सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर बैन दलितों के साथ छुआछूत की तरह: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट सलाहकार ने कहा है कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर बैन ठीक उसी तरह है, जैसे दलितों के साथ छुआछूत का मामला। कोर्ट सलाहकार राजू रामचंद्रन ने कहा कि छुआछूत के खिलाफ जो अधिकार है, उसमें अपवित्रता भी शामिल है। अगर महिलाओं का प्रवेश इस आधार पर रोका जाता है कि वह मासिक धर्म के समय अपवित्र हैं तो यह भी दलितों के साथ छुआछूत की तरह है।
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई चल रही है। याचिका में उस प्रावधान को चुनौती दी गई है, जिसमें 10 से 50 वर्ष आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक है। राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि अगर महिलाओं को मासिक धर्म के कारण रोका जाता है तो ये भी दलित के साथ छुआछूत की तरह है और उसी तरह के भेदभाव जैसा ही मामला है।
गौरतलब है कि संविधान में छुआछूत के खिलाफ सबको प्रोटेक्शन मिला हुआ है। धर्म, जाति, समुदाय और लिंग आदि के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।
बता दें कि केरल हाई कोर्ट ने अपने फैसले में महिलाओं के प्रवेश के बैन को सही ठहराया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि मंदिर में प्रवेश से पहले 41 दिन का ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है और मासिक धर्म के कारण महिलाएं इसका पालन नहीं कर पाती हैं। सुनवाई के दौरान केरल त्रावणकोर देवासम बोर्ड की ओर से पेश सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि दुनिया भर में अयप्पा के हजारों मंदिर हैं, वहां कोई बैन नहीं है लेकिन सबरीमाला में ब्रह्मचारी देव हैं और इसी कारण तय उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर बैन है, यह किसी के साथ भेदभाव नहीं है और न ही जेंडर विभेद का मामला है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने पूछा कि इसके पीछे तार्किक आधार क्या है? आपके तर्क का तब क्या होगा अगर लड़की का 9 साल की उम्र में ही मासिक धर्म शुरू हो जाए या जो ऊपरी सीमा है उसके बाद किसी को मासिक धर्म हो जाए? इस दौरान सिंघवी ने कहा कि ये परंपरा है और उसी के तहत एक उम्र का मानक तय हुआ है। मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए बुधवार को कहा था कि महिलाओं का संवैधानिक अधिकार है कि वह सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करें और पूजा अर्चना करें। उनके साथ कोई भेदभाव नहीं हो सकता। मंदिर निजी संपत्ति नहीं है बल्कि सार्वजनिक संपत्ति है और इस नाते यदि पुरुष वहां जा सकते हैं, तो किसी भी उम्र की महिला भी जा सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संवैधानिक बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसके तहत मंदिर में 10 साल से लेकर 50 साल तक की उम्र की महिला के प्रवेश पर रोक लगाई गई है।
-एजेंसी

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