आंखों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का LG अनिल बैजल ने उद्धाटन किया

नई दिल्ली। LG अनिल बैजल ने आज आंखों के दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का राजधानी में उद्धाटन किया। सम्मेलन में देश-विदेश से लगभग एक हजार नेत्र रोग विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं।

इंट्राकलर इम्पलांट एंड रेफ्रेक्टिव सोसायटी (आईआईआरएसआई) इस सम्मेलन का आयोजन कर रही है. आईआईआरएसआई की तकनीकी कमेटी के अध्यक्ष और भारत में नेत्र चिकित्सा संस्थानों की सबसे बड़ी श्रंखला सेंटर फॉर साइट के सीएमडी पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डॉ.महिपाल एस. सचदेव ने कहा कि ‘ भारत में 11.2 प्रतिशत जनता बचाई जा सकने वाली अंधता से पीडि़त है और दुनिया में तीसरा अंधा व्यक्ति भारत से होता है। ऐसे में यह ऐसा विषय है, जिसके बारे में युद्धस्तर पर कुछ किया जाना जरूरी है।

हर वर्ष बीस लाख नए रोगी इस रोग से पीडि़त होते है। ऐसे में इस बात में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि समस्या के पीडि़तों के कारण आना वाला आर्थिक और सामजिक भार देश के सम्पूर्ण विकास को प्रभावित कर रहा होगा। जो प्रभावित हैं, उनके जीवन की गुणवत्ता तो प्रभावित हो रही होगी।

सम्मेलन में दो दिन के दौरान नेत्र चिकित्सा के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ 300 चर्चाएं करेंगे। इसके अलावा सर्जिकल स्किल ट्रांसफर सेशन भी होगा। इसमें नेत्र चिकित्सा प्रोसीजर्स के सर्जिकल परिणाम बेहतर करने के लिए तकनीक और अनुभवों का आदान-प्रदान किया।

यह बैठक इस मायने मे अनूठी है कि इसमे ऑप्थोलमिक मैन्यूफेक्चरिंग इंडस्ट्री से जुडे बड़े नाम भी शामिल हो रहे है। इनका नेतृत्व जॉनसन एंड जॉनसन के ग्लोबल हैड (सर्जिकल) टॉम फ्रि जी का करेंगे। इंडस्ट्री और नेत्र चिकित्सकों को उम्मीद है कि तकनीक की लागत को कम करने, आधुनिक मशीनों पर काम करने की ट्रेनिंग और विशाल ग्रामीण जनता तक इसका लाभ पहुंचानेे के बारे में सार्थक चर्चा हो सकेगी।

डॉ.सचदेव ने कहा कि अंधता से बचाव और इसे रोकने के लिए दूरस्थ गांव में बैठे अंतिम आदमी तक तकनीक को पहुंचाना ही एक मात्र उपाय है। इस बात को हम जितना जल्दी समझ लें, उतना ही अच्छा है। नेत्र रोगों के उपचार के लिए आधुनिक तकनीक का प्रयोग करने से न सिर्फ मरीज जल्दी ठीक होता है बल्कि मानव श्रम दिवस बचते हैं और प्रभावित व्यक्ति जल्द अपने काम पर लौट पाता है। इसके साथ ही एक निश्चित समय में दृष्टि ठीक करने के ऑपरेशन करने की संख्या भी बढ़ती है।

इस तकनीक को ग्रासरूट लेवल तक पहुंचाना और दूरस्थ अस्पतालों में नेत्र चिकित्सकों, टेक्नीशियन्स को इन तकनीकों के प्रयोग के बारे में प्रशिक्षित करना सबसे बड़ी चुनौती है।