‘क’ से “कालिदास” और ‘र’ से “रा-फेल”

कहा जाता है कि हर “कालिदास” में “महाकवि” बनने की पर्याप्‍त क्षमता होती है, इसे यूं भी मान सकते हैं कि हर “मूर्ख” में “कालिदास” बनने की अपार संभावनाएं छिपी होती हैं, बस जरूरत होती है तो एक अदद “विद्योत्तमा” की।
बिना विद्योत्तमा के आज तक न तो कोई कालिदास, महाकवि बन सका है और न कोई मूर्ख, कुमारसंभवम् का रचयिता कालिदास बन पाया है।
हालांकि प्रत्‍येक युग में कालिदास हुए हैं और प्रत्‍येक युग में होते रहेंगे परंतु हर कालिदास की किस्‍मत में विद्योत्तमा हो, यह जरूरी नहीं।
यह मात्र किंवदंती है कि सभी कालिदासों के लिए कोई न कोई विद्योत्तमा इस धरा पर जन्‍म लेती है और उनके सात जन्‍मों का रिश्‍ता स्‍वर्ग में तय हो जाता है।
यदि इस बात में रत्तीभर दम होता तो कोई कालिदास कैसे आधी शताब्‍दी तक “उट्-उट्” पुकारता हुआ पाया जाता और किसी की उस पर नजर भी न पड़ी होती।
बेशक विद्योत्तमा को भी कालिदास के उट्-उट् चिल्‍लाने का पता तब लग पाया था जब षड्यंत्र पूर्वक उन्‍हें कालिदास के साथ विवाह बंधन में बांधा जा चुका था परंतु ‘क’ से कालिदास का कहना है कि उसका ‘विवाह’ उसके अपने ‘दल’ से हो चुका है और उसे अपने जैसे दूसरे किसी ‘उद्भट विद्वान’ को पृथ्‍वी पर लाने में कोई रुचि नहीं है। वह अपने कुल का ऐसा ‘अंतिम चिराग’ साबित होना चाहता है जिसका ‘डीएनए’ सिर्फ और सिर्फ अनुसंधान करने के काम आ सके।
फिर समस्‍या आखिर है कहां ?
समस्‍या यह है कि कालिदासीय काल के तत्‍कालीन विद्वानों को उनकी मूर्खता पर तब शत-प्रतिशत भरोसा हो गया था जब वह पेड़ की उसी डाल को काटते पाए गए जिस पर बैठे हुए थे किंतु समकालीन विद्वान यही तय नहीं कर पा रहे हैं कि उनका कालिदास किस श्रेणी का मूर्ख है। वह उसके लिए “पकड़वा विवाह” का बंदोबस्‍त भी तो तब करें जब उन्‍हें ज्ञात हो सके कि उनका कालिदास ‘मौन’ रहकर भी किसी काम आ पाएगा। किसी विद्योत्तमा को सांकेतिक उत्तर दे सकेगा या नहीं। संकेतों से जवाब देने में भी सक्षम होगा या नहीं। अब तक तो संकेतों के नाम पर वह सिर्फ “आंख मारता” अथवा “षटकोणीय” मुंह बनाता ही देखा गया है।
विद्योत्तमा को कालिदास की योग्‍यता का अंदाज उसी क्षण लग गया था जब वह ऊंटों की कतार को देखकर उट्-उट् पुकारने लगे थे परंतु विद्योत्तमा के अभाव में वर्तमान कालिदास की योग्‍यता अक्षुण्‍ण बनी हुई है।
कभी वह आलू की बोरी देखकर ‘चिप्‍स-चिप्‍स’ चिल्‍लाने लगता है और कभी एप्‍पल के मोबाइल की रिंग टोन सुनकर “मो-रि-मो-रि” जपता है।
‘र’ से राफेल और ‘अ’ से अंबानी की रट लगाए बैठे इस कालिदास को जब कोई यह समझाने की कोशिश करता है कि र से ‘रॉबर्ट’ और अ से ‘अगस्‍ता’ भी होता है तो वह रूठ कर बैठ जाता है।
कहता है केवल मेरी बनाई ओलम पढ़ो, दूसरी ओलम पढ़ोगे तो मैं मम्‍मा को बुला लाऊंगा। मेरी मम्‍मा जानती हैं कि मेरी अल्फाबेट सही है और इसीलिए उन्‍होंने पार्टी की कमान मेरी बहना को न सौंपकर मुझे सौंपी है। बहना ‘गेस्‍ट अपीरियंस’ के काम आती है।
यह भी हो सकता है कि कालिदास के कारखास ही न चाहते हों कि उसे कभी किसी विद्योत्तमा से मुखातिब कराया जाए क्‍योंकि यदि वो किसी विद्योत्तमा के संपर्क से महाकवि में कन्वर्ट हो गया तो उनकी लुटिया परमानेंट डूब जाएगी।
रहा सवाल सेल्‍फ कालिदासों का तो वो कहां जानते हैं कि जो कुछ कर रहे हैं, उसे अपने पैरों में कुल्‍हाड़ी मारना और अपनी जड़ों में मठ्ठा डालना कहते हैं।
संभवत: यही कारण है कि वह भी कालिदास का ‘ककहरा’ रटते हुए र से रा-फेल और अ से अंबानी बोले चले जा रहे हैं। र से रॉबर्ट और अ से अगस्‍ता बताने पर कहते हैं कि इस ओलम से “बोफोर्स” जैसी बू आती है इसलिए इसे हमसे दूर रखो।
राफेल की “इंमर्जेंसी” का अहसास कराओ तो कहते हैं कि वो मात्र एक इमर्जेंसी को समझते हैं जिसे 1975 में लाए थे। इसके अलावा वो किसी इमर्जेंसी को नहीं समझते। मौका मिला तो 2019 में फिर ले आएंगे।
इस बार चाय और चौकीदार जैसे शब्‍द असंसदीय घोषित किए जाएंगे और नामदार व दामदार बोलने पर जेल की हवा खानी होगी। चौकीदार बोलने के लिए चोर बोलना जरूरी होगा और चाय के साथ पकौड़ों का उल्‍लेख करना होगा।
युवराज बोला तो राष्‍ट्रद्रोही कहलाओगे और पप्‍पू कहा तो सींखचों के पीछे भेजे जाओगे। आंख मारने पर नेशनल हेरल्‍ड अवार्ड के लिए चयन का मार्ग प्रशस्‍त होगा और मुंह बिचकाने पर पप्‍पू शिरोमणि कहलाओगे।
हां…वंदे मातरम, जय हिंद, जन गण मन और जय श्रीराम का किसी भी रूप में इस्‍तेमाल करने पर भी राष्‍ट्रद्रोह का केस फेस करना होगा।
2019 में प्रवेश के साथ क से कालिदासों की एक ऐसी फौज तैयार की जाएगी जो ई से ईवीएम को भली प्रकार रट लें और तब तक उच्‍चारण करते रहें जब तक पप्‍पू ‘पास’ न हो जाए। ठीक ऐसे ही जैसे इन दिनों र से राफेल और अ से अंबानी रट लिया है। फिर चाहे उसका नतीजा रा-फेल, रॉबर्ट और अगस्‍ता ही क्‍यों न निकले क्‍योंकि क्रिश्चियन मिशेल “भारत यात्रा” पर है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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