Junior Doctors: कौन कहता है कि ये …धरती पर दूसरे भगवान हैं

हम लोग अकसर यह सुनते हुए बड़े हुए हैं कि डॉक्‍टर तो धरती पर भगवान का दूसरा रूप होते हैं, परंतु होटल में शराब पीने से रोकने पर शनिवार रात को आगरा के Junior-Doctors ने जो हंगामा मचाया उसने उन्‍हें जनसामान्‍य से मिली इस उपाधि से तिलांजलि दिलवा दी।
तमाम अविश्‍वास अर्जित करके आमजन के दिलों से तो डॉक्‍टर्स पहले ही उतर चुके हैं, अब वे किसी भी स्‍तर का अपराध करने से नहीं चूक रहे। आगरा एस. एन. मेडीकल कॉलेज के Junior-Doctors ने तो चार कदम आगे बढ़कर ये साबित भी कर दिया।

यूं तो चिकित्‍सा क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों से पेशेगत संवेदनशीलता का अभाव और अधिक से अधिक पैसा कमाने की लिप्‍सा इस कदर सिर चढ़कर बोली है कि डॉक्‍टर अब भगवान तो दूर, उल्‍टे कसाई की भूमिका में आ गये हैं। निजी क्षेत्र के डॉक्‍टर्स की बात तो जाने दीजिये, वहां तो एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक किसी मरीज की जि़ंदगी पैसों से तोली जाती है।
बाकायदा पैकेज पर चल रहे निजी क्षेत्र के अस्‍पतालों को मरीज इंसान कम, कमर्शियल सब्‍जेक्‍ट अधिक नज़र आता है। निजी क्षेत्र में लोगों की सेहत का ”व्‍यापार” चला रहे इन डॉक्‍टर्स के अधिकारों और व्‍यापारिक हितों के लिए तो पूरी की पूरी एक संस्‍था है ”इंडियन मेडीकल ऐसोसिएशन” परंतु कभी इनके कर्तव्‍यों को लेकर या मानवीय हितों के लिए इस संस्‍था ने कुछ भी किया हो, ऐसा उदाहरण मेरी तो समझ में नहीं आता।

विश्‍वास ना हो तो किसी भी प्राइवेट अस्‍पताल, नर्सिंग होम, मल्‍टीस्‍पेशिएलिटी हॉस्‍पीटल जाकर वहां कतारबद्ध बैठे मरीजों और उनके तीमारदारों से पूछ कर देख लीजिए, पूरा व्‍यापार समझ में आ जाऐगा। खालिस गिव एंड टेक पर टिका निजी चिकित्‍सा क्षेत्र का ये उसूल कि जैसा पैसा दोगे, वैसा ही इलाज़ मिलेगा। इस पर हालांकि काफी कुछ पहले भी लिखा जा चुका है परंतु फिलहाल मामला आगरा मेडीकल कॉलेज के जूनियर डॉक्‍टर्स के आततायी होने का है।

डॉक्‍टरों के आतंक की हालिया घटना के अनुसार शनिवार देर रात आगरा के अशोका होटल में एक साथी डॉक्‍टर का जन्‍मदिन मनाने गए जूनियर डॉक्‍टर्स ने पहले तो बार बंद होने पर हंगामा किया, होटल स्‍टाफ से मारपीट की और फिर सूचना पर पहुंची पुलिस के साथ भी मारपीट कर पुलिसकर्मियों की वर्दी तक फाड़ दी व उनके स्‍टार्स नोंच दिए। इसके बाद गिरफ्तार किए गए जूनियर डॉक्‍टर्स को छुड़ाने के लिए दबाव बनाने को कल यानि रविवार के दिन उनके साथी डॉक्‍टर्स ने नारेबाजी करते हुए सैकड़ों मरीजों को मेडीकल कॉलेज से बाहर निकाल दिया। मरीज फुटनाथ पर सोने को विवश रहे, वे गिड़गिड़ाते रहे। इसी बीच एक बच्‍चे ने दम तोड़ दिया किंतु डॉक्‍टर्स नहीं पसीजे।
इतने पर भी जी नहीं भरा तो हड़ताल कर दी। अभी तक 25 जूनियर डॉक्‍टर्स जेल में हैं…आगे क्‍या होगा पता नहीं, परंतु असंवेदनशील जूनियर डॉक्‍टर्स की इस हरकत ने ये तो पक्‍का कर ही दिया कि अब ये रिवाज़ हर जनसामान्‍य पर खासकर उस वर्ग पर जो सरकारी चिकित्‍सा के भरोसे है, के लिए जानलेवा हो रहा है।

इससे पहले जुलाई में मानदेय को दोगना कर 65000 करने को लेकर पूरे मध्‍यप्रदेश के जूनियर डॉक्‍टर्स हड़ताल पर गए थे, इसी तरह बीआरडी मेडीकल कॉलेज गोरखपुर के जूनियर डॉक्‍टर्स ने सजर्री के औज़ारों से ही मरीजों व उनके तीमारदारों पर जानलेवा हमला कर दिया था…ये तो अभी-अभी के उदाहरण हैं।

इन जूनियर डॉक्‍टर्स के लिए ना तो एस्‍मा (आवश्यक सेवा अनुरक्षण कानून) का कोई अर्थ रह गया है और ना ही उस शपथ (Hippocratic Oath) का जो ज़िंदगी बचाने के लिए दिलवाई जाती है।

जूनियर डॉक्‍टर्स में स्‍थापित हो चुकी स्‍वार्थी प्रवृत्‍ति अब आपराधिक रूप में हमारे सामने है, इस पराकाष्‍ठा से हमें ही जूझना होगा। इसके लिए जरूरी है कि इन छद्म अपराधियों के लिए स्‍थापित परिभाषाएं बदली जाएं।

इन भगवानों की बदरंग सूरत को उजागर करके जनकल्‍याण के लिए नासूर बने इस पेशे की स्‍याह तस्‍वीर का पूरा सच सामने आना चाहिए वरना धरती के कथित भगवान कसाईखाने की मानिंद हर रोज हमारे टैक्‍स से हमें ही जिबह करते रहेंगे और हम…मुंह टापते रह जाऐंगे?
सोचना तो होगा ही…कि आगरा हो या गोरखपुर अथवा मध्‍यप्रदेश की घटनायें अब आगे और ना होने पायें।

-सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी

 

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