जानिए…इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस के बारे में

युद्ध के मैदान में घायल सैनिकों की देखरेख के साथ-साथ युद्धबंदियों की सुरक्षा में भी आईसीआरसी काफी अहम भूमिका निभाती है।
आइए आज जानते हैं कि इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस (International Committee of the Red Cross) और इसकी भूमिका के बारे में-
इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस (आईसीआरसी) की स्थापना 1863 में हुई थी। यह संगठन सशस्त्र हिंसा और युद्ध में पीड़ित लोगों एवं युद्धबंदियों के लिए काम करती है। यह उन कानूनों को प्रोत्साहित करती है जिससे युद्ध पीड़ितों की सुरक्षा होती है। इसका मुख्यालय जिनीवा स्विटजरलैंड में है। आईसीआरसी को दुनिया भर की सरकारों के अलावा नेशनल रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट सोसायटीज की ओर से फंडिंग मिलती है।
एक भयावह युद्ध से आया रेड क्रॉस का आइडिया
स्विटजरलैंड के एक उद्यमी थे जॉन हेनरी डिनैंट। 1859 में वह फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय की तलाश में गए थे। उन दिनों अल्जीरिया पर फ्रांस का कब्जा था। डिनैंट को उम्मीद थी कि अल्जीरिया में व्यापारिक प्रतिष्ठान खोलने में नेपोलियन उनकी मदद करेंगे लेकिन डिनैंट को सम्राट नेपोलियन से मिलने का मौका नहीं मिला। इसी बीच वह इटली गए जहां उन्होंने सोल्फेरिनो का युद्ध देखा। एक ही दिन में उस युद्ध में 40,000 से ज्यादा सैनिक मारे गए और घायल हुए। किसी भी सेना के पास घायल सैनिकों की देखभाल के लिए चिकित्सा कोर नहीं थी। डिनैंट ने स्वंयसेवकों के एक समूह को संगठित किया। उन लोगों ने घायलों तक खाना और पानी पहुंचाया। घायलों का उपचार किया और उनके परिवार के लोगों को पत्र लिखा। इस घटना के 3 साल बाद डिनैंट ने अपने इस दुखद अनुभव को एक किताब के रूप में प्रकाशित किया। किताब का नाम था ‘अ मेमरी ऑफ सोल्फेरिनो’। उन्होंने युद्ध के भयावह दृश्य के बारे में पुस्तक में लिखा था। उन्होंने बताया कि कैसे युद्ध में अपने अंगों को गंवाने वाले लोग कराह रहे थे। उनको मरने के लिए छोड़ दिया गया था। पुस्तक के अंत में उन्होंने एक स्थायी अंतर्राष्ट्रीय सोसायटी की स्थापना का सुझाव दिया था। ऐसी सोसायटी जो युद्ध में घायल लोगों का इलाज कर सके। ऐसी सोसायटी जो हर नागरिकता के लोगों के लिए काम करे। उनके इस सुझाव पर अगले ही साल अमल किया गया।
रेड क्रॉस की स्थापना
फरवरी, 1863 में जिनीवा पब्लिक वेल्फेयर सोसायटी ने एक कमेटी का गठन किया। उस कमेटी में स्विटजरलैंड के पांच नागरिक शामिल थे। कमिटी को हेनरी डिनैंट के सुझावों पर गौर करना था। कमेटी के पांच सदस्यों का नाम इस तरह से है, जनरल ग्यूमे हेनरी दुफूर, गुस्तावे मोयनियर, लुई ऐपिया, थिओडोर मॉनोइर और हेनरी डिनैंट खुद। ग्यूमे हेनरी दुफूर स्विटजरलैंड की सेना के जनरल थे। एक साल के लिए वह कमेटी के अध्यक्ष रहे और बाद में मानद अध्यक्ष। गुस्तावे युवा वकील थे और पब्लिक वेल्फेयर सोसायटी के अध्यक्ष थे। उसके बाद से उन्होंने अपने जीवन को रेड क्रॉस कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। लुई और थिओडोर चिकित्सक थे।
अक्टूबर 1863 में कमेटी की ओर से एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में 16 राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने शिरकत की जिसमें कई उपयुक्त प्रस्तावों और सिद्धांतों को अपनाया गया। इसी सम्मेलन में कमेटी के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न का भी चयन किया गया। उस मौके पर दुनिया के सभी राष्ट्रों से ऐसे स्वैच्छिक संगठनों की स्थापना की अपील की गई जो युद्ध के समय बीमार और जख्मी लोगों की देखभाल करे। इन यूनिटों को नेशनल रेड क्रॉस सोसायटीज के नाम से जाना गया। बाकी पांच सदस्यों वाली कमेटी को शुरू में International Committee for Relief to the Wounded के नाम से जाना गया। बाद में इसका नाम इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस हो गया। गुस्तावे इसके पहले अध्यक्ष बने।
1863 के सम्मेलन के बाद अगले साल जिनीवा में इंटरनेशल डिप्लोमेटिक मीटिंग का आयोजन हुआ। मीटिंग स्विटजरलैंड की सरकार ने बुलाई थी। उस मीटिंग में जिनीवा कन्वेंशन, 1864 को तैयार किया गया। कन्वेंशन में युद्ध के मैदान में घायल और बीमार सैनिकों के साथ बेहतर व्यवहार का प्रावधान किया गया। इसी मीटिंग में चिकित्साकर्मियों और चिकित्सा उपकरणों को निष्पक्ष समझने से संबंधित प्रावधान को पारित किया गया। मीटिंग में आधिकारिक रूप से रेड क्रॉस सोसायटी के प्रतीक चिह्न को अपनाया गया। 22 अगस्त, 1864 को कन्वेंशन पर 12 राज्यों ने हस्ताक्षर किया जिसे बाद में सभी ने स्वीकार कर लिया। उस समय से रेड क्रॉस का काम शुरू हो गया। उसके बाद तीन और कन्वेंशन यानी नियम जोड़े गए। पहला नियम नौसेना के युद्ध पीड़ितों की सुरक्षा, दूसरा युद्धबंदियों की सुरक्षा और तीसरा आम नागरिकों की सुरक्षा से संबंधित था। समय-समय पर इन नियमों में बदलाव किया गया। 1949 में इन नियमों में बड़े पैमाने पर बदलाव किया गया।
वैसे तो रेड क्रॉस ने युद्ध के दौरान काफी अहम काम किए हैं लेकिन शांति के समय में भी यह मानवीय कार्यक्रमों का आयोजन करता है।
संगठन
रेड क्रॉस का मुख्य उद्देश्य लोगों की पीड़ा को कम करना है। इसके तीन मुख्य अंग हैं।
नेशनल रेड क्रॉस सोसायटीज
मुस्लिम देशों में इसको रेड क्रिसेंट और ईरान में रेड लॉयन ऐंड सन के नाम से जाना जाता है। ये सोसायटीज अपने स्वंयसेवियों की मदद से अलग-अलग देशों में राष्ट्रीय स्तर पर काम करती हैं। ये सोसायटीज स्वशासित होती हैं। इनका काम तो वैसे राष्ट्रीय स्तर पर होता है लेकिन वे अंतर्राष्ट्रीय कामों में भी हिस्सा लेती हैं। हर सोसायटी को अंतर्राष्ट्रीय कमेटी मान्यता देती है। मौजूदा समय में इन सोसायटीज की संख्या करीब 114 है। इन सोसायटीज के अधीन भी छोटी-छोटी रेड क्रॉस सोसायटीज काम करती हैं। ये सोसायटीज आपदा राहत कार्यक्रमों के अलावा लोगों को कल्याण और स्वास्थ्य संबंधित सुविधा मुहैया कराने के लिए काम करती हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद कई यूरोपीय और एशियाई सोसायटीज ने शरणार्थी सेवाओं का भी गठन किया है।
लीग ऑफ रेड क्रॉस सोसायटीज
दुनिया भर की रेड क्रॉस सोसायटीज के बीच यह संगठन समन्वय का काम करता है। इसकी स्थापना 1919 में की गई थी। अमेरिकन रेड क्रॉस के हेनरी पी. डेविसन ने इसका प्रस्ताव रखा था। लीग विभिन्न सोसायटीज के बीच संपर्क स्थापित करता है। सोसायटीज को नए कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने में मदद करता है और मौजूदा कार्यक्रमों में सुधार करने में। यह अंतर्राष्ट्रीय आपदा अभियानों में भी समन्वय करता है। इसकी एक एग्जिक्युटिव कमेटी और बोर्ड ऑफ गवर्नर होता है जिसमें हर देश की सोसायटी के प्रतिनिधि होते हैं।
इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस (आईसीआरसी)
यह स्विटजरलैंड के नागरिकों का निजी और स्वतंत्र समूह है। युद्ध या संघर्ष के दौरान जब किसी निष्पक्ष संगठन की जरूरत होती है तो यह अपनी सेवा देती है। यह जिनीवा कन्वेंशन और रेड क्रॉस सिद्धांतों के संरक्षक के तौर पर काम करती है। यह उन कानूनों को सरकारों के बीच स्वीकार्य बनाने के लिए काम करती है, कानूनों में संशोधन का सुझाव देती है, अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून तैयार करने के लिए काम करती है और नई रेड क्रॉस सोसायटीज को मान्यता देती है। यह अपने स्विस प्रतिनिधियों को युद्ध बंदी शिविरों में भेजती है। इसकी निगरानी में युद्धबंदियों को उसके मूल देशों को सौंपा जाता है। आईसीआरसी में एक असेंबली काउंसिल और एक डायरेक्टोरेट होता है।
इंटरनेशनल रेड क्रॉस कॉन्फ्रेंस
1867 में पहली बार इसकी मीटिंग हुई थी। यह रेड क्रॉस का कानून बनाने वाला सर्वोच्च अंग है। नेशनल रेड क्रॉस सोसायटियों, लीग ऑफ रेड क्रॉस सोसायटीज और इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस के प्रतिनिधि इसके सदस्य के तौर पर शामिल होते हैं। इसके सदस्य में उन देशों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाता है जिन्होंने जिनीवा कन्वेंशंस पर हस्ताक्षर किया है। हर चार से छह साल पर इसकी मीटिंग होती है। इसमें रेड क्रॉस की गतिविधियों और कन्वेंशन के अमल करने पर गौर किया जाता है। अगर कन्वेंशन में किसी तरह के संशोधन का सुझाव दिया जाता है तो मीटिंग में उस पर भी गौर किया जाता है।
सिर्फ रेड क्रॉस ही नहीं एकमात्र प्रतीक चिह्न
1877 में रूस के साथ उस्मानी सल्तनत (ऑटोमन अंपायर) का रूस के साथ युद्ध हुआ। इससे पहले रेड क्रॉस सोसायटी का एकमात्र चिह्न सफेद बैकग्राउंड के ऊपर रेड क्रॉस होता था। उस्मानी सल्तनत का मानना था कि रेड क्रॉस ईसाई धर्म का प्रतीक है, इसलिए उन्होंने अपने लिए क्रिसेंट (चांद) को चुना। रूस ने उसको मान्यता दे दी थी। 1929 में जिनीवा कन्वेंशन में उसे भी शामिल कर लिया गया। चांद को इस्लाम का प्रतीक माना जाता है। मौजूदा समय में 30 से ज्यादा इस्लामी राष्ट्र रेड क्रिसेंट का इस्तेमाल करते हैं। इजरायल की प्राथमिक उपचार सोसायटी मैगन डेविड ऐडम ने सफेद बैकग्राउंड में डेविड के रेड स्टार को प्रतीक चिह्न के तौर पर मान्यता देने की मांग की थी। इस प्रतीक चिह्न को तो मंजूरी नहीं मिली लेकिन 2005 में जिनीवा कन्वेंशंस में उसे रेड क्रिस्टल की मंजूरी दी गई। चौथा प्रतीक चिह्न लाल शेर और सूर्य का निशान है। यह ईरान का प्रतीक है।
रेड क्रॉस को मिले सबसे ज्यादा नोबेल पीस प्राइज
आईसीआरसी को तीन बार 1917, 1944 और 1963 में नोबेल पीस प्राइज मिल चुका है।
रेड क्रॉस में काम करना हो सकता है खतरनाक
अंतर्राष्ट्रीय कानून के मुताबिक तो मानवीय राहत के लिए काम करने वाले किसी भी कार्यकर्ता को जानबूझकर निशाना बनाना गैर कानूनी है। लेकिन इसके बावजूद भी रेड क्रॉस के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जाता रहा है। 1996 में नकाबपोश लोगों ने चेचन हॉस्पिटल परिसर में सोए रेड क्रॉस के कार्यकर्ताओं को गोली मार दी थी। इसी तरह का हमला 1990 और 2000 की शुरुआत में बुरुंडी, सोमालिया, कॉन्गो और बोस्निया में किया गया था। हाल की बात करें तो सीरिया के गृह युद्ध में 20 से ज्यादा रेड क्रॉस कार्यकर्ता को जान गंवानी पड़ी।
-एजेंसियां

50% LikesVS
50% Dislikes

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *