जयंती विशेष: सुप्रसिद्ध तबला वादक पद्मविभूषण किशन महाराज

पेइचिंग। भारत के सुप्रसिद्ध तबला वादक किशन महाराज की आज जन्‍मतिथि है। उनका जन्‍म 03 सितंबर 1923 को वाराणसी में हुआ। तबले के उस्ताद किशन महाराज मूर्तिकार, चित्रकार, वीर रस के कवि और ज्योतिष के मर्मज्ञ भी थे।
अल्हड़ और बिंदास अंदाज के धनी किशन महाराज का नाम जुबान पर आते ही मन श्रद्धा और सम्मान से भर उठता है। उन्होंने तबले की थाप से संगीत की दुनिया में अलग ही मुकाम स्थापित किया था। संगीत के क्षेत्र में एक अलग पहचान बनाने वाले संगीत सम्राट का जिंदगी जीने का अंदाज भी कुछ अलग ही था।
कृष्ण जन्माष्टमी पर आधी रात को जन्म होने के कारण उनका नाम किशन पड़ा। उन्होंने अपने प्रारंभिक वर्षों में पिता पंडित हरि महाराज से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की। पिता के देहांत के बाद उनके चाचा एवं पंडित बल्‍देव सहाय के शिष्य पंडित कंठे महाराज ने उनकी शिक्षा का कार्यभार संभाला।
पं. राजन-साजन मिश्र ने सुनाया संस्मरण
एक बार थ्री लीजेंड्स आफ इंडिया कंसर्ट सीरीज के तहत अहमदाबाद में कार्यक्रम था। मामा जी, पं. बिरजू महाराज और हम दोनों भाइयों को प्रस्तुति देनी थी। सभागार इस तरह खचाखच भरा कि वहां के तत्कालीन गवर्नर के लिए अलग प्लास्टिक की कुर्सी लगानी पड़ी। इस बीच ग्रीन रूम में तबले को साधने में उसकी बध्धी टूट गई। हम नर्वस हो गए कि अब क्या होगा। शिष्य आसपास से कोई तबला ढूंढने के लिए भागे लेकिन, मामाजी जी के चेहरे पर कोई परेशानी के भाव नहीं, बड़ी तल्लीनता के साथ तबले की गिट्टी निकाली। बध्धी खोली, तबले को पैर में फंसाया और खींच कर बांध दिया। बोले… अब चमड़ा फट जाएगा लेकिन बध्धी नहीं टूटेगी। गजब का विल पावर देख हम दंग रह गए।
बनारसी अंदाज में जिया जीवन
उन्होंने अपना जीवन अल्हड़ और बिंदास तरीके से बनारसी अंदाज में जिया। इसके साथ ही संगीत से उनका नाता दिन पर दिन गहरा होता चला गया। एक तरफ संगीत की महारथ तो दूसरी तरफ जिंदगी जीने का मस्त अंदाज ये दो ऐसी खास वजहें है जिनके चलते वो वो हमेशा लोगों के दिलों में राज करते रहेंगे।
तबले की थाप के बाद उनका संगीत का सफर कुछ यूं शुरू हुआ कि तमाम धुरंधरों के साथ उन्होने संगत दी थी। इनमें पंडित भीमसेन जोशी, पंडित ओंकार ठाकुर, पंडित रविशंकर, उस्ताद फैय्याजखान, अलीखान, उस्ताद बड़े गुलाम उस्ताद अली, अकबर खान वसंत राय, महान कलाकार शामिल रहे । इतना ही नहीं नृत्य की दुनिया के महान हस्तियां शंभु महाराज, नटराज गोपी कृष्ण और बिरजू महाराज के कार्यक्रमों में भी उन्होंने शिरकत की और तबले पर संगत दी ।
अगर पुरस्कारों की बात करें तो किशन महाराज को साल 2002 में पद्मविभूषण से पुरस्कार से नवाजा गया था । उन्हें साल 1973 में पद्मश्री पुरस्कार मिला , साल 1984 में संगीत नाटक सम्मान, साल 1986 में उस्ताद इनायत अली खान पुरस्कार दिया गया , इसके अलावा उन्हे दीनानाथ मंगेश्कर पुरस्कार उत्तरप्रदेश रत्न, उत्तरप्रदेश गौरव भोजपुरी रत्न, ताल विलास सम्मान के साथ ही भगीरथ सम्मान और लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड भी दिया गया था ।
किशन महाराज वैसे तो मस्त और अल्हड़ स्वभाव के इंसान थे, लेकिन जब उनका पारा चढ़ता था संभालना मुश्किल हो जाता था। ये घटना है वाराणसी में टाइटेनिक फिल्म के प्रीमियर शो के समय की, शहर के सभी प्रतिष्ठित लोगों को इस कार्यक्रम में बुलाया गया था। किशन महाराज को भी यहां आमंत्रित किया गया था। उन्हें बालकनी में सबसे पीछे एक बढ़िया सीट पर बैठाया गया था लेकिन वो इस बात पर भड़क गये कि उन्हें सबसे पीछे क्यों बैठाया गया है, वो शो छोड़ कर जाने लगे। बड़ी मुश्किल से प्रशासन के अधिकारियों ने उन्हें मनाया और सिनेमा हाल की सबसे आगे वाली सीट बैठाया। सिनेमाहाल की आगे वाली सीट पर बैठ कर ही किशन महाराज ने पूरे तीन घंटे तक फिल्म देखी लेकिन उनकी इस जिद के चलते वाराणसी के डीएम और कमिश्नर को भी उनके साथ बैठ कर फिल्म देखनी पड़ी थी।
प्रभावशाली व्यक्तित्व
स्वर्गीय पंडित किशन महाराज प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे। माथे पर एक लाल रंग का टिक्का हमेशा लगा रहता था। वे जब संगीत सभाओं में जाते, संगीत सभाएंलय ताल से परिपूर्ण हो गंधर्व सभाओं की तरह गीत, गति और संगीतमय हो जातीं। तबला बजाने के लिए वैसे पद्मासन में बैठने की पद्धति प्रचलित हैं किंतु स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी दोनों घुटनों के बल बैठ कर वादन किया करते थे, ख्याल गायन के साथ उनके तबले की संगीत श्रोताओं पर जादू करती थी, उनके ठेके में एक भराव था, और दांये और बांये तबले का संवाद श्रोताओं और दर्शकों पर विशिष्ट प्रभाव डालता था।
04 मई 2008 को वाराणसी में ही किशन महाराज की मृत्‍यु हुई।
-Legend News

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