कर्जे में डूबी कम्पनियाँ और Make In India डिफेन्स

हर कहानी में एक खलनायक या थोड़ी सी नकारात्मक छाप होती हैं और Make In India डिफेन्स प्रोग्राम के अंतर्गत निजी कंपनियों पर ज्यादा उदारता इससे अलग नहीं हैं खुला या ढका हुआ भ्रस्टाचार सबको दिखता हैं लेकिन हम सभी की चुप्पी जब तक टूटती हैं तब तक हमारा गूंगापन बेहरे हो चुके प्रशासन के समक्ष खड़ा होता हैं |

एनडीए सरकार द्वारा जब मेक इन इंडिया की पहल की गई तब इस पूरी योजना के केंद्र में डिफेन्स ही था जिस पर सरकार का पूरा ध्यान केंद्रित था यह प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की दूरगामी सोच थी की निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी बड़ी रक्षा परियोजनाओं में विदेशी कंपनियों के साथ रणनीतिक साझेदार के रूप में शामिल किया जाए

मेक इन इंडिया डिफेन्स के तहत, भारतीय निजी कंपनियों को कुछ विशेष अधिकार प्राप्त हैं जिनके अंतर्गत वे बड़ी रक्षा परियोजनाओं के आर्डर ले सकती हैं | मेक इन इंडिया, रक्षा क्षेत्र में विशेषज्ञता के लिए विदेशी विनिर्माण के साथ जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करती है। इसमें भारतीय कंपनियों के लिए तय निर्यात नियमों और शर्तो को भी आसान बनाया गया ताकि इस योजना को सफल बनाया जा सके |

जिस प्रकार से और जिस पृष्टभूमि की कम्पनीज को रक्षा मंत्रालय द्वारा डिफेन्स के ऑर्डर्स आबंटित किये गए हैं उसमे काफी प्रश्नचिन्ह हैं  ये कम्पनियाँ कई वर्षो से नुक्सान झेल रही थी, भारतीय बैंको का ब्याज देना भी बंद कर रखा था, इनकी किताबो में कई गुना कर्जा पहले से ही हैं, खास बात यह की डिफेन्स कभी भी इनका परंपरागत कार्य क्षेत्र नहीं रहा और इन कम्पनीज की व्यवसायिक साख और कुशलता पर पहले से ही कई सवालिया निशान और मुकदमे जारी हैं |

जिस प्रकार से डिफेन्स के प्रोजेक्ट्स निजी क्षेत्र की कुछ नुकसान झेलती कम्पनीज को दिए हैं उसमे काफी कुछ संदेहजनक हैं | हमने पिछले कुछ सालो में देखा हैं की हमारा बैंकिंग सिस्टम अपने नॉन परफार्मिंग एसेट्स के कारण बर्बादी के कगार पर तक रहा हैं | दिए गए कर्ज का  नॉन परफार्मिंग एसेट्स में तब्दील होने का मुख्य कारण कर्ज लेने वाली कंपनियों के प्रति बैंकों का बेहद उदार रवैया और निम्न स्तर की पारदर्शिता भी हैं।  यह भी सभी को विदित हैं की कॉर्पोरेट गवर्नेंस में खामियां और  धोखधड़ी की गतिविधियों ने कई वित्तीय घोटालो को जनम दिया हैं जिनमे प्रमुख घोटाले हैं सत्यम, UTI, शारदा चिट फण्ड, सहारा, NSEL, नीरव मोदी इत्यादि |

मेक इन इंडिया डिफेन्स के नाम पर, ऐसी कई भारतीय कंपनियों को  ऑर्डर्स आबंटित किये गए हैं जोकि पहले से ही घाटे और कर्ज में डूबी हुई हैं उनकी व्यवसायिक कार्य कुशलता कुछ ऐसी हैं की ये कम्पनियाँ बैंको के ब्याज़ तक में लगातार चूक कर रही हैं और इनके खिलाफ पहले से ही कई मुक़दमे हैं मीडिया ने इस जगह अभी खोदना शुरू नहीं किया हैं लेकिन यह बात तय हैं की बहुत ज्यादा और कई कंकाल इस बाबत मिलेंगे |

# पुंज लॉयड: यह कंपनी एक समय पर इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन क्षेत्र की अग्रणी कम्पनीज में से एक थी लेकिन आज ना केवल इसकी  वित्तीय हालत खराब है बल्कि ये अपने सबसे बुरे दौर में हैं कंपनी पर पहले से ही कई लंबित मुकदमे दर्ज हैं और SABIC मुकदमे के निपटारे के कारण यह बुरी तरह से चरमरा गई थी जोकि  UK  की एक अदालत के फैसले पर आधारित था  और शायद इसी का परिणाम था की इसे अपनी 100 वर्षो से अधिक पुरानी कंपनी SIMON CARVES को 2$  मिलियन में बेचना पड़ा। खराब प्रबंधन ने इसकी भारतीय सहायक कंपनी पी एल इंजीनियरिंग पर भी ग्रहण लगाया हैं |

कृपया नीचे दी गई तालिका देखें, जो स्पष्ट रूप से कंपनी की दयनीय स्थिति और निचले स्तर के  वित्तीय प्रदर्शन को दर्शाता हैं :

पुंज लॉयड को डिफेन्स के ऑर्डर्स आबंटित करते समय रक्षा मंत्रालय द्वारा उपरोक्त तथ्यों को निश्चित रूप से अनदेखा किया जाता है, एक ऐसी कंपनी जोकि 5 वर्षों से लगातार नुकसान झेल रही हैं जिसका  कुल ऋण बोझ लगभग 6113.9 करोड़ रुपया है और जो बैंकों को दिए जानने वाले ब्याज भुगतान पर लगातार चूक रही हैं |

रक्षा मंत्रालय ने पुंज लॉयड पर रक्षा ऑर्डर्स को निष्पादित और वितरित करने का भरोसा किया, जबकि कंपनी द्वारा अनुचित निष्पादन और परियोजना को पूरा करने में विफल रहने के कारण UK  की एक अदालत के हस्तक्षेप और आदेश के बाद उसे SABIC  के दावों का भुगतान करना पड़ा हैं |

# रिलायंस नेवल और इंजीनियरिंग लिमिटेड (एडीएजी समूह): इस कंपनी को पुंज लॉयड द्वारा सहस्थापित और पिपावाव शिपयार्ड के नाम से शुरू किया गया था | इसका नाम बदल कर पहले पिपावाव डिफेन्स  फिर रिलायंस डिफेन्स और अब रिलायंस नेवल और इंजीनियरिंग लिमिटेड कर दिया गया हैं | इसको भी रक्षा मंत्रालय द्वारा डिफेन्स के ऑर्डर्स में कोई कमी नहीं हैं |

कंपनी अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (एडीएजी) से संबंधित है और इसकी सभी सूचीबद्ध कंपनियों में भारी कर्ज बोझ है। भारी कर्ज ने कंपनी को चलअचल संपत्तियों और व्यवसायों को बेचने के लिए मजबूर कर दिया है। साथ ही, यह कंपनी बैंकों को तय ब्याज भुगतान पर लगातार चूक रही हैं

नीचे दी गई तालिका, रिलायंस नवल की वित्तीय बीमारी का एक बुलेटिन मात्र हैं :

ऐसा प्रतीत होता हैं की मेक इन इंडिया इन डिफेन्स निजी क्षेत्र की बीमार और ऋणग्रस्त कंपनियों को फिर से खड़ा करने का एक पुलिता भर हैं भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराज धृतराष्ट्र का अपने पुत्रों द्वारा किये जाने वाले गलत और असवैंधानिक कृत्यों तथा राजसभा  को लेकर एक अंधापन हमेशा रहा इस बार धृतराष्ट्र को एक संस्था और हम सभी में क्लोन कर दिया गया है।

अजय सिंह रावत (लेखक एक स्वतंत्र जर्नलिस्ट तथा मार्केटिंग कंसलटेंट हैं)

 

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