किन्नरों ने फिर किया काशी में अपने पूर्वजों का पिंडदान

वाराणसी। हिंदू धर्म में जन्म लेने के बाद भी दाह संस्कार करने की अनुमति भले किन्नरों को नहीं है, लेकिन दो साल पहले आज ही के दिन सैकड़ों किन्नरों ने मिलकर काशी में गंगा घाट पर अपने पूर्वजों का पिंडदान किया था। एक बार फिर मंगलवार को काशी में किन्नरों ने पुरानी परंपरा को चुनौती देते हुए अपने पूर्वजों का पिंडदान किया।
बता दें कि इतिहास में पहली बार महाभारत काल के शिखंडी द्वारा पिंडदान किए जाने के करीब 300 साल के बाद किन्नरों ने अपने पूर्वजों का पिंडदान कर के एक नई परंपरा की शुरुआत की थी। इसी कड़ी में मंगलवार को किन्नरों ने काशी के पिशाचमोचन स्थित कुंड पर किन्नर अखाड़ा की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के नेतृत्व में पिंडदान किया। अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके मोक्ष की प्राप्ति के लिए सारे किन्नरों ने पूरे विधि-विधान के साथ तर्पण किया और साथ ही साथ अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
पिंडदान का हिंदू धर्म में महत्व
हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार, अश्विन माह के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तक अपने पितरों के श्राद्ध की परंपरा है। ये श्राद्ध या महालया पक्ष के नाम से भी जाना जाता है| हिंदू धर्म और वैदिक मान्यताओं में पितृ योनि की स्वीकृति और आस्था के कारण श्राद्ध का प्रचलन है। पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का एक सहज और सरल मार्ग है।
फल्गु तट पर है पिंडदान का विशेष महत्व
ऐसे तो देश के कई स्थानों में पिंडदान किया जाता है, मगर बिहार के फल्गु तट पर बसे गया में पिंडदान का बहुत महत्व है। कहा जाता है कि भगवान राम और सीताजी ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था। इस पर्व में अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व उनकी आत्मा को शांति देने के लिए श्राद्ध किया जाता है और उनसे जीवन में खुशहाली के लिए आशीर्वाद की कामना की जाती है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार जिस तिथि में माता-पिता, दादा-दादी आदि परिजनों का निधन होता है, इन 16 दिनों में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करना उत्तम रहता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उसी तिथि में जब उनके पुत्र या पौत्र श्राद्ध करते हैं तो पितृ लोक में भ्रमण करने से मुक्ति मिलकर पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
पितृ पक्ष में तर्पण और श्राद्ध सामान्यत: दोपहर 12 बजे के लगभग करना ठीक माना जाता है। इसे किसी सरोवर, नदी या फिर अपने घर पर भी किया जा सकता है। पितृपक्ष में पिंडदान अवश्य करना चाहिए ताकि देवों और पितरों का आशीर्वाद मिल सके।
-एजेंसियां

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