श्रद्धालुओं के लिए खुले यमुनोत्री और गंगोत्री मंदिरों के कपाट

चारधामों में शामिल यमुनोत्री मंदिर के कपाट अक्षय तृतीया के पर्व पर आज आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं यमुनोत्री धाम के कपाट अक्षय तृतीया को ही क्यों खुलते हैं।
अक्षय यानी जो कभी क्षय (समाप्त) न हो। साल में एक दिन ऐसा होता है जिस दिन अगर कुछ भी काम किया जाए तो वह अशुभ नहीं होता है। वह है बैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि। इस दिन सारे काम सिद्घ होते हैं।
मान्यताओं के अनुसार यमुनोत्री धाम का सीधा संबंध यमुना से है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यमुना सूर्य की पुत्री है। शनि और यम भी सूर्य के पुत्र हैं।
किंदवंतियों के अनुसार हनुमान भी यमुना को अपनी बहन मानते थे। सदियों पहले यमुना जी ने तीनों भाइयों से एक साथ मिलने की इच्छा जताई। इस पर विचार कर तीनों भाई अक्षय तृतीय के दिन अपनी बहन यमुना से मिलने आए। वहीं वे गंगा से भी मिले।
इस पर तीनों प्रतापी भाइयों ने घर लौटते वक्त अपनी बहन को वरदान दिया कि तीर्थों में सबसे पहले यमुना की पूजा होगी। इस दिन जो भी यमुनोत्री धाम आकर दर्शन करेगा उसके सभी पाप नष्ट होंगे।
इसके बाद यम, शनि और हनुमान वापस चले गए और भाई दूज के दिन वापस आए। बहन से भेंट कर यमुना के भेंट स्वरूप कुछ मांगने पर तीनों भाइयों ने कहा कि अक्षय तृतीय के दिन से भाई दूज तक जो भी यमुनोत्री धाम से इलाहबाद तक किसी भी तट पर यमुना में स्नान करेगा, यम उसकी मृत्यु को टाल देगा। वहीं शनि भी उस व्यक्ति को साढ़े सती के प्रकोप से दूर रखेगा। हनुमान जी ने कहा कि यमुना के धाम आने पर उस व्यक्ति के मैं सारे कष्ट हर लूंगा।
बता दें कि हर साल अक्षय तृतीया के मौके पर गंगोत्री धाम के कपाट भी विधिविधान के साथ आम लोगों के दर्शनार्थ खोले जाते हैं।
कहा जाता है कि गंगोत्री में एक शिला पर बैठकर राजा भगीरथ ने साढ़े पांच हजार साल तक तपस्या की थी। राजा भगीरथ ने जिस शिला पर बैठकर तपस्या की थी, उसे भगीरथ शिला कहते हैं। ये शिला आज भी यहां मौजूद है।
मान्यता है कि जब गंगा स्वर्ग से धरती पर उतरी तब गंगोत्री मंदिर से कुछ दूरी पर ही राजा भगीरथ ने सूर्यदेव को जल चढ़ाया था। यहां गंगा (भागीरथी) एक धारा के रूप में पूरब दिशा की ओर कुंड में गिरती है।
-एजेंसियां

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