कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी मनाइए जरूर, किंतु सिर्फ घंटे-घड़ियाल बजाकर नहीं

सोलह कला अवतार महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण का आज 5246वां जन्‍मदिन है। आज से श्रीकृष्‍ण अपनी उम्र के 5247वें वर्ष में प्रवेश करेंगे। परंपरा के अनुसार देशभर में कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी मनाई जा रही है।
कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी का पर्व बेहद महत्‍वपूर्ण इसलिए है क्‍योंकि कृष्‍ण ने महाभारत का युद्ध शुरू होने से पहले अपने सखा अर्जुन को जो उपदेश दिया, वह मानवमात्र को उसका जीवन सार्थक करने की कला सिखाता है। कृष्‍ण अपने व्‍यवहार में लोगों को अत्‍यंत निकट महसूस होते हैं और संभवत: इसीलिए कृष्‍ण का जन्‍मदिन दूसरे अवतारों की अपेक्षा ज्‍यादा हर्ष व उल्‍लास का अनुभव कराता है।
प्रसन्‍नचित्त से और उत्‍सव की तरह किए गए किसी भी कार्य के फलदाई होने की संभावना अधिक होती है क्‍योंकि उसे इंसान अपने ऊपर भार नहीं समझता।
आज देश तमाम तरह की समस्‍याओं से जूझ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में ये समस्‍याएं इतना विकराल रूप धारण कर चुकी हैं कि उनसे बाहर निकलना अब आवश्‍यक हो गया है।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्‍या कृष्‍ण जैसे कर्मयोगी का जन्‍मोत्‍सव हम सिर्फ औपचारिक रूप से मनाकर अपनी जिम्‍मेदारी पूरी कर सकते हैं। वर्तमान परिस्‍थितियों में क्‍या कृष्‍ण ऐसे रटे-रटाए जन्‍मोत्‍सव से प्रसन्‍न होंगे। क्‍या वास्‍तव में हम अपने आराध्‍य का जन्‍मोत्‍सव मनाते हैं अथवा उसे मानाने की खानापूरी उसी तरह कर लेते हैं जिस तरह दूसरे अन्‍य कार्यों की करते हैं।
कृष्‍ण तो कण-कण में विद्यमान हैं बशर्ते उन्‍हें महसूस किया जाए। वह किसी मंदिर तक सीमित नहीं हैं। वह गीता के हर श्‍लोक में हैं। वह कल-कल बहती कालिंदी में हैं। वह वायु में हैं, पेड़-पौधों और यहां तक कि गिरिराज की शिलाओं में हैं। प्रकृति के हर सोपान पर कृष्‍ण विराजते हैं।
जब कृष्‍ण हर जगह हैं तो मन में इतना कलुष क्‍यों है। क्‍यों वह कलुष धुल नहीं पाता। धर्म, संप्रदाय, जाति, ऊंच-नीच में उलझे लोग एक-दूसरे को मारने-मरने पर आमादा हैं।
मात्र भारत वर्ष ही नहीं, विभिन्‍न खांचों और मत-मतांतरों में विभाजित पूरा विश्‍व बारुद के ऐसे ढेर पर बैठा है जिसके फट जाने का खतरा हर पल बना रहता है।
आश्‍चर्य की बात यह है कि इस खतरे का आभास तो सब करते हैं किंतु इससे निकलने की युक्‍ति सोचने तक का समय किसी के पास नहीं।
कृष्‍ण के बाद इस धरा पर कोई अवतार नहीं हुआ, और इसलिए भी कृष्‍ण लोगों के सर्वाधिक निकट हैं। कालखंड में 5246 वर्ष का समय बहुत मायने नहीं रखता। यह बहुत निकट प्रतीत होता है, इसलिए कृष्‍ण भी बहुत निकट महसूस होते हैं।
कृष्‍ण से निकटता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम उसे केवल स्‍मरण न करें, उसका अनुसरण करें।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
अर्थात- साधु पुरुषों का उद्धार करने तथा पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना हेतु मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।
गीता का यह श्‍लोक मात्र पढ़कर कानों से निकाल देने के लिए नहीं है, और न इस प्रतीक्षा में बैठे रहने के लिए है कि कृष्‍ण फिर किसी दिन बांसुरी बजाते हुए आपके सामने आ खड़े होंगे और सारी समस्‍याएं दूर कर देंगे।
कृष्‍ण माध्‍यम हैं आपके। वह महाभारत जैसी विकट परिस्‍थितियों के बीच भी आपके सारथी बनकर आपको राह दिखा सकते हैं, कर्म करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं किंतु आपके लिए लड़ नहीं सकते। लड़ना आपको ही होगा।
जब तक कृष्‍ण के प्रकट होने का यह ध्‍येय समझ में नहीं आता तब तक उन्‍हें प्रतीकात्‍मक रूप से हर वर्ष प्रकट करने का कोई औचित्‍य नहीं। उनकी जन्‍माष्‍टमी मनाने का कोई अर्थ नहीं।
उन्‍हें प्रकट कीजिए अपने कर्मों में, अपनी जीवन पद्धति में, अपने आचार, विचार और व्‍यवहार में। जिस दिन आप यह कर लेंगे, उस दिन के बाद हर दिन कृष्‍ण जन्‍मोत्‍सव होगा, हर समस्‍या का समाधान होगा और गीता जैसा ग्रंथ सार्थक होगा। कृष्‍ण का जन्‍म भी सार्थक होगा और सार्थक होगी कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी।
कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी मनाइए जरूर किंतु इस संकल्‍प के साथ कि कृष्‍ण को हर घर में नहीं, हर मन में प्रकट होना है क्‍योंकि मन बड़ा चंचल है। उसे पकड़ लिया तो समझो, कृष्‍ण आपकी पकड़ से कभी दूर नहीं होंगे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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