कर्नाटक चुनाव: आख़िर एक टीवी चैनल कितने Exit poll दिखाएगा?

कर्नाटक चुनाव के परिणाम को लेकर उतनी गहमागहमी कभी नहीं देखने को मिली, जितनी इस बार देखने को मिल रही है. इस चुनाव को लेकर Exit poll पर सबकी नज़रें टिकी हुई थीं,
लेकिन मोटे तौर पर ये माना जाता है कि Exit poll से रुझान का पता तो चलता है, लेकिन कर्नाटक के एग्ज़िट पोल्स से चुनाव के नतीजों के रुझान का पता तो नहीं ही चल रहा है उल्टे वे लोगों को उलझाने वाले साबित हो रहे हैं.
अलग अलग पांच Exit poll करने वाली एजेंसियों में से तीन ने बीजेपी के आगे रहने की संभावना जताई है, तो दो ने कांग्रेस के आगे रहने का दावा किया है.
चुनावी सर्वे करने वाले और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज के निदेशक संजय कुमार कहते हैं, “Exit poll जब होते हैं, उसके एक दो दिन बाद तो नतीजे आने ही होते हैं, ऐसे में नतीजों को लेकर जो उत्सुकता है, उसको स्पष्टता देने के लिए इसे कराए जाते हैं. रुझान जैसा संकेत तो मिलता है. लेकिन कर्नाटक में ऐसा नहीं दिखा है. संदेह के बादल छंटे नहीं हैं, वरन काले बादल छा गए हैं.”
एक चैनल पर दो-दो सर्वे
वैसे इस बार के Exit poll को लेकर एक दिलचस्प चर्चा देखने को मिल रही है. टाइम्स नाउ ने अपने चैनल पर दो एजेंसियों के सर्वे दिखाए हैं, एक सर्वे में कांग्रेस को बढ़त दिखाई गई है, जबकि दूसरे सर्वे में बीजेपी को बढ़त मिली हुई है.
कई लोग ये कह रहे हैं कि ऐसा पहली बार हुआ है, लेकिन टाइम्स नाउ चैनल के एडिटर इन चीफ़ राहुल शिवशंकर कहते हैं कि ये पहली बार नहीं हुआ है. वे कहते हैं, “2014 के आम चुनाव के वक्त भी मैं न्यूज़ एक्स टीवी चैनल का एडिटर था, हमने वहां भी ये प्रयोग किया था. ये कोई पहली बार नहीं हुआ है.”
हालांकि इस चलन पर सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार कहते हैं, “एक चैनल के पास पूरा अधिकार है कि वो चाहे तो पांच एजेंसियों के सर्वे दिखा सकते हैं, छह एजेंसियों का दिखा सकते हैं. दिक्कत तब है जब एक ही चैनल अलग अलग एजेंसियों से सर्वे कमीशन कराते हैं, तो ये सवाल तो उठता है कि इसकी ज़रूरत क्या पड़ी है.”
हालांकि टाइम्स नाउ के राहुल शिवशंकर कहते हैं, “सवाल उठाने वाले लोग कौन हैं, वही हैं जो दूसरे चैनलों पर पोल्स कर रहे हैं. हमारे दर्शकों ने तो स्वागत किया है, भारत जैसे देश में जिस तरह का विविधता भरा समाज है, उसमें Exit poll करने में थोड़ा सा बारीक अंतर भी नतीजों पर असर डाल सकता है. ऐसे में दो एजेंसियों से सर्वे कराने में कोई मुश्किल तो नहीं है, दूसरे समाचार चैनल्स भी तो पोल्स ऑफ़ पोल्स के नाम पर सभी सर्वे दिखाते हैं.”
विश्वसनीयता का सवाल
वहीं इस मामले में ब्राडकास्टर एडिटर्स एसोसिएशन के एक्जीक्यूटिव कमेटी के सदस्य एनके सिंह कहते हैं, “करने को तो कोई चैनल छह एजेंसियों को कमीशन कर सकती है, अभी एक चैनल ने दो एजेंसी को हायर किया है, कल को तीन भी हायर कर सकते हैं. लेकिन जब इन दोनों-तीनों सर्वे के साथ एक ही चैनल का नाम आता है तो फिर उस चैनल को देखने वालों में विश्वसनीयता का संकट तो उत्पन्न हो सकता है.”
हालांकि राहुल शिवशंकर इस राय से इत्तेफाक़ नहीं रखते. वे कहते हैं, “Exit poll करने के लिए हर तरह के वेरिएबल को तौलना संभव नहीं होता है. इसके अलावा ग्राउंड पर भी ऐसी स्थिति है, नाइज़ी डिमोक्रेसी है, चुनाव में कई तरह की चीज़ें काम करती हैं, ज़मीन पर भी विरोधाभासी स्थिति देखने को मिल रही है, ऐसे में अलग अलग एजेंसियों के परिणाम अलग अलग तो हो ही सकते हैं. हमारे दोनों सर्वे में यही तस्वीर उभरी है.”
संजय कुमार कहते हैं, “शायद चैनल की कोशिश यही है कि वो क्रेडिट लेना चाहता है कि जो भी फैसला आए, हमारा सर्वे तो सही साबित हुआ है. इसके लिए ही ऐसी कोशिश हो सकती है.”
दरअसल, भारत में चुनाव सर्वेक्षण और Exit poll अभी भी प्रयोगों के दौर से गुजर रहा है, यही वजह है कि इसको लेकर जितने तरह के प्रयोग हो रहे हैं उतने ही तरह के सवाल उठ रहे हैं. कर्नाटक के मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने तो इसे दो दिनों तक चलने वाला मनोरंजन बता दिया.
एनके सिंह कहते हैं, “भारत का समाज जाति, उपजाति, धर्म, सांप्रदाय तक, क्षेत्रीय भूभागों में बंटा है, यही वजह है कि भारत में ऐसे पोल्स सही साबित नहीं हो पाते हैं. बहुत हद तक साइंटिफिक नहीं माना जा सकता है, लेकिन कोई भी साइंस प्रयोग के दौर से गुजरता है, एक फ़ीसदी वोट का अंतर सीटों में काफ़ी अंतर ला सकता है.”
-प्रदीप कुमार

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