कविता: बस हम दोनों, गर प्यारी हैं खुशियाँ अपनी

- कीर्ति सिंह
कीर्ति सिंह

ना मुझको तू सुन ना मुझको सुना
तू कहता जा, बस तू करता जा
गर प्यारी हैं खुशियाँ अपनी
दुनिया जो कहे, मत सुनता जा

औकात मेरी तेरे आगे
सागर में महज़ एक बूँद की है
छोटा ही सही तूफान हूँ मैं
कीमत तो समझ अहसास तू कर

 

जज़्बात मेरे तू रौंध सही
दुख दिल में मगर, मत भरता जा
अंदाज़ में अपने चल तू मगर,
मुझको भी साथ में लेता जा

हस्ती को मिटाता जा तू मेरी
बस दिल में छुपा के रखले ज़रा,
आगे ना चलूं पीछे ही सही
बस हाथ पकड़ के चलता जा

दुनिया की रिवाज़ें देख मगर
ना खुशियाँ गँवा बातों में ना आ,
तू माँग तो सही, ये जान है तेरी
कीमत अगर तू समझे ज़रा

तू कह तो सही मैं सुनती हूँ
तू कह तो सही मैं चलती हूँ
डर मत रुक मत मैं साथ तेरे
क्या ख़ौफ़ तुझे चल चलता जा

तू कहे तो धूल मैं बन जाऊं
माथा जो तेरा, हो नसीब मुझे
कहने को बहुत कुछ कहते हैं
ना दूसरों की बस सुनता जा

हूँ पास तेरे कीमत तू समझ
कई लोग तरसते हैं सुख को
जो बात ग़लत है जानेमन
नज़र अंदाज़ उसे तू करता जा

इस दुनिया की रीत रिवाज़ों में
बहुतों का जीवन उलझा है
जीना है अगर तो याद रख
सपनों का घरोंदा बुनता जा

तू छोड़ मुझे मैं छोड़ूँ तुझे
ये सब बचकानी बातें हैं
अपना तू बना और देख ज़रा
बस प्यार को रख और जीता जा

ना मुझको तू सुन, ना मुझको समझ
तू कहता जाख्, तू करता जा
जो खुशी है प्यारी अपनी तुझे
दुनिया जो कहे मत सुनता जा ….

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