाति जिसे हिंदू समाज ने खारिज कर दिया था उन्हें लेकर लिंगायत की नींव डाली। कोई भी लिंगायत धर्मगुरु बन सकता है। धर्मगुरु माते महादेवी कहती हैं, “लिंगायत कुंडली, मूर्ति पूजा और अन्य हिंदू प्रथाओं पर विश्वास नहीं करता है। हमारे लिए, कर्म ही पूजा है। हम बासवन्ना के जातिहीन, वर्गीकृत, लिंग-समान धर्म के आदर्श चाहते हैं जो सभी को गरिमा के साथ व्यवहार करता है।” पिछले महीने कर्नाटक में लिंगायत समाज के मठाधीशों की सबसे बड़ी संस्था ‘फ़ोरम ऑफ़ लिंगायत महाधिपति’ की बैठक हुई जिसकी अध्यक्षता माते महादेवी ने की।

Mate Mahadevi ने कहा, ‘ जिसने भी हमारी मांग का समर्थन किया है, हम उनका समर्थन करेंगे।’

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