23 जुलाई: विख्यात कवि “शिव कुमार बटालवी” का जन्‍मदिन आज

पंजाबी भाषा के विख्यात कवि “शिव कुमार बटालवी” अपनी उन रोमांटिक कविताओं के लिए सबसे ज्यादा याद किए जाते हैं, जिनमें भावनाओं का उभार, करुणा, जुदाई और प्रेमी के दर्द का बखूबी चित्रण है। वे 1967 में वे ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ पाने वाले सबसे कम उम्र के साहित्यकार बने।
पाठकों के लिए पेश है शिव कुमार बटालवी कीबेहद खूबसूरत नज्में, जिनका हिंदी में अनुवाद किया है- पंजाबी के प्रोफेसर और शायर तरकश प्रदीप ने-

वो भी शहर से आ रही थी

वो भी शहर से आ रही थी
मैं भी शहर से आ रहा था
ताँगा चलता जा रहा था

दूर मग़रिब की किसी टहनी पे दूर
फूल सूरज का अभी मुरझा रहा था
दरम्यां थी दूरी हम दोनों के लेकिन
उस बदन का सेक मुझ तक आ रहा था
ताँगे वाला धीमे-धीमे गा रहा था
ताँगा चलता जा रहा था

साँवली सी उस सड़क के दो किनारे
उसके होंठों की तरह लरज़ा रहे थे
बुर्जियाँ और मील के पत्त्थर तो जैसे
उस सड़क के दाँत हों, भरमा रहे थे
बज रहा था एक चिमटा सा हवा का
शीशमों के पत्ते नग़मे गा रहे थे
देखकर कर हम दोनों को वो नामुराद
गुल पहाड़ी आक के मुस्का रहे थे
सुर्ख़ उसकी आँख के डोरे थे जो कि
मेरे दिल में शाम बोए जा रहे थे
दूर इक फ़ीका सा तारा साँझ का था
जो गगन की गाल पर उभरा हुआ था
एक छोटे से गुलाबी मुखड़े पर हो
एक काला तिल, वो ऐसा दिख रहा था
दरम्याँ दोनों के जो भी फ़ासला था
और घटता और घटता जा रहा था
ताँगे वाला धीमे-धीमे गा रहा था
ताँगा चलता जा रहा था
आस्माँ के नयनों में नीला धुँआ था
आस्माँ के नयनों में नीला धुँआ था
जैसे इक नवजात कौए का रुआँ हो
मुझको बख़्शे जाता था कितना सुकूँ वो
दूर उस धुएँ के पार के जँगल के पार
इक परिंदों की उड़ी जाती थी डार
मेरे जी में आया कि उस डार को मैं
ये कहूँ ऊँची सी इक आवाज़ मार,
“ले चलो हमको भी अपने साथ यार
दूर इस दुनिया से उस परलोक पार
देना हमको उस जज़ीरे पर उतार
हम जहाँ पाएँ सुकूँ से शब गुज़ार।”
था अँधेरा जो किसी नागिन की मानिंद
ओर मेरी ही सरकता आ रहा था
जबकि मेरा हाथ उसके हाथों से अब
जाने कितनी देर से टकरा रहा था
फ़ाख्ता का जोड़ा इक दीवार पे ज्यों
चोंच में दे चोंच को शरमा रहा था
ताँगे वाला धीमे-धीमे गा रहा था
ताँगा चलता जा रहा था

लब सरीखे जो किनारे थे सड़क के
उन किनारों पर कतारें आम की थीं
और उन आमों पे जो था बूर उसने
अपनी सारी ही महक नीलाम की थी
चुन रही थीं वाँ पे तिनके कुछ बयाएँ
फ़िक्र उनको ढलती जाती शाम की थी
और मिरे हाथों में थे अब हाथ उसके
सर्द थे जो बर्फ़ से भी कुछ ज़ियादा
नर्म नाज़ुक हाथ उसके प्यारे प्यारे
प्यार कितना जा रहे थे मुझपे वारे
तब अचानक राह हमारा काटने को
काली बिल्ली जैसी काली कार आई
एक मुट्ठी फेंकी हम पे रौशनी की
और हमें उस खेल से बाहर को लाई
कार के पीछे थी चस्पा लाल बत्ती
जो चमकती दूर हमसे जा रही थी
हो सड़क के माथे की ज्यों लाल बिंदी
या मणि वो इक गले के हार की थी
और हवा के पाँव में पायल महक की
चार हाथों का मिलन पहना रहा था
यूँ लगा आषाढ़ का सूरज हथेली
पर उगा है, हाथों को पिघला रहा था
आँच बढ़ती जा रही थी
ताँगे वाला धीमे-धीमे गा रहा था
ताँगा चलता जा रहा था
आ रही थी तेज़ टापों की इक आवाज़
आ रही थी तेज़ टापों की इक आवाज़
था छनकता ताल में ताँगे का वो साज़
साज़ से आवाज़ उभरी इक अजब सी
जो कभी बचपन में भी हमने सुनी थी
बिजली के खम्बे से कानों को सटा कर
राज़ पर जिसका न खुलता था कभी भी
हम को लगता था कि भूतों की है बोली
जंगी-जहाज़ों का हो उड़ना जंग में ज्यों
दुनिया के पापों से चिढ़ कर हो गए हों
देवता दुनिया के सारे ही या नाराज़
आग के उस खेल से वो हाथ चारों
अब तलक भी तो नहीं आ पाए थे बाज़
आ रही थी तेज़ टापों की इक आवाज़
था छनकता ताल में ताँगे का वो साज़
गाँव उसका जिसमें थी ऊँची सी मस्जिद
और उस मस्जिद का जो मीनार था वो
उस अँधेरे में भी देखा जा रहा था
यानी उसके गाँव की हद आ गई थी
एक वो और एक उसका हाथ, दोनों
मेरे हाथों से निकल कर जा रहे थे
एक उसका गाँव इक मज़बूरी मेरी
दोनों मिलके मुझको खाने आ रहे थे
ताँगे वाला जाने क्यूँ गुर्रा रहा था
बेरहम जल्लाद था वो ताँगे वाला
जिसके हाथों घोड़ा पिटता जा रहा था
दूर इक पँछी कोई चिचला रहा था
सारा रस्ता उसकी चिचलाहट के सुर में
नींद में भी सुर मिलाता जा रहा था
सारा ताँगा अब किसी ताज़ा मरे इक
जानवर जैसा दिखाई दे रहा था
दूर मग़रिब की किसी टहनी को कोई
तारों का इक घुन सा खाता जा रहा था
और दियों की लौ में अपना गाँव मेरा
दूर से शमशान सा नज़र आ रहा था
दिल मेरा उड़ते फ़रारे की तरह बस
हर घड़ी माज़ी को उड़ता जा रहा था

ताँगे वाला जाने क्यूँ गुर्रा रहा था
बेरहम जल्लाद था वो ताँगे वाला
जिसके हाथों घोड़ा पिटता जा रहा था
ताँगा चलता जा रहा था

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