खण्‍ड-खण्‍ड पाखण्‍ड

पाखण्ड किसी व्यक्ति की ऐसी चारित्रिक विशेषता है जो अपने पास अच्छे गुण, नैतिकता एवं सिद्धान्तों के होने का दिखावा तो करता है किन्तु वो उसके पास होती नहीं है।
अब यदि बात करें किसी समूह के पाखण्‍ड की तो उसके लिए राजनीति से अच्‍छा और बड़ा कोई उदाहरण नहीं हो सकता। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि राजनीति का पर्यायवाची शब्‍द है पाखण्‍ड। पाखण्‍ड के बिना राजनीति करना संभव ही नहीं है। बदलते वक्‍त ने राजनीति में पाखण्‍ड के मिश्रण का अनुपात भले ही बढ़ा दिया हो परंतु बिना पाखण्‍ड के राजनीति कभी अस्‍तित्‍व में रही नहीं।
आज 6 दिसंबर है। अयोध्‍या में खड़ी बाबरी मस्‍जिद को ढहाए जाने का दिन। 25 साल बीत गए जब कारसेवकों ने बाबर नामक आक्रांता की उस निशानी को जमींदोज कर दिया था।
बाबरी मस्‍जिद के ढांचे को गिराने का श्रेय तब चाहे किसी ने लिया हो और चाहे आज कोई उसके पीछे छिपे छद्म उद्देश्‍य का ढिंढोरा पीटता रहे, किंतु कड़वा सच यह है कि 06 दिसंबर सन् 1992 के दिन बहुत से तत्‍वों और अनेक राजनीतिक दलों का पाखण्‍ड भी उस ढांचे के साथ खण्‍ड-खण्‍ड हुआ था।
उस पाखण्‍ड के खण्‍ड-खण्‍ड होने का ही नतीजा है कि आज तक मर्यादा पुरुषोत्‍तम भगवान श्रीराम एक तंबू में विराजमान हैं और बाबर जैसे आक्रांता की निशानी ढहाए जाने पर विलाप करने वालों के लिए तुष्‍टीकरण की राजनीति गले की फांस बन चुकी है। अब वह न उसे निगल पा रहे हैं और न उगल पा रहे हैं।
फिर चाहे वह चाहे लालकृष्‍ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्‍गज नेता हों अथवा समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा से संरक्षक बना दिए गए मुलायम सिंह ही क्‍यों न हों।
रहा सवाल कांग्रेस का तो उसके अंतर्द्वंद को भी तकरीबन उतना ही समय बीत गया जितना बाबरी मस्‍जिद को ढहाए हुए बीता है।
कहते हैं कि जो लोग इतिहास से सबक नहीं सीखते, इतिहास उन्‍हें सब सिखाने के लिए खुद को दोहराता है।
स्‍वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी का वह अंतर्द्वद्व ही था कि उन्‍होंने अयोध्‍या में शिला पूजन कराने की अनुमति तो दी परंतु उसका श्रेय लेने से बचते रहे।
आज राहुल गांधी उसी अंतर्द्वंद्व के शिकार हैं। उन्‍हें समझ नहीं आ रहा कि तुष्‍टीकरण की राजनीति को तिलांजलि दें या फिर उस पाखण्‍ड का वो सिरा पकड़े रहें जिसे अपनी सुविधा के अनुसार दिशा दी जा सके।
राहुल गांधी का अंतर्द्वंद्व अपनी जगह है लेकिन समस्‍या यह है कि राहुल गांधी ही नहीं, समूची कांग्रेस भी अंतर्द्वंद्व की शिकार है। कांग्रेस और कांग्रेसियों को प्रथम तो यही समझ में नहीं आ रहा कि नेहरू-गांधी परिवार कांग्रेस है या कांग्रेस कोई राजनीतिक पार्टी है।
जब मणिशंकर अय्यर जैसा कोई कांग्रेसी, नेहरू-गांधी परिवार यानि सोनिया तथा राहुल को ही कांग्रेस समझने लगता है तो वह उसकी तुलना मुगलों से कर बैठता है, और कोई शहजाद पूनावाला जब उसे राजनीतिक दल समझने की भूल करता है तो राहुल गांधी के कथित इलेक्‍शन और असल में सलेक्‍शन पर सवाल उठा देता है।
इसी प्रकार जब कोई कांग्रेसी अंतर्द्वंद्व के चलते राहुल गांधी का नाम सोमनाथ मंदिर के उस रजिस्‍टर में लिख देता है जिसमें गैर हिंदुओं का नाम दर्ज किया जाता है तो समूची कांग्रेस राहुल को जनेऊधारी हिंदू साबित करने पर आमादा हो जाती है किंतु फिर कोई कपिल सिब्‍बल जैसा कांग्रेसी सुप्रीम कोर्ट में कहता है कि राम जन्‍मभूमि मामले की सुनवाई इसलिए 2019 के लोकसभा चुनाव संपन्‍न होने तक स्‍थगित कर दी जाए क्‍योंकि भाजपा उसका राजनीतिक फायदा उठा लेगी।
राम मंदिर के मुद्दे का भाजपा ने अब तक कितना फायदा उठाया है तथा कितना और उठा सकती है, इस गुणा-भाग के पचड़े में पड़े बिना यह दावा किया जा सकता है कि कांग्रेस को कपिल सिब्‍बल ने अपनी दलीलों से कहीं का नहीं छोड़ा।
कपिल सिब्‍बल ने एक झटके में राहुल गांधी के विशेष परिस्‍थितियोंवश कुर्ते के ऊपर पहने गए जनेऊ को तो उतार ही फेंका, साथ ही यह भी साबित कर दिया कि सफल वकील होना बुद्धिमत्ता का पैमाना नहीं होता और बुद्धिमान से बुद्धिमान नेता की भी मति तब मारी जाती है जब वह पेशे एवं चाटुकारिता के बीच अंतर कर पाने की योग्‍यता खो चुका हो।
कपिल सिब्‍बल ने तो अपने नेता राहुल गांधी की मंदिर-मंदिर पगयात्रा व माथे पर ”स्‍टीकर” की तरह चस्‍पा कर लिए गए चंदन-छापे की भी लाज नहीं रखी, और उनकी शिवभक्‍ति को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया।
देखा जाए तो इसमें दोष कपिल सिब्‍बल या मणिशंकर अय्यर जैसे नेताओं का नहीं है, और न खुद राहुल गांधी का है। दोष उसी अंतर्द्वंद का है जिसने समूची कांग्रेस और कांग्रेसियों के सोचने-समझने की शक्‍ति पर ग्रहण लगा दिया है। अंतर्द्वंद के चलते कभी राहुल गांधी स्‍वयं अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार बैठते हैं तो कभी कोई अय्यर या सिब्‍बल उनके पैरों पर कुल्‍हाड़ी चला देता है।
कुल्‍हाड़ी मारने की राजनीति किस जगह आकर ठहरेगी, इसका ज्ञान तो समय के साथ होगा परंतु यह ज्ञान होने लगा है कि वोट की खातिर तुष्‍टीकरण की राजनीति का दौर खत्‍म होने के कगार पर है।
खण्‍ड-खण्‍ड होते पाखण्‍ड का सिलसिला गुजरात चुनावों के बाद जाकर कहीं रुकेगा या 2019 तक चलेगा, इतना बता पाना तो फिलहाल मुश्‍किल है लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि पाखण्‍ड की राजनीति अब अंतिम सांसें गिन रही है।
अब न तो किसी के अंतिम संस्‍कार में कपड़ों के ऊपर धारण किए गए जनेऊ के फोटो दिखाकर राहुल गांधी और कांग्रेस को हिंदुओं का हितैषी साबित किया जा सकता है और न सिर्फ ”राम लला हम आएंगे, मंदिर यहीं बनाएंगे” के नारे से काम चलाया जा सकता है।
”राम-कृष्‍ण-विश्‍वनाथ, तीनों लेंगे एकसाथ” का नारा तो इन 25 सालों में तिरोहित हो चुका है किंतु राम मंदिर के निर्माण की उम्‍मीद बंधी है।
2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को मिला भारी बहुमत और उसके बाद 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता पर गोरखनाथ मंदिर के महंत का काबिज होना राम भक्‍तों के लिए आशा की किरण बना है।
अधिकांश राम भक्‍त मानते हैं कि मोदी और योगी का योग राम मंदिर के निर्माण का रास्‍ता प्रशस्‍त करेगा। यह रास्‍ता वाया सुप्रीम कोर्ट बने या वाया संसद, लेकिन बनाना होगा क्‍योंकि बचाव का कोई रास्‍ता बचता नहीं है।
भाजपा को अब रामचरित मानस की उस चौपाई का स्‍मरण करना ही होगा जिसके अनुसार:
”विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होए न प्रीत”।।
मर्यादा पुरुषोत्‍तम कहलाने वाले भगवान श्रीराम का समुद्र की जड़ता पर क्रोधित होना यह बताता है कि सहनशक्‍ति की भी सीमा होती है और जड़ता को तोड़ने के लिए कई बार उस सीमा के बाहर जाना पड़ता है।
25 सालों के अंतराल ने जनता को सत्ताधीशों की जड़ता का भलीभांति अहसास करा दिया है। भाजपा को मिला पूर्ण बहुमत उसी अहसास का नतीजा था और कांग्रेस के युवराज का ब्राह्मणत्‍व भी उसी अहसास का परिणाम है।
राजनीति और राजनेताओं को इस सत्‍य का साक्षात्‍कार करना होगा और समझना होगा कि समय तेजी से करवट ले रहा है। 25 साल की जड़ता समाप्‍त होने लगी है। पाखण्‍ड, खण्‍ड-खण्‍ड हो चुका है। ये दौर दलों की नहीं, दिलों की राजनीति का है। अब तोड़ने की नहीं, जोड़ने की राजनीति कारगर होगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वदी