जीवन अनमोल है परन्तु उसके लिए, जो इसे पहचान सके

बड़े भाग मानुष तन पावा | सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थन्हि गावा ||
साधन् धाम मोक्ष कर द्वारा | पाई न जेहिं परलोक सँवारा ||
||रा.च.मा./उ.का./42||

भाव यही है कि देवताओं को भी दुर्लभ मनुष्य शरीर में साधन, भजन, सद्कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्ति सम्भव है। अर्थात् मनुष्य देह मोक्ष का द्वार है।
अब हमें प्रसन्न होना चाहिए की देवता भी जिस शरीर को पाने की कामना करते हैं, हमें तो सहज ही प्राप्त हो गया है।

संसार को एक अलग दृष्टि से देखें तो संसार और प्रकृति के अकूत सौंदर्य को देख कर देवताओं की कामना उचित ही है। इसी पवित्र धरा पर स्वयं नारायण के अनेकानेक अवतार हुए हैं। भगवती के अनेक रूपों का प्राकट्य हुआ है। जिस धरा के 52 दिव्य स्थानों पर माँ के पवित्र अंग गिर कर शक्तिपीठ के रूप में स्थापित हुए हैं। माँ गंगा के सुलभ दर्शन इसी पवित्र भूमि पर ही सम्भव हैं।

सनातन काल से आज भी अनवरत भक्तों के प्रेम भाव वश इस धरा पर प्रभु नित्य लीला रचा रहे हैं। ऐसी कृपानुभूति तो बैकुंठ में भी दुर्लभ हैं।
यही तो वह संसार है- मनुष्य जीवन है, जिसमें स्वयं नारायण को भी आना पड़ा। फिर संसार में मात्र दोष ही क्यों देखें? क्यों सोचें कि संसार में रह कर भजन नहीं हो सकता। क्या कभी किसी का संसार छूटा है? संसार से तो छूटने की व्यवस्था ही नहीं है! सांसारिक मोह, माया, बंधन से ऊपर अवश्य उठा जा सकता है।

स्वयं नारायण एवं आद्या शक्ति भगवती भी जब जब इस संसार के कल्याण लिए इस मृत्युलोक में आए, आज भी उनका वह दिव्य स्वरूप संसार में ही हैं, भले उस दिव्य ऊर्जा का स्वरूप बदल गया है।

आज शक्तियों के उन दिव्य स्वरूपों के दर्शन तीर्थों, उनके प्राकट्य स्थलों, मंदिरों, वन, उपवन, महापुरुषों के प्रवचन और उनके अनुभवों में हो रहे हैं। ब्रज के कण कण में प्रिया प्रियतम की अनुभूति भक्त जन कर रहे हैं।
आज भी ब्रज के अनेक रसिक संत-भक्तजन को निरन्तर श्री राधा माधव की अनेकानेक लीलाओं के दर्शन हो रहे हैं। भक्त माल में तो ऐसे रसिक भक्तों के प्रसंग सुनकर हृदय में प्रभु कृपा की साक्षात अनुभूति हो उठती है। अनेक प्रसंग हैं जहां रसिक संत जन को व्रज की कुंज गलियों में खेलते, ब्रजवासी बालकों -बालिकाओं में ठाकुर जी की लीलाओं के दर्शन हुए। ठाकुर जी अपने प्राकट्य रूप में संसार से गए ही कब हैं? आद्या शक्ति भगवती संसार से गयीं कहाँ? अनंत रूपा माँ भगवती आज भी अपने प्राकट्य स्वरूप की ऊर्जा में भक्तों के कल्याणार्थ नित्य उपस्थिति हैं।

ऋषि मुनि, संतों की सनातन काल से चली आ रही महान परम्पराओं को चिन्तन नमन करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि पहाड़ों, कन्दराओं आदि में सहस्त्रों वर्ष तक तप रत रह कर जो उन्होंने अर्जित किया, वह संसार के कल्याण के लिए ही दिया। सनातन धर्म की महान परम्परायें, विलक्षण शास्त्र, अलौकिक अशेष विद्या उन्हीं ऋषि मुनि, संतों के तप का फल ही तो है जिनके लिए सामान्य धारणा है कि उन्होंने संसार को त्याग दिया था। महर्षि चरक आदि ने तप बल से प्राप्त आयुर्वेद के ज्ञान को इसी संसार को ही तो दिया।

विचार करें यदि संसार को त्याग दिया होता तो जो सनातन धर्म की अनंत सम्पदा हैं, वह संसार को मिलती कैसे? यदि उनको संसार से प्रेम नहीं होता तो ऐसी कृपा करते क्यों? सत्य है महापुरुष कभी भी संसार के विकारों एवं प्रपंच में नहीं उलझते। कदाचित क्षणिक उलझते दिखे भी तो उन से क्षणमात्र में मुक्त भी हो गए।

इस संसार से छूटने की कोई व्यवस्था ही नहीं है और छूटने की आवश्यकता भी क्यों है? संसार के भोगों और पाप कर्मों में लिप्त रह कर संसार को कैसे समझ सकते हो? कैसे संसार के सौंदर्य को देख सकते हैं? भोग-वासनाओं, पापकर्म में लिप्त रह कर तो संसार में रोग-शोक, संताप आदि ही दिखेंगे।

जहां कर्मयोग के रहस्य को समझ लोगे, सनातन ग्रंथों और भगवान की लीलाओं का चिन्तन कर लोगे! संसार और प्रकृति के लिए अथाह प्रेम उत्पन्न हो उठेगा। इस पुण्य भूमि पर जन्म भी तो अनेकानेक जन्मों के संचित पुण्यों का फल ही तो है। जब इस जन्म के लिए तप किया है, पुण्य किए हैं तो आगे की यात्रा के लिए भी तो साधन-भजन करना पड़ेगा।
इस देह में भी तो पंच तत्व की मिलावट है। ध्यान से देखोगे तो समझ जाओगे की सम्पूर्ण शरीर में कितनी जटिलता है। कितने जोड़ और हिस्सों को एक रूप दिया है। आत्मा अपना मार्ग ले लेगी। जल-वायु-अग्नि-आकाश अपने स्थान को प्राप्त कर लेंगे किंतु एक तत्व, यह पृथ्वी तो रहेगी। सोचना ही व्यर्थ है की इस संसार में रह कर आध्यात्मिक उन्नति सम्भव नहीं। अध्यात्म का मार्ग किसी भी युग में सहज नही था और आज भी नहीं है किंतु यदि मार्ग निश्चित कर लिया तो प्राप्ति पूर्ण सम्भव है। हृदय में यदि संसार और प्रकृति से प्रेम है तो मार्ग और भी सहज हो जाएगा।
संत रामानुजाचार्य जी के पास एक किशोर आया और बोला महाराज मुझे आध्यात्म का मार्ग दिखाइए जिससे परमात्मा के लिए मेरे हृदय में प्रेम जाग्रत हो। संत ने पूछा कि कभी जीवन में किसी परिवारजन अथवा किसी अन्य के लिए प्रेम उत्पन्न हुआ है ? उसने कहा नहीं महाराज, सब व्यर्थ के बंधन है, मुझे कभी किसी से प्रेम नहीं रहा।
संत ने कहा मैं तुम्हारे हृदय में परमात्मा के लिए प्रेम नहीं जगा सकता। यदि तुम्हारे हृदय में कभी प्रेम उत्पन्न हुआ होता तो मैं उस बीज को सींच कर वृक्ष बना सकता था।

भाव यही है यदि हमें संसार और प्रकृति के सत्य भाव का ही ज्ञान नहीं है तो ईश्वर प्राप्ति कैसे सम्भव है। अकर्मण्य और भाव शून्य व्यक्ति आध्यात्म के मार्ग का अनुसरण नहीं कर सकते। संसार को कुछ देने की कामना रख कर ही आध्यात्मिक उन्नति अधिक सहज है।

आवश्यक है कि पाप कर्मों एवं वासनाओं को त्याग कर अपनी समृद्ध सनातन परम्पराओं एवं शास्त्रों का अनुसरण करें। जो कौशल सांसारिक भोगों में लगा रहे हो, उसको योग में लगा दें।

गीता में स्वयं योगेश्वर श्री कृष्ण ने कहा है –

योग: कर्मसु कौशलम्” (गीता २/५०)
इसको दो अर्थ में देखना चाहिए ,
पहला : कर्मसु कौशलं योग: अर्थात् कर्मों में कुशलता ही योग है।
दूसरा: कर्मसु योग: कौशलम् अर्थात् कर्मों में योग ही कुशलता है।
गीता एवं अन्य अनेकों सनातन शास्त्रों में निषिद्ध अथवा त्याज्य कर्मों को विस्तार से बताया गया है। अतः कौशलपूर्वक धर्म सम्मत कर्म करने में ही और कौशल की अनुभूति की जा सकती है।

अध्यात्म की अनन्त ऊर्जा और असंख्य मार्ग उपलब्ध हैं। उनको तुम्हें ही खोजना है। तुम्हारी खोज उस मार्ग के लिए तुम्हारे प्रेम पर ही निर्भर करेगी।
अबोध बालक मल मूत्र में भी लिपटा हो, माँ की गोद में आने को मचल उठता है। माँ भी उसको प्रेम से उठा कर उसके शरीर पर लगी गंदगी को साफ़ कर हृदय से लगा लेती है। माँ उसके निर्मल हृदय में उमड़ रहे प्रेम और विश्वास से अभिभूत हो उठती है, मल तो बालक की देह पर लगा है, हृदय तो उसका शुद्ध और निर्मल है।

उसको संसार का भान भी नहीं है, वह तो माँ के रूप को सर्वस्व भाव से देख कर मचल रहा है, उसकी गोद के लिए। यदि हृदय पूर्ण निश्चल और निष्काम है। हृदय में पूर्ण शरणागति भाव है तो बिना किसी साधना अथवा साधन के कृपा प्राप्ति निश्चित है। शरणागति भाव और निष्काम प्रेम के दर्शन तो हर युग में दुर्लभ ही रहे हैं, फिर इस घोर सांसारिक समय में उसकी कल्पना भी कैसे हो? लोभ, स्वार्थ और अहं ने जीवन को जकड़ा हुआ है। संसार के भोगों के लिए सम्पूर्ण संसाधन और कौशल का उपयोग हो रहा है। स्वयं पाप पुण्य, सेवा, भक्ति आदि की परिभाषाएँ बना रहे हो।संसार के लिए ज्ञानी और आध्यात्म मार्ग में अज्ञानी बन खड़े रहने से कोई उपलब्धि नहीं होगी।

सांसारिक भोगों के लिए तड़प और अध्यात्म में “जो प्रभु इच्छा”, यह तो छल है। संसार में अलग और अध्यात्म में अग़ल आवरण धारण कर लेने से मार्ग अथवा लक्ष्य की प्राप्ति अत्यंत कठिन है। लोभ -मोह के पोषण में अपने मन के अनुरूप पाप पुण्य की परिभाषा बना सकते हो, लेकिन पाप पुण्य की प्राप्ति को नहीं बदल सकते। जिस प्रकार संसार को प्राप्त करने के लिए सारा कौशल और बुद्धि लगा देते हो, आध्यात्म की प्राप्ति के लिए विवेकपूर्ण कौशल लगाना होगा। निरन्तर आध्यात्मिक उन्नति के लिए कर्म रत रहना होगा।

मन, वाणी और कर्म में शुद्धता लाए बिना अध्यात्म मार्ग पर चलने अथवा दिखने का उपक्रम कर सकते हो, चलना असम्भव सा है। आसक्ति और कर्तव्य का भेद समझना आवश्यक है। कर्ता का अहंकार और सांसारिक लोभ-प्रलोभन को भी दूर करना होगा। अहंकार का मूलाच्छेदन किए बिना संसार अथवा परमार्थ दोनों को प्राप्त करना दुर्लभ है।

जिस क्षण मनुष्य योनि के उद्देश्य और इससे होने वाली अनंत प्राप्तियों का सच्चा बोध हो गया , जीवन एक अलग ही मस्ती की धारा को पकड़ लेगा।
एक महान संत के पास एक दुखी व्यक्ति गया। बोला महाराज इस जीवन का क्या मोल है? संत ने उसको एक चमकीला पत्थर देकर कहा, जाकर इसका मोल लगवा कर आओ, परन्तु इसको किसी को देना नहीं। वह एक फल वाले के पास मोल लगवाने गया। पत्थर की चमक से प्रभावित होकर उसने बदले में बारह संतरे देने को कहा। सब्ज़ी वाले को दिखाया तो उसने कहा एक बोरी आलू ले लो। उसने सुनार को दिखाया तो वह बदले में एक हज़ार अशर्फ़ी देने को तत्पर था। अंत में उसको एक जौहरी मिला जब उसने उसे वह पत्थर दिखा कर उसकी क़ीमत पूछी तो उसने पहले लाल वस्त्र उस पत्थर को रख कर प्रणाम किया। फिर पूछा कि यह बेशक़ीमती माणिक्य कहाँ से मिला? जौहरी ने कहा कि यदि मैं अपनी सारी सम्पत्ति भी तुमको दे दूँ तो वह भी इसका मूल्य नहीं है। मैं इस बेशक़ीमती माणिक्य को नहीं ख़रीद सकता। जब संत को वापस जाकर उसने विस्तार से बताया तो संत ने कहा यह जीवन भी अनमोल है परन्तु उसके लिए जो इसको पहचान ले।

भाव यही है यदि हमें संसार और प्रकृति के सत्य भाव का ही ज्ञान नहीं है तो ईश्वर प्राप्ति कैसे सम्भव है। अकर्मण्य और भाव शून्य व्यक्ति आध्यात्म के मार्ग का अनुसरण नहीं कर सकते। संसार को कुछ देने की कामना रख कर ही आध्यात्मिक उन्नति अधिक सहज है। सनातन ऋषि मुनि ने भी जो कल्याणप्रद ग्रंथ, आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति आदि जो मनुष्यों के कल्याण को दिए हैं, उसमें भी उनका, संसार के मंगल का ही भाव निहित है। अतः प्रकृति और मानवता की सेवा का भाव लेकर ही पुरुषार्थ चतुष्टय को प्राप्त किया जा सकता है।
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– कप‍िल शर्मा,
सच‍िव श्रीकृष्ण जन्मस्थान,
मथुरा

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