दुनिया के किसी भी कोने में नज़र दौड़ाइए, लोगों की राय बंटी हुई मिलेगी

दुनिया के किसी भी कोने में नज़र दौड़ाइए, लोगों की राय बंटी हुई मिलेगी. मोदी समर्थक या मोदी विरोधी, ट्रंप के फ़ैन या उनसे नफ़रत करने वाले, ब्रिटेन में ब्रेक्ज़िट के समर्थक या इसके विरोधी, तुर्की में अर्दोआन के समर्थक या विरोधी, दुनिया के हर कोने में तमाम मसलों को लेकर लोगों के ख़यालात बंटे हुए हैं.
कोई ग्लोबलाइज़ेशन का समर्थक है, तो कोई समाजवाद का. और मज़े की बात ये है कि हम भले ही कितनी भी बहस करें, अपने ख़्यालात नहीं बदलना चाहते. सोशल मीडिया से लेकर खाने की टेबल तक, तर्क-वितर्क चल रहे हैं. लोग अपने विचारों को लेकर ज़ोरदार मोर्चेबंदी कर रहे हैं.
माहौल देखकर यूं लगता है कि आज लोग अपनी राय पर कुछ ज़्यादा ही अटल हो गए हैं.
रिसर्च क्या कहती हैं?
पर हम अगर कहें कि रिसर्च के नतीजे इसके बरक्स हैं तो शायद आप यक़ीन ही न करें. रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि हम में से ज़्यादातर लोग अपनी राय को लेकर ज़िद आसानी से छोड़ देते हैं और अपनी राय के विरोधी की बात मान लेते हैं.
पिछले कई दशकों तक विचारों को लेकर जो रिसर्च हुई, उनसे ये नतीजा निकला कि हम दुनिया में अपने जैसे ख़यालात वाले लेख, किताबें और लोग तलाशते हैं. वजह ये है कि इनकी मदद से हमें एहसास होता है कि हम अकेले नहीं. बहुत से और भी हैं जो हमारे जैसे विचार रखते हैं. इससे हौसला बढ़ता है.
दूसरी बात ये भी है कि जिन बातों पर हम विश्वास करते हैं, उनके समर्थन में तर्क मिल जाने पर हम ख़ुद को जायज़ ठहरा पाते हैं इसीलिए अगर हम वाइन पीते हैं तो वो लेख हमें याद नहीं रहते, जो इसके ख़िलाफ़ मशविरा देते हैं. बल्कि हम उन रिसर्च का हवाला देने लगते हैं, जो वाइन पीने के फ़ायदे गिनाते हैं.
मेल खाते विचारों पर दिमाग़ की प्रतिक्रिया
हमारा दिमाग़ भी वो जानकारी ज़्यादा तेज़ी से ग्रहण करता है, जो हमारे विचार से मिलती हैं.
अगर हम ग़लत तथ्यों के साथ कोई ग़लत वाक्य बोलते हैं तो लोगों को उसकी ग़लतियां आसानी से पकड़ में नहीं आतीं. भाषा की ग़लती पर उनका ध्यान ही नहीं जाता है.
यही बात ख़यालात पर भी लागू होती है. जिस बात से हम इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, उसके वाक्य की ग़लतियां तो फ़ौरन पकड़ लेते हैं. जिस पर यक़ीन नहीं होता, उसकी कमियां पकड़ने में हमारे ज़हन को देर लगती है.
ये बात हाल ही में येरूशलम की हेब्रू यूनिवर्सिटी की रिसर्च से एक बार फिर साबित हुई थी.
इन सभी तर्कों से एक बात एकदम साफ़ है. हम अपनी राय को लेकर अक्सर बज़िद होते हैं. ये सच भी है लेकिन ये सच नहीं है कि एक बार जो राय क़ायम कर ली, वो हमेशा के लिए फिक्स हो जाती है. इसमें बदलाव भी मुमकिन है और बेहद आसानी से.
क्यों आसानी से बदल लेते हैं हम अपनी राय?
कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक क्रिस्टिन लॉरिन ने अमरीका के सैन फ्रांसिस्को के लोगों पर एक रिसर्च की. सैन फ्रांसिस्को में प्लास्टिक की बोतलों पर पाबंदी लगा दी गई थी. पाबंदी लागू होने से पहले ज़्यादातर लोग इसके ख़िलाफ़ थे.
विरोध के बावजूद प्रशासन ने इस पाबंदी को लागू कर दिया तो ये रोक लागू होने के 24 घंटे के भीतर ही बहुत से लोगों की राय बदल गई थी. वो ये मानने लगे थे कि ये पाबंदी सही है.
क्रिस्टिन लॉरिन कहती हैं कि हम अपने ख़यालात से चिपके रहते हैं. लेकिन जब हालात बदल जाते हैं तो हमें लगता है कि ये बदलाव उतना भी बुरा नहीं है. फिर हम उन ख़यालात से चिपके रहकर ज़िंदगी तो गुज़ार नहीं सकते. सो उन्हें बदलकर ज़िंदगी के सफ़र में आगे बढ़ जाते हैं.
लॉरिन ने कनाडा के ओंटेरियो शहर में भी एक रिसर्च की. यहां पर 2015 में पार्क और रेस्टोरेंट के आंगन में स्मोकिंग करने पर रोक लगा दी गई थी. शुरुआत में ज़्यादातर लोग इसके ख़िलाफ़ थे. वो इसे अपनी निजी आज़ादी में बाधा मानते थे.
लेकिन स्मोकिंग पर पाबंदी लागू होने के बाद इसका विरोध करने वाले से आधे लोगों ने अपनी राय बदल ली थी. वो ये मानते थे कि इस पाबंदी का इतना बुरा भी असर नहीं पड़ा उनकी ज़िंदगी पर.
सियासी विचार पर असर
ख़यालात में बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप हैं. इस वक़्त डोनल्ड ट्रंप की लोकप्रियता, दूसरे विश्व युद्ध के बाद से सभी अमरीकी राष्ट्रपतियों में सबसे निचले स्तर पर है.
इसका ये मतलब निकाला जा सकता है कि जिन लोगों ने ट्रंप को वोट नहीं दिया, वो उन्हें आज और भी नापसंद करते हैं.
लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं हुआ है. जो लोग ट्रंप को पसंद नहीं करते थे, वो ट्रंप के सत्ता संभालने के बाद उनके बारे में थोड़ा बेहतर सोचने लगे थे. मतलब वो ये मानने लगे थे कि ट्रंप का राष्ट्रपति बनना इतनी भी बुरी बात नहीं है.
ऐसा नहीं है कि ट्रंप के शपथ ग्रहण के बाद के भाषण की वजह से लोगों की राय बदली. बल्कि शपथ ग्रहण के दौरान ट्रंप के बर्ताव की वजह से कई लोग उनसे और भी नफ़रत करने लगे थे. लेकिन, बाद के दिनों में उन्होंने माना कि ट्रंप का कार्यकाल इतना भी बुरा नहीं है.
तर्क तलाशता है हमारा दिमाग़
क्रिस्टिन लॉरिन कहती हैं कि, ‘हमारा दिमाग़ ऐसे तर्क तलाशता रहता है, जिससे हम बेहतर महसूस कर सकें. ज़िंदगी के सफ़र में आगे बढ़ सकें’.
तो जो लोग डोनल्ड ट्रंप को शिद्दत से नापंसद करते थे, वो उनके राष्ट्रपति बनने के बाद सोचने लगे कि चलो अब राष्ट्रपति बन गए हैं तो इतना बुरा भी नहीं होगा. ऐसे तर्क देकर हम ख़ुद को आगे के सफ़र के लिए तैयार करते हैं.
लॉरिन कहती हैं कि जब हम किसी बात पर अटके रहते हैं तो हमारे ज़हन की ढेर सारी एनर्जी उसमें लग जाती है. ऐसे में हमारा दिमाग़ ऐसे तर्क तलाशता है, जो हमें तसल्ली दे सकें. इससे हमारे दिमाग़ पर से बोझ कम होता है और वो दूसरी जानकारियां प्रॉसेस कर पाता है.
शायद यही वजह है कि बहुत से तानाशाही निज़ामों को लोग धीरे-धीरे मंज़ूर कर लेते हैं, ताकि ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ सके.
अपेक्षा और हक़ीक़त की तुलना
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की कई रिसर्च कहती हैं कि हम बुरी घटनाओं को लेकर भविष्य के बहुत बुरे अंदाज़े लगाते हैं. इसी तरह अच्छी बातों के हवाले से ख़्वाबों के कुछ ज़्यादा ही लंबे पुल बांध लेते हैं. दोनों ही सूरतों में असल हालात हमारी कल्पनाओं से कमतर होते हैं. बुरी से बुरी आशंका उतनी बुरी नहीं होती, जितना हम सोच रहे होते हैं. इसी तरह अच्छी अपेक्षाएं हक़ीक़त में उतनी अच्छी नहीं होतीं.
हम बुरी बातों को लेकर ये सोचते हैं कि इतना बुरा होगा कि हम झेल ही नहीं पाएंगे. इसी तरह अच्छी घटनाओं के बारे में हम ये सोचते हैं कि इससे हमारी ज़िंदगी ही बदल जाएगी. पर दोनों ही हालात में हम इंसान तो वही रहते हैं.
तो शुरुआती असर के बाद हमारे जज़्बात कमज़ोर पड़ जाते हैं.
राय बनाने में समाज के बड़े तबके की सोच अहम
यही बात किसी बड़े नीतिगत फ़ैसले को लेकर हमारे रिएक्शन पर भी लागू होती है. मसलन, नोटबंदी को लेकर शुरुआत में बड़ी तीखी प्रतिक्रियाएं आईं. धीरे-धीरे लोग उसके अभ्यस्त हो गए. विरोध कम हो गया.
तो क्या इसका ये मतलब है की नीतियां बनाने वाले सनक में कोई भी फ़ैसला ले सकते हैं. ये सोचकर कि आगे चलकर तो जनता इनकी अभ्यस्त हो ही जाएगी?
ऐसा नहीं होता. ऐसा होता तो दुनिया में कहीं भी सरकार वोट से नहीं बदली जाती. या इंक़लाब नहीं आते. क्रांतियां नहीं हुई होतीं.
जो चीज़ें मुश्किल से बदलती हैं, उन्हें लेकर हम तर्क गढ़ लेते हैं मगर किसी बात पर अगर समाज का बड़ा तबक़ा विरोध में खड़ा हो जाता है तो लोग उसके पक्ष में तर्क देना बंद कर देते हैं. फिर वो ये समझते हैं कि अगर वो उस बात का विरोध करेंगे तो उनके साथ बहुत से लोग होंगे.
यही वजह है बड़े अभियानों के साथ लोग जुड़ते चले जाते हैं.
हां, हक़ीक़त ये भी है कि हम सब कुछ नहीं बदल सकते. तो, जो है उसे स्वीकार करके दिमाग़ी सुकून हासिल करना, हमारे लिए बेहतर है.
-क्लाउडिया हैमंड BBC

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