इस मौसम में रखें खयाल, Tetanus का जोखिम ज्‍यादा

Tetanus कारण, लक्षण व उपचार क्या हैं

टिटनेस होने पर शारीरिक मांसपेशियों में रुक-रुक कर ऐंठन की समस्या होती है। यह अवस्था किसी गहरी चोट के संक्रमण के बाद शुरू हो सकती है और घाव के साथ सारे शरीर में फैल जाती है। इसके गंभीर परिणाम स्वरूप मृत्यु भी हो सकती है। जानें टिटनेस क्या है, कैसे होता है, इसके लक्षण और उपचार आदि क्या हैं।

क्या है टिटनेस
टिटेनस शारीरिक पेशियों में रुक-रुक कर ऐंठन होने की एक अवस्था को कहा जाता है। टिटनेस किसी चोट या घाव में संक्रमण होने पर हो सकता है। टिटनेस होने पर व उपचारित न होने पर इसका संक्रमण सारे शरीर में फैल सकता है। टिटनेस के कई गंभीर परिणाम हो सकते हैं, हालांकि इस रोग के साथ अच्छी बात यह है कि यदि चोट लगने के बाद टीकाकरण हो जाए तो यह ठीक हो जाता है।

टिटनेस के कारण

टिटनेस के कई कारण और प्रकार होते हैं। जैसे-

स्थानीय टिटेनस
यह टिटेनस का इतना साधारण प्रकार नहीं है। इसमें रोगी को चोट (घाव) की जगह पर लगातार ऐंठन होती है। यह ऐंठन बंद होने में हफ्तों का समय ले लेती है। हालांकि टिटनेस का यह प्रकार मात्र 1 प्रतिशत रोगियों में ही घातक होता है।

कैफेलिक टिटेनस
कैफेलिक टिटेनस प्रायः ओटाइटिस मिडिया (कान के इन्फेक्शन का एक प्रकार) के साथ होता है। यह सिर पर लगने वाली किसी चोट के बाद होता है। इसमें खसतौर पर मुंह के भाग में मौजूद क्रेनियल नर्व प्रभावित होती है ।

सार्वदैहिक टिटेनस
सार्वदैहिक टिटेनस सबसे ज्यादा होने वाला टिटनेस है। टिटेनस के कुल मामलों में से 80 प्रतिशत रोगियों को सार्वदैहिक टिटेनस ही होता है। इसका असर सिर से शुरू होकर निचले शरीर में आ जाता है। इसका पहला लक्षण ट्रिसमस या जबड़े बन्द हो जाना (लॉक जॉ) होता है। अन्य लक्षणों के तौर पर मुंह की पेशियों में जकड़न होती है, जिसे रिसस सोर्डोनिकस कहते हैं। इसके बाद गर्दन में ऐंठन, निगलने में तकलीफ, छाती और पिंडलीयों की पेशियों में जकड़न होती है। इसके कुछ अन्य लक्षण में बुखार, पसीना, ब्लडप्रेशर बढ़ना और ऐंठन आने पर हृदय गति बढ़ना आदि शामिल हैं।

शिशुओं में टिटेनस
यह टिटेनस उन नवजातों में होता है जिन्हें गर्भ में रहते समय मां से पैसिव इम्युनिटी नहीं मिलती। या जब गर्भवती का टीकाकरण ठीक से नहीं होता। आमतौर पर यह नाभि का घाव ठीक से न सूखने के कारण होता है। नाभि काटने में स्टेराइल उपकरणों का उपयोग न करने के कारण नवजात शिशु में यह संक्रमण हो सकता है। यही कारण है कि लगभग 14 प्रतिशत नवजातों की मृत्यु टिटेनस हो जाती है। हालांकि विकसित देशों में यह आंकड़ा काफी कम है।

कैसे होता है टिटनेस
यह संक्रमण ‘टिटेनोस्पासमिन’ से होता है। टिटेनोस्पासमिन एक जानलेवा न्यरोटॉक्सिन होता है, जो कि क्लोस्ट्रिडियम टेटेनाई नामक बैक्टिरिया से निकलता है। ये बैक्टिरिया धूल, मिट्टी, लौह चूर्ण कीचड़ आदि में पाये जाते हैं। जब शरीर का घाव किसी कारण से इस बैक्टिरिया के संपर्क में आता है तो यह संक्रमण होता है। संक्रमण के बढ़ने पर, पहले जबड़े की पेशियों में ऐंठन आती है (इसे लॉक जॉ भी कहते हैं), इसके बाद निगलने में कठिनाई होने लगती है और फिर यह संक्रमण पूरे शरीर की पेशियों में जकड़न और ऐंठन पैदा कर देता है।

जिन लोगों को बचपन में टिटनेस का टीका नहीं लगाया जाता, उन्‍हें संक्रमण होने का खतरा काफी अधिक होता है। टिटेनस भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व भर में होने वाली समस्या है। लेकिन नमी के वातावरण वली जगहों, जहां मिट्टी में खाद अधिक हो उनमें टिटनेस का जोखिम अधिक होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जिस मिट्टी में खाद डाली जाती है उसमें घोडे, भेड़, बकरी, कुत्ते, चूहे, सूअर आदि पशुओं के स्टूल उपयोग होता है। और इन पशुओं के आंतों में इस बैक्‍टीरिया बहुतायत में होते हैं। खेतों में काम करने वाले लोगों में भी ये बैक्टीरिया देखे गए हैं।

Tetanus का उपचार
टिटनेस के उपचार के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया की जाती है।

  1.  10 दिन मेट्रोनिडॉजोल का उपयोग किया जाता है।
  2. 2.   डायजेपाम।
  3. टिटेनस का टीकाकरण।
    4. गंभीर रोग होने पर सघन चिकित्सा के लिए अस्ताल में भरती करवाया जाता है।
    5. ह्यूमन टिटनेस इम्यूनोग्लाबलिन, इन्ट्रीथिकल दिये जाते हैं।
    6. मैकेनिकल वायु संचार के लिए ट्रैकियोस्टोमी 3 से 4 हफ्तों के लिए दी जाती है।
    7. टिटेनस के कारण पेशीय ऐंठन को रोकने के लिए अन्तःशिरा द्वारा मैग्नीशियम दिया जाता है।
    8. डायेजापाम (जो वैलियम नाम से मिलता है) लगातार अन्तःशिरा द्वारा दिया जाता है।
    -एजेंसी

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