रोशनी जमीन घोटाले ने फारूक अब्‍दुल्‍ला और गुपकार गैंग की पोल खोली

नई दिल्‍ली। वित्त और कॉर्पोरेट मामलों के राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने मंगलवार के एक समाचार चैनल से बात करते हुए जम्मू-कश्मीर में रोशनी जमीन घोटाला मामले में फारूक अब्दुल्ला पर लगे आरोपों पर बात की। यहां उन्होंने कहा कि यह मामला सामना आने के बाद जम्मू-कश्मीर के गुपकार गैंग की पोल खुल गई है।

ठाकुर ने गुपकार गठबंधन को ‘ठगबंधन’ करार देते हुए कहा कि यह 2001 से चल रहा है। उन्होंने कहा कि फारूक अब्दुल्ला को उन पर लगे आरोपों का जवाब देना चाहिए। नेता-अधिकारी यहां जमीन लूट कर खा गए, अरबों-खरबों की जमीन कौड़ियों के भाव खरीदी। यह जम्मू-कश्मीर के संसाधनों की लूट है।
इससे पहले इस मामले में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल्ला पर 7 कनाल जमीन पर अवैध तरीके से कब्जा करने का आरोप लगाया था। बता दें कि जम्मू-कश्मीर का रोशनी जमीन घोटाला इस वक्त सुर्खियों में है। 25 हजार करोड़ के इस जमीन घोटाले में कई राजनीतिक दलों के नेताओं और नौकरशाहों का नाम सामने आया है, जिनमें फारूक अब्दुल्ला का नाम भी शामिल है।

फारूक अब्दुल्ला पर लगे यह आरोप
जम्मू-कश्मीर के रोशनी जमीन घोटाला मामले में फारूक अब्दुल्ला के दामन पर भी दाग लगे हैं। दरअसल, जम्मू के सजवान में फारूक अब्दुल्ला का मकान है, जो 10 कनाल जमीन पर बना हुआ है। आरोप है कि इस 10 कनाल जमीन में 3 कनाल जमीन फारूक अब्दुल्ला की है जबकि बाकी 7 कनाल जमीन जंगल की है, जिस पर रोशनी एक्ट के तहत कब्जा कर लिया गया।

फारूक अब्दुल्ला ने कही यह बात
रोशनी जमीन घोटाला में नाम सामने आने के बाद फारूक अब्दुल्ला ने सफाई दी है। उन्होंने कहा कि उस इलाके में सिर्फ मेरा ही घर नहीं है। वहां सैकड़ों घर हैं। यह मुझे परेशान करने की कोशिश है, उन्हें करने दीजिए।

यह है रोशनी जमीन घोटाला

बता दें कि जम्मू-कश्मीर राज्य भूमि अधिनियम 2001 तत्कालीन फारूक अब्दुल्ला सरकार जल विद्युत परियोजनाओं के लिए फंड इकट्ठा करने मकसद से लाई थी। इस कानून को रोशनी नाम दिया गया। इस कानून के अनुसार भूमि का मालिकाना हक उसके अनधिकृत कब्जेदारों को इस शर्त पर दिया जाना था कि वे लोग मार्केट रेट पर सरकार को भूमि का भुगतान करेंगे। इसकी कट ऑफ 1990 में तय की गई थी। शुरुआत में सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले किसानों को कृषि के लिए मालिकाना हक दिया गया। हालांकि इस अधिनियम में दो बार संशोधन हुए, जो मुफ्ती सईद और गुलाम नबी आजाद की सरकार के कार्यकाल में हुए। उस दौरान इस कानून की कट ऑफ पहले 2004 और बाद में 2007 कर दी गई। 2014 में सीएजी की रिपोर्ट आई, जिसमें खुलासा हुआ कि 2007 से 2013 के बीच जमीन ट्रांसफर करने के मामले में गड़बड़ी हुई। सीएजी रिपोर्ट में दावा किया गया कि सरकार ने 25 हजार करोड़ के बजाय सिर्फ 76 करोड़ रुपये ही जमा कराए। जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के आदेश पर इस मामले की जांच अब सीबीआई कर रही है।

-एजेंसियां

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