…ज‍िन्हें नाम‍ित होने के बाद नहीं द‍िया गया नेली सॉक्स अवार्ड

जर्मनी की एक संस्था द्वारा विख्यात यहूदी लेखिका नोबेल विजेता Nelly Sachs की याद में दिया जाने वाला नेली सॉक्स अवार्ड के ल‍िए नाम‍ित क‍िए जाने के बाद पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश लेखिका Kamila Shamsie को द‍िये जाने से मना कर द‍िया गया। ये मामला 6 स‍ितंबर को पाक‍िस्तानी मीड‍िया के ज़र‍िए पता चला ।

कामिला शम्सी का जन्म 13 अगस्त 1973 को हआ था, वे एक पाकिस्तानी-ब्रिटिश लेखक और उपन्यासकार हैं, जिन्हें उनके पुरस्कार विजेता उपन्यास होम फायर के लिए जाना जाता है।

बेगम जहाँआरा हबीबुल्लाह की पोती शम्सी का जन्म पत्रकार और संपादक मुनीज़ा शम्सी के यहां हुआ हैं, उन्होंने कराची ग्रामर स्कूल में पढ़ाई की। वह हैमिल्टन कॉलेज से रचनात्मक लेखन में बीए, और मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट विश्वविद्यालय में कवियों और लेखकों के लिए एमएफए कार्यक्रम से एक एमएफए, जहां वह कश्मीरी कवि आगा शाह अली से प्रभावित थी। 2007 में वह लंदन चली गईं और अब वह यूके और पाकिस्तान की दोहरी नागरिक हैं।

होम फायर को 2017 के बुकर पुरस्कार के लिए लंबे समय से सम्मानित किया गया और 2018 में फिक्शन के लिए महिला पुरस्कार जीता।

बहरहाल जर्मनी की एक संस्था ने पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश लेखिका कामिला शम्सी को पुरस्कार देने से मना कर दिया है। संस्था ने यह कदम शम्सी के फिलिस्तीन समर्थक व इजरायल विरोधी रुख के कारण उठाया है। पाकिस्तानी मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जर्मन शहर डॉर्टमंड के प्रशासन की तरफ से कामिला शम्सी को नेली सॉक्स अवार्ड से सम्मानित करने का फैसला किया गया था।

आठ सदस्यीय निर्णायक मंडल ने शम्सी को पुरस्कृत करने का आदेश वापस ले लिया है और अब साल 2019 के लिए यह अवार्ड किसी को नहीं दिया जाएगा।

बयान में कहा गया है, “तमाम शोध के बावजूद, निर्णायक मंडल के सदस्य इस बात से परिचित नहीं थे कि लेखिका 2014 से ही फिलिस्तीन पर इजरायल सरकार की नीतियों के विरोध में बहिष्कार के अभियानों में शामिल रही हैं।”

बयान में कहा गया है, “इजरायल सरकार की नीतियों के खिलाफ उसके सांस्कृतिक बहिष्कार की मुहिम बीडीएस (बॉयकॉट डिस्इनवेस्टमेंट सैंक्शन) में शम्सी की सक्रिय राजनैतिक भागीदारी नेली सॉक्स अवार्ड की मूल भावना के स्पष्ट रूप से खिलाफ है।”

शम्सी ने इस फैसले की निंदा की है। उन्होंने ट्वीट किया, “यह मेरे लिए बेहद दुखद है कि निर्णायक मंडल दबाव में आ गया और उस लेखिका को पुरस्कार नहीं देने का फैसला किया जो अपने विवेक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रही है।”

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