विश्व हिन्दी लौटायेगी Gandhi का विस्मृत सम्मान: डॉ. शर्मा

मथुरा/ नई द‍िल्ली। मॉरीशस के 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिमालयन भूल के चलते विस्मृत Mahatma Gandhi के शताब्दिक दक्षिण भारतीय हिन्दी प्रयोग के पुनर्सम्मान पर विश्व हिन्दी परिषद के तत्वावधान में 13-14 सितम्बर को नई दिल्ली क्षेत्र के एन0 डी0 एम0 सी0 सभागार में अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जायेगा।

यह जानकारी सम्मेलन में आमंत्रित डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में Mahatma Gandhi के दक्षिणी प्रयोग की उपेक्षा पर जारी मुहिम के तहत प्रदान की गई।

संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं 18 अप्रैल को राष्ट्रीय एवं विश्व हिन्दी दिवसीय आन्दोलन समेत Mahatma Gandhi के उपेक्षित दक्षिण भारतीय हिन्दी प्रयोग के सूत्रधार डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने खुलासा किया कि ‘बहुआयामी गांधी: विविध परिदृश्य’ विषयक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन उस मुहिम का नतीजा है जिसे मॉरीशस सम्मेलन के पश्चात् गांधी के उपेक्षित दक्षिणी प्रयोग के सवाल पर छेड़ा गया था। आगे कहा कि 18-20 अगस्त 2018 को मॉरीशस में आयोजित 11वां विश्व हिन्दी सम्मेलन वस्तुतः दक्षिण भारत में आयोजित किया जाना चाहिए था क्योंकि महात्मा गांधी ने उसके सौ साल पहले 1918 में स्वाधीनता आन्दोलन की सफलता समेत राष्ट्रीय एकता की स्थापना के मद्देनजर दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार सभा की शुरूआत की थी। जिसकी अनदेखी से सम्मेलन की ऐतिहासिक प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल उठा था। कहा कि सम्मेलन की भूल पर मॉरीशस के साथ आर0 टी0 आई0 में भारत सरकार से भी जवाब तलब किया गया था किन्तु सरकारों को उसके बजाय गांधी केन्द्रित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन भूल सुधार का उचित उपाय जान पड़ा।

डॉ0 शर्मा ने रोष जताया कि हिन्दी ऐतिहासिक जड़ों से कट जाने के कारण भारत समेत विश्व में उपेक्षित होती रही है। यदि 11वां विश्व हिन्दी सम्मेलन गांधी के शताब्दिक हिन्दी प्रयोग की यादगार में दक्षिण भारत में आयोजित किया जाता तो उसका विश्व में अलग असर होता और उसके साथ उत्तर-दक्षिण की भाषाई एवं राष्ट्रभाषाई गुत्थियों को सुलझाने में नई पहल की शुरूआत हो सकती थी जो कि दुर्भाग्य से नहीं हो सकी। बड़े दुःख की बात है कि हिन्दी की बेटियों -उर्दू और बंगला को क्रमशः पाकिस्तान और बांगलादेश में राष्ट्रभाषा का दर्जा प्रदान कर दिया गया लेकिन भारत में उनकी माँ (हिन्दी) आजादी के 72 सालों बाद भी मौलिक अधिकार पर आंसू बहा रही है।

डॉ0 शर्मा ने कहा कि आजादी पूर्व भी सन् 1837 से सरकारी कामकाज से बहिष्कृत देवनागरी (हिन्दी) की पुनर्स्थापना के संघर्ष में फ्रेडरिक जॉन शोर, आचार्य केशव चन्द्र सेन, डॉ0 राजेन्द्र लाला मित्रा, जॉन बीम्स, फ्रेडरिक सिल्वन ग्राउज, राजा शिव प्रसाद, रेवरेंड जे0 डी0 बेट, रेवरेंड एच0 एस0 केलाग, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, राधाचरण गोस्वामी आदि योगदान देते रहे किन्तु हिन्दी के इतिहास में उनका स्मरण न करने से अंततः भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय के सद्प्रयासों के फलस्वरूप 18 अप्रैल 1900 से संयुक्त प्रान्त के सरकारी कामकाज में पुनः लागू हिन्दी की ऐतिहासिक विजय पर न तो राष्ट्रीय प्रस्थापना हो सकी और 114 वर्षों तक न ही कोई आन्दोलन शुरू किया गया। बल्कि आजादी बाद 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी सिर्फ इसलिए राष्ट्रीय दिवस की दावेदार हो गई क्योंकि इस दिन उसे राजभाषा का दर्जा प्रदान किया गया था।

हालांकि संवैधानिक व्यवस्था को 26 जववरी की तर्ज पर स्वर्णिम हिन्दी दिवस 18 अप्रैल से जोड़ा जा सकता था जिससे वर्तमान के साथ अतीत का हिन्दी संघर्ष भी सम्मानित हुआ होता। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका जिसकी पुनर्स्थापना के लिए 115 वर्षों बाद मथुरा से विश्व हिन्दी दिवसीय आन्दोलन शुरू किया गया। इससे पूर्व वर्ष 2011 में 150वीं जयन्ती पर मनमोहन सिंह सरकार को सौंपी गई प्रथम महामना स्मारक परियोजना में 18 अप्रैल को राष्ट्रीय हिन्दी दिवस घोषित करने का सुझाव पेश किया गया था।

डॉ0 शर्मा ने आक्रोश जताया कि परिषद के रेडीमेड प्रस्ताव से नहीं लगता है कि सम्मेलन में हिन्दी पर कोई राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय सवाल उठाया जायेगा जिससे भारत सरकार कश्मीर की तर्ज पर ठोस कदम उठा सके। फिर भी गांधी के बहाने हिन्दी वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने में जरूर कामयाब होगी।

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