Jerusalem विवाद में ट्रम्प ने डाला घी, भारतीय संस्कृति के भी चिन्ह मिले

Jerusalem को लेकर विवादों का पिटारा फिर से खुल गया है। वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने यरुशलम को इजराइल की राजधानी बनाने की घोषणा कर अभी तक चले आ रहे शांति प्रयासों को तिलांजलि दे दी है।

माना जाता है कि Jerusalem में तीन संस्कृतियां, धर्म के चिन्ह हैं यहूदी, ईसाई और मुस्लिम। वैसे यहां तीन नहीं चार संस्कृति और धर्म के चिन्ह पाए जाने की बात कही जाती है। तत्कालीन प्रसिद्ध पत्रकार जमनादास अख्तर ने अपने एक लेख में इस लेख का उल्लेख है जिसमें उन्होंने वर्णन में लिखा था कि यरुशलम में केवल तीन संस्कृतिया नहीं बल्कि चार हैं। यहूदी, ईसाई, मुस्लिम के साथ हिन्दुस्तानी संस्कृति पाए जाने का भी जिक्र उन्होंने अपने उस लेख में किया था।

गत दिनों वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने यरुशलम को इजराइल की राजधानी की मान्यता देकर इस विवाद को और आग दे दी है। वैसे ही मध्य-पूर्व एशिया का बरसों से चला आ रहा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। ट्रम्प के इस निर्णय ने जाहिर कर दिया है कि अमेरिका पूरी तरह से मुस्लिम वर्ग के पीछे पड़ गया है। संयुक्त राष्ट्र ने हालांकि ट्रम्प के इस कदम से तटस्थ रहना पसंद किया है, फिर भी ये आग और भड़केगी।

यरुशलम पर विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के कारण इजराइल और फलस्तीन दोनों देश इसे अपनी राजधानी बनाना चाहते हैं। 1948 में इजराइल की आजादी के बाद 1967 में छह दिनी लड़ाई के बाद पूर्वी यरुशलम पर इजराइल ने कब्जा कर लिया। इसके बाद छिड़े विवाद ने कई बार उग्र रूप धारण किया, कई बार शांति बहाल हुई, मगर निराकरण आज तक नहीं हुआ। जबकि इसे तीनों समाजों यानी यहूदी, ईसाई और मुस्लिमों का मानकर एक वर्ग विशेष का कब्जा हटा देना चाहिए।

येरुशलम की स्थिति

यरुशलम (इब्रानी : येरुशलयिम, अरबी : अल-कुद्स) इज्रायल देश की राजधानी है, जो कुछ देशों द्वारा विवादित है। ये यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म, तीनों की पवित्र नगरी है। इतिहास गवाह है कि येरुशलम प्राचीन यहूदी राज्य का केन्द्र और राजधानी रहा है। यहीं यहूदियों का परमपवित्र सुलैमानी मन्दिर हुआ करता था, जिसे रोमनों ने नष्ट कर दिया था। ये शहर ईसा मसीह की कर्मभूमि रहा है। यहीं से हजरत मुहम्मद स्वर्ग गए थे।

Jerusalem या यरुशलम बहुत ही प्राचीन शहर है। यहां के सुलेमानी प्राचीन मंदिर के परिसर में अब मस्जिद, चर्च और यहूदियों के स्थान बन गए हैं। यह पहले सिनेगॉग था। 937 ईपू बना यह सिनेगॉग इतना विशाल था कि इसे देखने में पूरा एक दिन लगता था, लेकिन लड़ाइयों ने इसे ध्वस्त कर दिया। अब इस स्थल को पवित्र परिसर कहा जाता है। माना जाता है कि इसे राजा सुलेमान ने बनवाया था।किलेनुमा चहारदीवारी से घिरे पवित्र परिसर में यहूदी प्रार्थना के लिए इकट्ठे होते हैं। इस परिसर की दीवार बहुत ही प्राचीन और भव्य है। यह पवित्र परिसर यरुशलम की ओल्ड सिटी का हिस्सा है।

इसराइल के 4 प्रमुख क्षेत्र हैं- तेल अवीव, यरुशलम, हैफा और बीयर शेव। यरुशलम इसराइल का सबसे बड़ा शहर और राजधानी है। यरुशलम की गिनती प्राचीन नगरों में की जाती है। यरुशलम के पास से जॉर्डन सीमा प्रारंभ होती है। इसराइल के तेल अवीव की सीमा भी इससे लगी हुई है। यहां की आधिकारिक भाषा हिब्रू है, लेकिन अरबी और अंग्रेजी अब ज्यादा बोली जाती है। यरुशलम सहित इसराइल के बाशिंदे लगभग 75 प्रतिशत यहूदी, 15 प्रतिशत मुस्लिम और 10 प्रतिशत अन्य धर्म को मानते हैं। मध्यपूर्व का यह प्राचीन नगर यहूदी, ईसाई और मुसलमानों का संगम स्थल है। उक्त तीनों धर्मों के लोगों के लिए इसका महत्व है इसीलिए यहां पर सभी अपना कब्जा बनाए रखना चाहते हैं। जेहाद और क्रूसेड के दौर में सलाउद्दीन और रिचर्ड ने इस शहर पर कब्जे के लिए बहुत सारी लड़ाइयां लड़ीं। ईसाई तीर्थयात्रियों की रक्षा के लिए इसी दौरान नाइट टेम्पलर्स का गठन भी किया गया था।

इसराइल का एक हिस्सा है गाजा पट्टी और रामल्लाह, जहां फलीस्तीनी मुस्लिम लोग रहते हैं और उन्होंने इसराइल से अलग होने के लिए विद्रोह छेड़ रखा है। ये लोग यरुशलम को इसराइल के कब्जे से मुक्त कराना चाहते हैं। अंतत: इस शहर के बारे में जितना लिखा जाए, कम है। काबा, काशी, मथुरा, अयोध्या, ग्रीस, बाली, श्रीनगर, जफना, रोम, कंधहार आदि प्राचीन शहरों की तरह ही इस शहर का इतिहास भी बहुत महत्व रखता है। यह मस्जिद मक्का और मदीना के बाद तीसरी प्रमुख इबादतगाह मानी जाती है।

मुस्लिम वर्ग का पवित्र स्थान अल अक्सा मस्जिद है जिसे यहूदी और ईसाई अपना बताते हैं। जबकि इस मस्जिद को यूनेस्को भी मुस्लिम दावे पर मुहर लगा चुका है। यूनेस्को रेसुलेशन में हुई वोटिंग में मस्जिदे अल अक्सा के लिए हुई वोटिंग में 33 देशों ने भाग लिया जिसमें से 17 देशों ने भाग नहीं लिया और 6 मत विरोध में पड़े थे। निर्णयानुसार अल अक्सा मस्जिद से इजराइल का दावा यूनेस्को द्वारा खत्म कर दिया गया।

इतिहास और विवाद

हिब्रू में लिखी बाइबिल में इस शहर का नाम 700 बार आता है। यहूदी और ईसाई मानते हैं कि यही धरती का केंद्र है। राजा दाऊद और सुलेमान के बाद इस स्थान पर बेबीलोनियों तथा ईरानियों का कब्जा रहा फिर इस्लाम के उदय के बाद बहुत काल तक मुसलमानों ने यहां पर राज्य किया। इस दौरान यहूदियों को इस क्षेत्र से कई दफे खदेड़ दिया गया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इसराइल फिर से यहूदी राष्ट्र बन गया तो यरुशलम को उसकी राजधानी बनाया गया और दुनियाभर के यहूदियों को पुन: यहां बसाया गया। यहूदी दुनिया में कहीं भी हों, यरुशलम की तरफ मुंह करके ही उपासना करते हैं।

यरुशलम में लगभग 1204 सिनेगॉग, 158 गिरजें, 73 मस्जिदें, बहुत-सी प्राचीन कब्रें, 2 म्यूजियम और एक अभयारण्य हैं। इसके अलावा भी पुराने और नए शहर में देखने के लिए बहुत से दर्शनीय स्थल हैं। यरुशल में जो भी धार्मिक स्थल हैं, वे सभी एक बहुत बड़ी-सी चौकोर दीवार के आसपास और पहाड़ पर स्थित हैं। दीवार के पास तीनों ही धर्मों के स्थल हैं। यहां एक प्राचीन पर्वत है जिसका नाम जैतून है। टॉवर आॅफ डेविड : जियोन के नजदीक प्राचीन जाफा गेट पर बना हुआ है ।

यरुशलम को इजरायल की राजधानी की मान्यता देने को लेकर अमेरिका संयुक्त राष्ट्र में अलग-थलग पड़ गया है. द हिंदू के मुताबिक शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) द्वारा बुलाई गई विशेष बैठक में डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम का विश्लेषण किया गया. बैठक में पांच यूरोपीय देशों ने कहा कि यरुशलम को लेकर इजरायल और फलिस्तीन के बीच बातचीत के जरिए ही कोई अंतिम फैसला किया जाना चाहिए. परिषद में यूरोपियन संघ (ईयू) ने साफ किया कि उसके मुताबिक इजरायल और फलिस्तीन के बीच विवाद का कोई वास्तविक हल होना चाहिए. ईयू ने कहा कि यरुशलम को इजरायल और फिलिस्तीन दोनों की राजधानी होना चाहिए और वह इस शहर पर किसी एक देश के अधिकार को मान्यता नहीं देगा।

यूएनएससी की बैठक में ट्रंप के फैसले को लेकर सिर्फ ईयू की तरफ से साफ रुख देखने को मिला. किसी और सदस्य देश ने अमेरिकी कदम को लेकर सीधे असहमति नहीं दिखाई. इसलिए बैठक खत्म होने के बाद कोई प्रस्ताव या साझा बयान जारी नहीं किया जा सका. इस बीच संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की प्रतिनिधि निकी हेली ने डोनाल्ड ट्रंप के फैसले का बचाव किया. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र पर इजरायल के प्रति दुश्मनी रखने का आरोप लगाया. वहीं, मध्य पूर्व के प्रतिनिधि निकोले म्लादेनोव ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए चेतावनी दी कि यरुशलम को इजरायल की राजधानी घोषित करने के नतीजे हिंसात्मक हो सकते हैं. उन्होंने सभी सदस्य देशों से बातचीत करने और उकसावे से बचने को कहा.

शुक्रवार को सैकड़ों मुसलमानों ने वॉशिंगटन स्थित वाइट हाउस के सामने विरोध प्रदर्शन किया. डेक्कन क्रॉनिकल की खबर के मुताबिक फिलिस्तीनी पोशाक पहने प्रदर्शनकारियों ने वहां प्रार्थना की. इनमें से कई लोगों ने फिलिस्तीन का झंडा लिया हुआ था. कुछ प्रदर्शनकारियों ने हाथों में तख्तियां ली हुई थीं. इनमें इजरायल पर पूर्वी Jerusalem और वेस्ट बैंक (पश्चिमी तट) पर कब्जा करने का आरोप लगाया गया था. ट्रम्प समर्थकों और विरोधियों की इस आग से एक बार फिर Jerusalem विवाद में झुलसने को तैयार हो गया है।
-अनिल शर्मा