सत्ता के शिखर पर सूरतें तो कई बदलीं, लेकिन नहीं बदली Mathura की तकदीर

कभी कालिया नाग के कलुष से कालिंदी को मुक्‍ति दिलाने वाले सोलह कला अवतार भगवान श्रीकृष्‍ण की जन्‍मभूमि है Mathura। श्रीकृष्‍ण की आल्‍हादिनी शक्‍ति राधा की भी जन्‍मभूमि Mathura में ही है। कृष्‍ण की पटरानी कालिंदी का यमनोत्री के बाद देशभर में Mathura अकेला तीर्थस्‍थल है। यमुना और यम का पूरे देश में एकसाथ मंदिर सिर्फ Mathura में ही है।
इन्‍हीं सब विशेषताओं के कारण मथुरा को समूचे विश्‍व में प्रमुख धार्मिक स्‍थान माना गया है।
धर्म के अलावा मथुरा का राजनीतिक तथा भौगोलिक दृष्‍टि से भी विशेष महत्‍व है इसलिए यह हमेशा चर्चा में बना रहता है।
मथुरा से फिलहाल लोकसभा में प्रतिनिधित्‍व प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री व भाजपा नेत्री हेमा मालिनी कर रही हैं तो विधानसभा की कुल पांच सीटों में से चार पर भाजपा काबिज़ है।
भाजपा के इन चार विधायकों में से दो उत्तर प्रदेश सरकार के कबीना मंत्री हैं और इनमें से ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा तो सरकार के प्रवक्‍ता भी हैं।
जिला पंचायत में भाजपा नेत्री और कबीना मंत्री चौधरी लक्ष्‍मीनारायण की धर्मपत्‍नी ममता चौधरी नेतृत्‍व कर रही हैं तो नगर निगम में भाजपा के ही मुकेश आर्यबंधु मेयर हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि इतना सब होने के बावजूद मथुरा को उसकी गरिमा के अनुरूप स्‍वरूप हासिल नहीं हो पा रहा।
बात चाहे साफ-सफाई की हो अथवा कानून-व्‍यवस्‍था की। यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने की हो या शहर को जाम से मुक्‍ति दिलाने की। सड़कों के रखरखाव की हो अथवा पेयजल मुहैया कराने की। इन सभी मामलों में मथुरा काफी पिछड़ा हुआ महसूस होता है।
ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का मथुरा से सीधा संबंध होने तथा यही उनका निर्वाचन क्षेत्र होने की वजह से विद्युत आपूर्ति के क्षेत्र में अवश्‍य कुछ उल्‍लेखनीय सुधार हुए हैं किंतु बाकी मामलों में ऐसा कोई कार्य नहीं हुआ, जिसे उपलब्‍धि के रूप में प्रस्‍तुत किया जा सके।
कहने को तो मथुरा के कई प्रमुख कस्‍बे योगी सरकार द्वारा तीर्थस्‍थल घोषित किए जा चुके हैं, लेकिन तीर्थस्‍थल जैसी कोई बात वहां अब भी दिखाई नहीं देती। वृंदावन, गोवर्धन तथा बरसाना में आज तक खुलेआम न सिर्फ अंडा व मीट की बिक्री होती है बल्‍कि शराब भी आसानी से उपलब्‍ध है।
मथुरा सहित इन सभी स्‍थानों पर श्रद्धालुओं की भीड़ का लगभग हर समय काफी दबाव बना रहता है, बावजूद इसके यातायात व्‍यवस्‍था पर कोई ध्‍यान नहीं दिया जाता।
जनपद का शायद ही कोई हिस्‍सा ऐसा होगा, जहां हर दिन जाम की स्‍थिति उत्‍पन्‍न न होती हो। वृंदावन और गोवर्धन सहित मथुरा शहर का तो यह आलम है कि स्‍थानीय लोग घर के बाहर निकलने से पहले कई बार सोचते हैं।
शहर और कस्‍बों के अलावा अब तो नेशनल हाईवे पर भी लोगों को जाम से राहत नहीं मिलती। मथुरा में नेशनल हाईवे के सभी प्रमुख चौराहों-तिराहों को ऑटोरिक्‍शा चालकों ने पूरी तरह कब्‍जा रखा है। किसी भी चौराहे-तिराहे पर आधी से अधिक सड़क को बेतरतीब तरीके से घेरकर खड़े रहने वाले ऑटोरिक्‍शा चालकों के आतंक का आलम यह है कि कोई उन्‍हें ऐसा करने से रोकने या टोकने की हिम्‍मत नहीं कर सकता।
ऑटोरिक्‍शा चालकों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वह जरा से टोकने पर किसी की भी इज्‍जत से खिलवाड़ करने और यहां तक कि संगठित होकर मारपीट करने को तैयार रहते हैं।
चूंकि यह लोग पुलिस को अच्‍छा-खासा सुविधा शुल्‍क देने के साथ-साथ उसके लिए बेगार भी करते हैं इसलिए पुलिस मूकदर्शक बनकर इनकी हर हरकत को देखती रहती है। यदि कोई इनकी शिकायत लेकर पुलिस के पास जाता है तो पुलिए इन्‍हीं का पक्ष लेती है।
वर्तमान एसएसपी बबलू कुमार से ठीक पहले मथुरा को प्रभाकर चौधरी अकेले ऐसे एसएसपी मिले थे जिन्‍होंने यहां की यातायात व्‍यवस्‍था को काफी हद तक दुरुस्‍त करने में सफलता हासिल की थी किंतु उन्‍हें सत्ताधारी राजनेताओं के कोप का भाजन बनना पड़ा लिहाजा बहुत जल्‍द उनका तबादला कर दिया गया।
अखिलेश राज में हुए बहुचर्चित जवाहर बाग कांड के बाद भी बबलू कुमार एकबार मथुरा पुलिस की कमान संभाल चुके हैं इसलिए ऐसा माना जा रहा था कि वह प्रभाकर चौधरी की कोशिशों को परवान चढ़ाने में कामयाब रहेंगे। खुद बबलू कुमार ने भी मथुरा की यातायात व्‍यवस्‍था को पटरी से न उतरने देने का दावा किया था परंतु समय के साथ उनका दावा खोखला साबित हुआ। करीब-करीब यही हाल कानून-व्‍यवस्‍था का है।
एक ओर राजस्‍थान तथा दूसरी ओर हरियाणा की सीमा लगी होने के कारण इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल का क्राइम रेट अधिकांशत: सुर्खियों में रहता है, इसलिए जब कोई पुलिस अधिकारी मथुरा की कमान संभालता है तो सबसे पहले क्राइम कंट्रोल करने की बात कहता है किंतु सफलता किसी-किसी के ही हाथ लगती है।
प्रभाकर चौधरी भी क्राइम कंट्रोल करने में कोई खास तीर नहीं चला पाए थे, लेकिन हर बड़ी वारदात के बाद उनकी मौके पर तत्‍काल मौजूदगी जनता को सुकून का अहसास अवश्‍य कराती थी।
मथुरा में अपराधियों की सक्रियता और उनके बुलंद हौसलों का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्‍होंने योगीराज कायम होने के साथ ही यहां व्‍यस्‍ततम इलाके की तंग गलियों में घुसकर करोड़ों रुपए मूल्‍य के आभूषण लूट लिए थे। दिन-दहाड़े की गई इस वारदात में बदमाशों ने दो लोगों की जान भी ली थी लेकिन पुलिस तत्‍काल कुछ नहीं कर सकी। पिकेट ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मी उल्‍टे अपनी जान बचाकर भागते देखे गए।
हेमा मालिनी जैसी विशिष्‍ट भाजपा नेत्री का मथुरा से लोकसभा में प्रतिनिधित्‍व तथा योगी सरकार में ऊर्जामंत्री जैसे बड़े ओहदे पर मथुरा के शहरी विधायक श्रीकांत शर्मा का काबिज होना और बसपा से पाला बदलकर भाजपा का हिस्‍सा बने छाता क्षेत्र के विधायक चौधरी लक्ष्‍मीनारायण को योगी कैबिनेट में जगह मिलने पर लोगों की उम्‍मीद बंधी थी कि अब संभवत: जनपद का उसकी गरिमा के अनुरूप विकास होगा व यातायात व्‍यवस्‍था की बदहाली दूर होगी। साथ ही कानून-व्‍यवस्‍था पटरी पर आएगी और सड़क, बिजली व पानी जैसी सुविधाओं के लिए तरसना नहीं पड़ेगा किंतु अब जबकि योगी सरकार को पौने दो साल होने जा रहे हैं, हर तरफ से निराशा ही हाथ लगी है।
बेशक यह कहा जा सकता है कि बसपा और सपा के शासनकाल में भी मथुरा की स्‍थिति इससे बेहतर कभी नहीं रही, परंतु जब बात आती है योगी ”राज” की तो इतना कहना बनता है कि ”यथास्‍थिति” की भी उम्‍मीद नहीं की थी।
यथास्‍थिति ही रहनी थी तो वह मायाराज क्‍या बुरा था जब मथुरा से उसमें एकमात्र मंत्री चौधरी लक्ष्‍मीनारायण हुआ करते थे और जिले की पांच विधानसभा सीटों में से केवल दो बसपा के पास थीं।
उसके बाद आई अखिलेश यादव की पूर्ण बहुमत वाली सरकार में तो मथुरा से न कोई विधायक था और न मंत्री या संतरी। अखिलेश के मित्र संजय लाठर को भी मथुरा के मांट विधानसभा क्षेत्र की जनता ने उस उप चुनाव में हरवा दिया जिसमें खुद मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने पूरी ताकत झोंक दी थी और जो रालोद के युवराज जयंत चौधरी के इस्‍तीफे से खाली हुई थी। बावजूद इसके मथुरा की जनता ने बुआ व बबुआ की सरकार में विशेष अंतर महसूस नहीं किया। अखिलेश सरकार का समय पूरा होते-होते हुए जवाहर बाग कांड ने जरूर उसके दामन पर बड़ा सा दाग लगा दिया अन्‍यथा बाकी कार्यकाल में मथुरा की कानून-व्‍यवस्‍था कमोबेश मायाराज से बदतर नहीं थी। साफ-सफाई, सड़क, बिजली तथा पानी सहित यमुना का प्रदूषण भी यथावत रहा। हालांकि बसपा के बाद सपा के शासनकाल में भी विकास की बातें होती रहीं किंतु धरातल पर नजर नहीं आईं।
शायद इसीलिए मथुरा की जनता ने 2017 के चुनावों में एक ओर जहां सपा और बसपा का पूरी तरह सूपड़ा-साफ कर दिया वहीं दूसरी ओर भाजपा को उसकी खोई हुई प्रतिष्‍ठा हासिल कराई। लोकसभा के बाद मथुरा की जनता ने विधानसभा में भी मथुरा से भाजपा को बड़ी सफलता दिलाई, लेकिन योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली भाजपा सरकार से अब तक तो मथुरा की जनता को उसका प्रतिफल नहीं मिला है। अब चूंकि 2019 के लोकसभा चुनाव लगभग सिर पर आ चुके हैं इसलिए योगीराज के कामकाज का आंकलन किया जाना स्‍वाभाविक है। स्‍वाभाविक इसलिए भी क्‍योंकि सांसद के रूप में हेमा मालिनी ने भी ऐसा कोई उल्‍लेखनीय कार्य नहीं किया जिसे रेखांकित किया जा सके। यह बात अलग है कि हेमा मालिनी मथुरा की जनता के लिए बहुत से काम कराने का दावा समय-समय पर करती रही हैं परंतु हकीकत कुछ और बयां करती है।
हो सकता है कि योगी आदित्‍यनाथ की सरकार के नुमाइंदे भी उन्‍हें मथुरा में सबकुछ ठीकठाक होने की बात बताते हों लेकिन समय रहते तस्‍वीर का दूसरा पहलू देखना भी जरूरी है अन्‍यथा 2019 के बाद 2022 भी सामने खड़ा नजर आएगा।
यदि बदलाव नहीं हुआ तो जनता के मन में यह बात घर कर सकती है कि ”कोई नृप होए, हमें क्‍या हानि”। सत्ता के शिखर पर सूरतें बदलने का यह खेल आखिर कहीं तो ठहरना चाहिए वरना विकास और बदलाव की बातें अपना मतलब ही खो देंगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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