सृष्टि के प्रथम पुरुष मनु भी फाल्गुन पूर्णिमा होली को ही जन्‍मे थे

manu, The first man of the universe was born to Falgun Purnima Holi
सृष्टि के प्रथम पुरुष मनु भी फाल्गुन पूर्णिमा होली को ही जन्‍मे थे

मनु-स्मृति के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा को ही सृष्टि के प्रथम पुरुष मनु की जन्मतिथि है, इसलिए यह होली के रूप में मनाए जाने की परंपरा बनी

होली के मोहक छींटों से हमारा इतिहास रंगा हुआ है। मध्यकाल में मुस्लिम शासकों से लेकर सूफी-संत व शायर तक होली के सुरूर में डूबे रहे हैं। जोधाबाई संग सम्राट अकबर और नूरजहां संग जहांगीर के होली खेलने का जिक्र मशहूर है। बादशाह शाहजहां के दौर में होली को ‘ईद-ए- गुलाबी’ और ‘आब-ए-पाशी’ (रंगों की धार) कहा जाने लगा था। जहांगीर के दौर के बने ऐसे चित्र मशहूर हैं, जिनमें उन्हें होली खेलते दिखाया गया है। होली को लेकर लिखे प्रसिद्ध काव्य के रचनाकारों में निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो, बहादुरशाह जफर और नजीर अकबराबादी के नाम शामिल हैं। अर्थात होली हमेशा से हमारे बहुरंगी समाज में समरसता का त्योहार रही है। आज भी हमें इस परंपरा को मजबूती
देने की पहल करनी चाहिए।
होली की पौराणिक कथाएं जीवन को ऊर्जा और नैतिक-बल से भर देने वाली है। प्राचीन काल के असुर शासक
हिरण्यकशिपु के दर्प का चित्रण आज भी दहला देने वाला है। कहा जाता है, उसने अपनी शक्ति के आगे सबको
अस्वीकार कर दिया था और स्वयं को ही ईश्वर घोषित कर दिया। उसके लिए चुनौती उसके पुत्र प्रह्लाद ने घर
में ही प्रस्तुत कर दी। भगवान विष्णु के अनन्य भक्त प्रह्लाद ने अपने पिता के अहंकार को ललकार दिया और विष्णु- आराधना की निरंतरता बाधित नहीं होने दी। हिरण्यकशिपु का दंभ कैसा प्रबल था, इसका पता इसी से चल जाता है कि उसने अपने पुत्र को मारने के कई उपाय कर डाले। अंत में अपनी बहन होलिका का प्रयोग किया, जिसे अग्नि में नहीं जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका ने हिरण्यकशिपु के आदेशानुसार प्रह्लाद को गोद में समेटा और धधकती अग्नि में प्रवेश कर गई। उल्टा चक्र चला और अग्नि ने प्रह्लाद को छोड़ होलिका को
भस्म कर दिया। होलिका को अग्निविषयक वरदान वस्तुत: उसके स्वयं के लिए था, इसलिए किसी अन्य के
संग अग्नि-प्रवेश से यह उलट गया।
इस तरह होलिका का जलकर भस्म होना उसके अहंकार और हिरण्यकशिपु के दर्प के विनाश का प्रतीक बना।
दूसरी कथा द्वापर की है। मान्यता है कि बालक श्रीकृष्ण ने फाल्गुन पूर्णिमा की इसी तिथि को दंभी कंस द्वारा भेजी गई उस राक्षसी पूतना का वध किया था, जो उन्हें मारने आई थी। यहां भी कंस दर्प और पूतना का अहंकार विनष्ट हुआ। इस घटना के बाद मुदित ग्वालों ने गोपियों के संग रासलीला रचाई और रंग खेला जो बाद में प्रत्येक वर्ष उत्सव के रूप में मनाई जाने लगी।

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