Handicrafts से बदली उत्तराखंड की इन महिलाओं की ज़िंदगी

ग्रामीण परिवेश में सामाजिक दबाव से निकलकर उन्होंने Handicrafts में कुशलता हासिल की और आज उनका आत्मविश्वास उनकी ताकत बन चुका है

रानीखेत। उत्तराखंड के रानीखेत में रहने वाली मीरा रेखाड़ी ने 2005 में अपने पति को खो दिया। तब वे महज 21 साल की थी। उस कच्ची उम्र में उनके सामने दो छोटे बच्चों की जिम्मेदारी थी और ज़िंदगी पहाड़ सी मुश्किल महसूस होती थी। पिछले एक दशक में मीरा ने लम्बा रास्ता तय किया है। ग्रामीण परिवेश में सामाजिक दबाव से निकलकर उन्होंने Handicrafts में कुशलता हासिल की और आज उनका आत्मविश्वास उनकी ताकत बन चुका है।

मीरा कहती हैं, “पति की मौत के बाद लोग मुझे हमदर्दी की नज़र से देखते थे लेकिन मुझे सम्मान चाहिये था। अब मैं अपनी जिंदगी खुद चला रही हूं। मेरे बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं और मैं किसी पर निर्भर नहीं हूं।”

उत्तराखंड के रानीखेत की ये कुछ महिलायें बदलाव का एक पाठ लिख रही हैं। अपने Handicrafts और कुशल मार्केटिंग के दम पर इन लोगों ने एक ऐसी कड़ी बनाई है जहां इनके हुनर को सम्मान मिल रहा है और उत्पादों की सही कीमत भी। कभी रानीखेत के पब्लिक स्कूल में टीचर रही चयनिका ने करीब 15 साल पहले हिलक्राफ्ट नाम से यह शुरुआत की थी। तब उनके साथ केवल 6 महिलायें थीं। आज वह शुरुआत कुल 54 महिलाओं के तीन स्वयं सहायता समूहों का रूप ले चुका है। चयनिका बताती हैं कि “ये सभी महिलाएं ग्रामीण परिवेश की हैं। इनमें से ज्यादातर का नाता कभी भी कागज, पेंसिल और स्केल से नहीं रहा लेकिन जब ये यहां पर आई तो हमने इन्हें ट्रेनिंग दी और यह इतनी कुशल हैं कि इन्होंने बहुत जल्दी यह काम सीख लिया।”

आज ये महिलायें ग्रीटिंग कार्ड, कृत्रिम आभूषण और कई तरह के झोलों के साथ सजावटी सामान बनाती हैं जिनमें कढ़ाई, क्रोशिये और रंगों का कमाल दिखता है। ये सारे उत्पाद देश के भीतर नहीं बल्कि यूरोप के नॉर्वे में बेचे जाते हैं जहां इनकी अच्छी कीमत मिल रही है। चयनिका कहती हैं कि हिलक्राफ्ट की शुरुआत ही इस फलसफे के साथ हुई कि लोग महिलाओं का बनाया यह सामान दया भाव से न खरीदें बल्कि उम्दा क्वॉलिटी की वजह से खरीदें। उनके मुताबिक हर रोज 5 महिलाओं की टीम इन उत्पादों की क्वॉलिटी पर नज़र रखती हैं।

“हर उत्पाद की तीन बार जांच होती है। ताकि कोई कमी न रहे। एक मॉडल सैंपल पहले तैयार किया जाता है और हर उत्पाद को उसी के साथ मिलाया जाता है। अगर वह सैंपल जैसी क्वालिटी के बराबर न हो तो उसे वापस फिर से बनाने के लिए भेज दिया जाता है” क्वॉलिटी कंट्रोल की ज़िम्मेदारी निभा रही कविता जोशी कहती हैं।

एक ऐसे वक्त में जब सरकार स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों के जरिए युवाओं में कौशल पैदा करने और उन्हें स्वरोजगार से जोड़ने की कोशिश कर रही है, उस वक्त इन महिलाओं ने यह दिखा दिया है कि अपने दम पर ये कितना आगे जा सकती हैं। इन उत्पादों को विदेशी खरीदारों से जोड़ने में चयनिका की साथी लूने जैकबसन का रोल है। लूने खुद यूरोपियन नागरिक हैं और भारत में पर्यटन के कारोबार से जुड़ी हैं। वह कहती हैं, “हस्तशिल्प का जो हुनर इन महिलाओं के पास है वह विदेश में लोगों के पास नहीं है। इसलिये ऐसे उत्पादों की बड़ी मांग है। हम इस बात का खयाल रखते हैं कि वहां कैसा ट्रेंड चल रहा है और उसके मुताबिक रंगों और कारीगरी में बदलाव करते रहते हैं।” आज इन 54 महिलाओं के 3 स्वयं सहायता समूह हैं जिनके अपने बैंक खाते हैं और इन लोगों के पास कर्ज़ लेने की सुविधा है। इसी ग्रुप में शुरुआत से जुड़ी दीपा पडलिया कहती हैं कि सबसे बड़ी उपलब्धि महिलाओं में आया बदलाव और आसमान छूता उनका आत्मविश्वास है। “पहले हमारी अपनी कोई पहचान नहीं थी लेकिन अब हम अपने नाम और हुनर से जाने जाते हैं।”

साभार: गांव कनेक्‍शन

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