विश्व स्वास्थ्य दिवस पर अवसाद विषय पर सुनिए सद्गुरू जग्‍गी वासुदेव के विचार

sadhguru jaggi vasudev
विश्व स्वास्थ्य दिवस पर अवसाद विषय पर सुनिए सद्गुरू जग्‍गी वासुदेव के विचार

आज 7 अप्रैल है और आज ही मनाया  जाता है विश्व स्वास्थ्य दिवस । इस बार संयुक्त राष्ट्र ने विश्व स्वास्थ्य दिवस पर ‘अवसाद’ विषय पर फोकस किया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के ताजा अनुमानों के मुताबिक, दुनियाभर में 30 करोड़ से अधिक लोग अवसाद से ग्रस्त हैं. सद्गुरू जग्गी वासुदेव अवसाद विषय पर कहते हैं कि भारत में अपने में ही मगन युवाओं की तादाद बेहद कम है. वह शहरी रईसों के परिवार से आने वाले युवा हैं. बाकी देश का युवा ऐसा नहीं है. यहां लोग समुदायों पर आधारित हैं. ऐसे में लोग इतने अवसादग्रस्त नहीं हैं जितने यूरोपीय देशों के लोग हैं. पश्चिमी देशों में सबसे बड़ी दिक्कत अकेलापन है.

भारत में अकेलेपन की समस्या नहीं है क्योंकि कोई न कोई आपसे जुड़ा ही रहता है, टकरा ही जाता है. कई बार इससे खीझ भी होती है, लेकिन ये लोगों को दिमागी तौर पर सेहतयाब रखने में बहुत मददगार है. लेकिन अब हम सामुदायिक भावना से दूर हो रहे हैं. हमें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी.
अब आध्यात्मवाद, पूंजीवाद से प्रेरित जरूरत हो गई है। इस बात के तमाम वैज्ञानिक और मेडिकल सबूत हैं कि आपका शरीर और दिमाग तभी सबसे अच्छा काम करते हैं जब वह अच्छा महसूस करें. अगर आप इस दुनिया में कामयाब होना चाहते हैं तो जरूरी है कि आप अपने शरीर और दिमाग से अच्छे से अच्छा काम ले सकें. आप कामयाबी से ऐसा कर लेते हैं, तो क्या आप दुनिया में नाकाम रहेंगे? दुखी लोग कामयाब नहीं हो सकते.

आध्यात्मिक प्रक्रिया अपनी ताकत का इस्तेमाल करना है. आप किसी फोन के बारे में पूरी जानकारी रखते हैं तो आप इसका बेहतर इस्तेमाल कर सकेंगे. यही बात हमारे दिमाग पर भी लागू होती है. हमारा दिमाग पूरी दुनिया का सबसे पेचीदा और ताकतवर गैजेट है.

आध्यात्म कोई विकलांगता नहीं. ये खुद के शरीर और दिमाग से हासिल होने वाली सबसे बड़ी ताकत है. अगर आप अपनी प्रकृति से वाकिफ होंगे तो आपकी ऊर्जा, आपके इमोशन आपके लिए काम करेंगे, आपके खिलाफ नहीं.

ये कुछ वैसा ही है जैसे आपके पास पूरी जानकारी है तो फोन से आप पूरा ब्रह्मांड पा सकते हैं. और उसकी खूबियां नहीं जानते तो आप अपने दोस्त को बस कॉल या मैसेज कर पायेंगे.

बात है कि सोशल मीडिया की वजह से डिप्रेशन बढ़ रहा है क्योंकि लोगों को दूसरों की उपलब्धियां ज्यादा मालूम होती हैं? क्या हम लगातार सच से इनकार करते रहते हैं?
तो इसका जवाब है कि आपको दिया गया हर तोहफा आपके लिए मुसीबत बन गया है क्योंकि आप दुनिया में खुशियों की तलाश कर रहे हैं. आपको समझना होगा कि हर इंसानी तजुर्बा भीतर से आता है. अगर आप फेसबुक से खुशी तलाश कर रहे हैं, तो आप दुखी ही रहेंगे क्योंकि आप सारे चेहरे ही गलत देखेंगे.

हर तकनीक जो आपके पास है वह आपकी जिंदगी बेहतर बनाने के लिए है, आपकी खुशी छीनने के लिए नहीं. आपको मजबूरी से जागरूकता की तरफ बढना होगा. आपका दिमाग ही आपकी मुसीबतों की जड़ है. क्या आप एक कीड़े वाला दिमाग चाहते हैं? क्यों?

हमें विकास की करोड़ों साल की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा तब जाकर हम यहां तक पहुंचे हैं. जब लोग अपने आप में मगन हैं, खुश हैं तभी उनकी बुद्धिमत्ता बेहतर काम करेगी. अभी तो तकलीफ के डर ने ही आपको जकड़ रखा है. आप फेसबुक को, फोन को, तकनीक को दोष दे रहे हैं. क्योंकि आपकी अपनी बुद्धि ही आपके खिलाफ हो गई है.

अगर आपका अस्तित्व आपके हाथ में हो, तो आप अपने लिए खुशी ही चुनेंगे.
हमारी शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों के दौर की देन है. उन्होंने ऐसा सिस्टम बनाया कि इससे निकले लोग आदेश मानें. ये अंग्रेज हुकूमत की जरूरत थी. हमें देखना चाहिए था कि आजाद देश को कैसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है.

हमें आजाद लोग चाहिए जिनके दिमाग भी तमाम बंदिशों से स्वतंत्र हों. हमारे देश की बड़ी आबादी भयंकर गरीबी में रहती आ रही है. ऐसे में शिक्षा व्यवस्था का मकसद एक अदद नौकरी हासिल करने तक सीमित रह गया. ऐसे में किसी को जिंदगी की जरूरियात के लिए शिक्षित ही नहीं किया गया.

2015 में 18 हजार बच्चों ने खुदकुशी कर ली थी. जब तक हम ये नहीं मान लेते कि हम कुछ तो गलत कर रहे हैं, तो हम सही जिंदगी नहीं हासिल कर सकेंगे.

जब भी जिंदगी का मसला आया तो दुनिया ने उम्मीद भरी नजरों से हिंदुस्तान की तरफ देखा. दुनिया को भारतीय संस्कृति से ही नया रास्ता दिखाने की उम्मीद थी. हमारे पास जो कुछ भी था, आज हम वह इस्तेमाल करके आगे नहीं बढ़ रहे हैं. बल्कि खुद को पश्चिमी नजरिए से देख रहे हैं.

हम भारतीयता के बारे में कुछ भी कहेंगे तो लोग उसे राष्ट्रवादी पागलपन करार देने लगेंगे. हमारे यहां 120 तरह के हथकरघे थे. किसी दौर में हम दुनिया के सबसे अच्छे कपड़ा उद्योग वाले देश थे. आज हम इस खूबी को खत्म कर रहे हैं क्योंकि हमारे लिए ब्रिटिश कपड़ा उद्योग मिसाल बन गया. हम ग्रीनविच मीन टाइम में अटककर रह गए हैं.

साथ ही मैं ये भी कहूंगा कि हमें भारतीयता को लेकर कट्टर रवैया नहीं अपनाना चाहिए. इतिहास हमें बताता है कि हम भारतीयों ने बाहर से जो भी आया उसे स्वीकार किया, उसे अपना लिया. फिर भी हम अपनी पहचान बचाये और बनाये रखने में कामयाब रहे.

ये ऐसा देश है जिसने इंसान के भीतर के सिस्टम को जाना समझा. हमारी खूबी यही है कि हम जानते हैं कि इंसान किस तरह खुश रह सकता है. ये ऐसी जानकारी है जिसे हम बाकी दुनिया को सीख के तौर पर दे सकते हैं. लेकिन पहले हम हिंदुस्तानियों को खुद इस बात को जानना समझना होगा.

– Legend News

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