कोई ले या न ले लेकिन… ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’

हर्तुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत्सर्वदा
ह्यर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धिं पराम् ।
कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं विद्याख्यमन्तर्धन

ज्ञान विशिष्ट धन है जो आपको अक्षुण्य आनंद की प्राप्ति कराता है अतः कुछ प्राप्त करना है तो अहंकार को त्याग कर ऐसे ज्ञानी पुरुषों से कुछ सीखना चाहिए क्योंकि ऐसे ज्ञानी जन से कुतर्क और प्रतिस्पर्धा से तो स्वयं की ही हानि होगी।

किसी को सीख देना या कहें उपदेश देना कोई कठिन विषय नहीं है, कठिनाई होती है किसी के ज्ञान को ग्रहण करने में। यह अहंकार अथवा भ्रम ही है कि स्वयं किसी को सुनने को तैयार नहींं हैं परन्तु सलाह देने के लिए आतुर रहते हैं, भले ही कोई लेना चाहे अथवा नहीं क्योंकि किसी को सीख देने में अंतः में बड़प्पन का भाव स्वतः पैदा हो जाता है और यह अपने अहंकार को पुष्ट करने का छद्म मार्ग भी हो सकता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सलाह सबसे कम माँगी जाने वाली चीज है और सबसे ज़्यादा सलाह ही दी जा रही है।

जब किसी को सलाह देते हैं तो अपने ज्ञान पर स्वयं मुग्ध हो रहे होते हैं और उससे भी ज्यादा प्रसन्नता किसी को अज्ञानी सिद्ध करके मिल रही होती है। विडम्बना ही है कि जिस विषय का कभी कोई अनुभव न किया हो, कभी उस विषय को जाना भी न हो, फिर भी उस विषय पर भी सलाह देने में कोई संकोच नही होता। यह तो ऐसे ही है कि सांसारिक भोगों में आकंठ डूबे, वैराग्य समझा रहे हैं, महाकृपण सेवा और त्याग का उपदेश दे रहे हैं और सांसारिक विषय-वस्तु में उलझे, मोक्ष का मार्ग बता रहे हैं।

यह जो अहंकार है, वह सलाह देते समय तो मिथ्या आनन्द के सागर में गोता लगा रहा होता है किंतु किसी से सलाह मिलते ही व्यथित हो उठता है। अपने स्वार्थ और अहंकार के अनुरूप सलाह तो सुन भी ले, किंतु विपरीत तो सुहाती ही नहीं है। अनुभव कर सकते हैं कि यदि कोई सलाह दे रहा होता है तो मन में सहस्त्र विचार-भाव प्रकट हो रहे होते हैं और मन में अपनी ही खिचड़ी पक रही होती है। जब ध्यान अपनी ही दुनिया में लगा है तो सम्भवतः जब कुछ पल्ले भी नहीं पड़ रहा, तो ऐसी सलाह से लाभ भी क्या होगा। सम्भव है कि जिसको ज्ञान बाँट कर स्वयं धन्य अनुभव कर रहे हैं , वह ज्ञान नहीं अपितु कुछ और ही खोज रहा हो। अतः बिना समझे बूझे अनावश्यक सलाह अथवा सीख सदैव निरर्थक ही होती हैं।

श्री रामचरितमानस में स्पष्ट कहा है कि-
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति | सहज कृपन सन सुंदर नीति ||१||
ममता रत सन ज्ञान कहानी | अति लोभी सन बिरती बखानी ||
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा | उसर बिज बए फल जथा ||२||

धूर्त से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूस से सुंदर नीति (उदारता का उपदेश), ममता में फंसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शांति) की बात और कामी से भगवान की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है (अर्थात ऊसर में बीज बोने की भाति यह सब व्यर्थ जाता है)

बिना देश काल परिस्थिति का विचार किए हुए सभी ज्ञान बाटने को तत्पर हैं अथवा कहें अपनी विद्धता का बखान चल रहा है परंतु जीवन में कहीं ऐसे उपदेशों और ज्ञान का प्रभाव दिख तो नहीं रहा है। सब अपनी अपनी कामनाओं के अनुरूप ही सांसारिक अथवा आध्यात्मिक जीवन में प्राप्तियों के लिए प्रयासरत हैं। यह भी सत्य है कि अंतः से कभी कुछ सीखने की कामना ही नहीं रही और प्रायः भाव यही रहता है कि जो जानते हैं वही काफ़ी है।

यह भी एक कारण है कि जीवन भर हम गुरु खोजने का उपक्रम करते रहते हैं परन्तु गुरु के स्थान पर खोज कोई सहयोगी लेते हैं। कदाचित गुरु मिल भी गए तो परिवर्तन तो विरले ही किसी के जीवन में दिखता है, अन्यथा संसार तो उसी ढर्रे पर चल रहा है। गुरु की खोज सद्मार्ग और ज्ञान प्राप्ति के लिए ही तो हो रही है किंतु सद्मार्ग और ज्ञान दोनों का निर्धारण अपनी सुविधा के अनुरूप ही स्वीकार्य है। ज्ञान भी वही प्रिय है जो अपने कर्मों में सहयोगी बना रहे और अहंकार को पुष्ट करे।

दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवनजठरे सद्गुरोर्ज्ञानदातुः स्पर्शश्चेत्तत्र कलप्यः स नयति यदहो स्वहृतामश्मसारम् । न स्पर्शत्वं तथापि श्रितचरगुणयुगे सद्गुरुः स्वीयशिष्ये स्वीयं साम्यं विधते भवति निरुपमस्तेवालौकिकोऽपि ॥

गुरु की महिमा उद्घाटित करते हुए बताया है कि ब्रह्मांड में गुरु के समान कोई अन्य नहीं हो सकता। पारस मणि लोहे को सोना बना देती है परंतु अपने गुण लोहे में प्रकट नहीं कर सकती है परंतु गुरु शिष्य को अपने समस्त गुणों से परिपूर्ण करने की सामर्थ्य रखता है। ऐसे महापुरुषों को खोजना सहज नहीं है और न ही जिज्ञासु शिष्य को। गुरु-शिष्य का ऐसा दिव्य भाव तो कहानियों और पुस्तकों में ही अधिक दिखता है, संसार में तो खोजने पड़ेंगे।

आज अधिकांश गुरु भले ही शिष्यों को सांसारिक वासनाओं से मुक्ति का मार्ग न समझा पाए हों परंतु शिष्यों ने उनको अपना मार्ग भली भाँति समझा दिया है। ऐसे शिष्यों ने गुरु के जीवन में सांसारिक सुख-सुविधाओं के अम्बार लगा दिए हैं और आज अधिकांश गुरु-शिष्य में समानता मात्र इन्हीं सांसारिक विषय-वस्तुओं में ही दिखती है। सत्य तो यह है कि शिष्य को गुरु का अनुसरण करना चाहिए परन्तु देख सकते हैं कि आज अधिकांश गुरु, शिष्यों का ही अनुकरण करते दिख रहे हैं और कहीं कहीं तो उनकी दिनचर्या और जीवन में शिष्यों का हस्तक्षेप, गुरु-शिष्य सम्बन्धों की नवीन व्याख्या ही लिख रहा है।

आज सांसारिक समृद्धि और राजनीतिक प्रभाव से आध्यात्म में क़द नापा जा रहा है। कितना विचित्र है कि न कोई सीखना चाहता हैं और न समझना , सब लगे हैं अपने कार्य और व्यवहार को शास्त्र सम्मत सिद्ध करने में। सत्य को धारण करना तो दूर, जानने का भाव मात्र भी बोझ लगता है और किसी को नैतिकता की सीख देने में आनंदानुभूति की कोई सीमा ही नहीं है।
शिष्य भाव तो दुर्लभ हो गया है, प्रायः सभी गुरु बनने को लालायित दिख रहे हैं।

कल्पना कर सकते हैं कि अहंकार अपने शिखर पर नृत्य कर रहा होगा कि गुरु को ही अपने रंग में रंग दिया अथवा कहें कि अपना सांसारिक सहयोगी बना लिया। देख सकते हैं कि पहले जहां गुरु, परमात्मा और शिष्य के मध्य ‘सेतु’ बनते रहे हैं, आज अनेकों गुरु, सत्ता और शिष्य के मध्य ‘सेतु’ बनते अधिक दिख रहे हैं। जो खुले हृदय से सलाह लेने को तैयार है, वही मित्र है और वही शिष्य भी हो सकता है। अन्तर यही है क‍ि मित्रता में तुम अपने अहंकार के साथ भी प्रेम कर सकते हो किंतु शिष्य भाव में तो अपना अहं छोड़ कर ही प्रेम करना होगा।

गुरु शिष्य का भाव तो परम पवित्र है और यह परस्पर प्रेम-समर्पण पर टिका है। गुरु-शिष्य के सम्बंधों की शुरुआत तो मित्र भाव से होगी जहां मात्र प्रेम और समानता का भाव होगा किंतु पूर्णता शिष्यत्व पर होगी।

कितना हृदय स्पर्शी प्रसंग है कि पूर्णावतार भगवान कृष्ण अर्जुन को युद्ध भूमि में धर्म-कर्म के रहस्यों को उद्घाटित कर रहे हैं और अर्जुन निरंतर संदेह अथवा जिज्ञासा प्रकट कर रहा है। कैसे सम्भव है अखिल ब्रह्मांड नायक भगवान श्री कृष्ण के पवित्र शब्दों पर सन्देह ?

भाव की दृष्टि से देखें तो अर्जुन के हृदय में तो अनंत लीला पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण के प्रति अनन्य सखा भाव है, एक निर्मल मैत्री भाव है। जहां निर्मल सखा भाव होता है, वहाँ जिज्ञासाएँ तर्क पर आधारित नहीं होती हैं , अपितु उनमें सन्देह से निवृत्ति का भाव रहता है। कुछ जानने – समझने का भाव होता है। भगवान श्री कृष्ण भी प्रसन्नता से अर्जुन के सन्देह के घेरे को तोड़ते जा रहे हैं, धीरे धीरे अर्जुन के समस्त संदेह दूर होते हैं और उसके हृदय में श्रद्धा का भाव प्रगाढ़ होता है। उसके अंतः और बाह्य नेत्र खुल गए और उसको सखा भाव में विराट के दर्शन हो उठे। अर्जुन का भ्रम दूर हुआ और वह समझ गया क‍ि जिसको वह अपना प्रिय सखा समझता रहा, वह मात्र सखा नहीं है अपितु अखिल ब्रह्माण्ड नायक हैं।

बिना प्रेम के श्रद्धा कैसे होगी ? श्रद्धा तो प्रेम का शिखर है – सार है। अर्जुन को तो अथाह प्रेम था कृष्ण से, एक अटूट विश्वास था कि जो भी कृष्ण कह रहे हैं, उसी में कल्याण निहित है। एक भरोसा है कृष्ण पर, पूर्णविश्वास बना है कि कृष्ण के सानिध्य में भटकूँगा तो नहीं। यही जो विश्वास है – एक भरोसा है,यही गुरु – शिष्य के बीच का सेतु है और यह जो सेतु है – भाव है , इसी से गुरु-शिष्य के मध्य पवित्र सम्बन्ध की उत्पत्ति होती है। अर्जुन को यदि भगवान कृष्ण ने पुरुषश्रेष्ठ कहा तो इसमें आश्चर्य कैसा। अर्जुन तो अदभुत था, सखा के अंदर ही सम्पूर्ण विराट के दर्शन कर लिए। जो बचपन से समझता रहा – देखता रहा , उससे ऊपर उठ कर एक नवीन रहस्य को जान लिया क्योंकि उसके मार्ग में उसका अहंकार बाधा नहीं बना। ऐसे ही निर्मल सखा भाव से पवित्र “गीता” का जन्म हुआ है। इसी पवित्र सखा भाव से श्री कृष्ण, गुरु रूप में प्रकट हुए और अर्जुन शिष्य रूप में धन्य हुआ।

सत्य ही है कि शिष्य होने के लिए झुकना पड़ता है , जैसे जैसे झुकते जाते हैं सीखने का भाव प्रबल होता जाता है और जैसे जैसे झुकते जाते हैं गुरुत्व भाव सजीव होता जाता है। यहाँ भी अर्जुन धीरे धीरे झुकता गया और भगवान श्री कृष्ण उसके हर प्रश्न का समाधान धैर्यपूर्वक करते गए, गुरु को तो धैर्यवान होना पड़ेगा। विक्षुब्ध जीवन में अज्ञान अपने चरम पर है, मन ने बड़े जतन से अपने जाल बिछा रखे हैं, एक भ्रम से सुलझो तो दूसरे में उलझा लेता है और उससे सुलझो तो तीसरे में, मन कभी पराजित नहीं होना चाहता, अंत तक जीतने की चेष्टा में रहता है।

स्वस्थ मन में प्रश्न उठना तो उतना ही स्वाभाविक है जितना किसी वृक्ष में पत्ते लगना परंतु सीखने का निर्मल भाव होगा तभी कुछ लाभ होगा। अहंकार कभी सीखने नहीं देगा और बिना ज्ञान के आध्यात्मिक और सांसारिक जीवन में रस नहीं रहेगा। अतः अहंकार का त्याग कर जहां से भी मिले सद विचार अथवा भाव ईमानदारी से ग्रहण करना चाहिए। यदि हृदय में कोई जिज्ञासा उत्पन्न हुई है तो वह बिना समाधान के शान्त नहीं होगी; अतः अपनी जिज्ञासा को प्रकट करो और अर्जुन की तरह उनका समाधान खोजो।

यदि हृदय में सीखने का भाव और गुरु से प्रेम है तो सच्चा शिष्यत्व प्राप्त होगा। यदि सीखने की कला को समझ जाओगे और गुरु से हार कर भी अपने को जीता मानोगे क्योंकि प्राप्ति तो तुम्हीं को हुई है, यदि गुरु नही जीतता तो कैसे मुक्त होते भ्रम रूपी दलदल से। यदि गुरु की सीख से जीवन में ऊपर उठ सके तो इसी में ही सच्ची सिखलायी प्रकट होगी अन्यथा तो उसी अज्ञान के सागर में डूबते-उतरते रहोगे।

यदि कुछ सीखना चाहते हैं तो एक भरोसा होना चाहिए। गुरु तो एक तलवार की भाँति तुम्हारे जीवन से भ्रम-संदेह को काटेंगे, कहीं संदेह कर डर गए कि तलवार मुझे ही न काट दे तो कोई विशिष्ट प्राप्ति नहीं हो सकती। एक विश्वास होना चाहिए उस तलवार पर , कि यह मेरे जीवन से मात्र दुर्गुणों और अज्ञानता को ही काटेगी।

जैसे किसी डॉक्टर के पास जाते हो और वह चाकू से सर्जरी कर रहा है ; दर्द भी हो रहा है परंतु भरोसा है कि डॉक्टर मुझे रोगमुक्त कर रहा है। कभी कभी कल्याणकारी ज्ञान भी चुभता है – कष्ट देता है परंतु यदि प्रेम और भरोसा है तो उसको सावधानी से ग्रहण करोगे। यदि गुरु पर यह भरोसा नही है तो गुरु के समीप भी नही जाना चाहिए क्योंकि संदेह से कुछ प्राप्ति होने से रही।

ऑपरेशन से पहले एक व्यक्ति ने जेब से बटुआ निकला और रुपये गिनने लगा। डॉक्टर ने कहा कि फ़ीस ऑपरेशन के बाद में दे देना।
मरीज़ बोला फ़ीस कौन दे रहा है ? मैं तो अपने रुपए गिन रहा हूँ , बाद में गिनने में क्या फ़ायदा। कितने थे पता होगा तभी तो बाद में गिनने में सार है।
प्रायः बटुए पर हाथ रख कर ही तो गुरु के पास जाते हैं क्योंकि मान बैठे हैं कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। यदि इतना भी भरोसा नहीं है अथवा पूर्व का कोई कटु अनुभव है तो ऐसे गुरु के समीप भी नहीं जाना चाहिए, क्योंकि जिस सीख के लिए जा रहे हो वह तो मिलेगी नही क्योंकि सारा जतन तो बटुए की रक्षा में ही लगा रहेगा। जीवन में संदेह होना स्वभाविक है और इसमें कोई अपराध भी नहीं है। क्योंकि-

बहवो गुरवो लोके शिष्य वित्तपहारकाः ।
क्वचितु तत्र दृश्यन्ते शिष्यचित्तापहारकाः॥

जगत में अनेक गुरु शिष्य का वित्त हरण करनेवाले होते हैं परंतु शिष्य का चित्त हरण करनेवाले गुरु कम ही दिखाई देते हैं। संदेह मन करे किंतु हृदय में पूर्ण भरोसा हो, तब भी जीवन प्रकाशित हो सकता है और गुरु -ज्ञान, मन के संशय को हटा कर विराट के दर्शन कराने का मार्ग बना सकता है।

जब हृदय में प्रेम और मैत्री का भाव होगा, तभी कुछ सीख सकते हो। यदि हृदय में संशय है तो सीखने की अभिलाषा नहीं होगी। प्रश्न बुद्धि करेगी और खोज कोतूहलवश अथवा जिज्ञासावश करेंगे। ऐसे भाव से जीवन कोई विशेष परिवर्तन सम्भव नहीं है , हो सकता है कुछ शाब्दिक ज्ञान प्राप्त कर लें परंतु कोई रचनात्मक परिवर्तन अथवा उपलब्धि नहीं होगी।

सीखने के लिए प्रेम और मैत्री भाव के साथ साथ धैर्य भी बहुत आवश्यक है, ध्यान से सुना नहीं और मान लिया कि सब समझ गया , यह जो अधीरता है यह कभी सीखने नही देगी। भोजन भी बिना अच्छे से सिद्ध हुए खा लोगे तो रोग उत्पन्न कर देगा , धैर्य धारण करोगे तो कुछ सीख पाओगे – जान पाओगे।

ज्ञानं तु द्विविधं प्रोक्तं शाब्दिकं प्रथमं स्मृतम् ।
अनुभवाख्यं द्वितीयं तुं ज्ञानं तदुर्लभं नृप ॥

ज्ञान दो प्रकार के होते हैं- एक तो स्मृतिजन्य शाब्दिक ज्ञान और दूसरा अनुभवजन्य ज्ञान जो अत्यंत दुर्लभ है।

यदि इच्छा हो तो स्मृतिजन्य शाब्दिक ज्ञान प्राप्त करना कठिन नहीं है किंतु अनुभवजन्य ज्ञान को प्राप्त करने के लिए अहंकार का मूलोच्छेद करना ही पड़ेगा। समझ सकते हैं कि अनुभवजन्य ज्ञान को प्राप्त करने के लिए महापुरुषों ने कठिन तप और साधना की हैं और तभी उनको अदभुत ज्ञान की प्राप्ति हुई। अतः सीखने की कला का ज्ञान होना आवश्यक है और इसी से जीवन में रचनात्मकता और सार्थकता प्रकट होगी।

सीखने के भाव हो तो जहां अवसर मिला, इस चराचर में से कुछ पा लोगे।
भगवान ब्रह्मा-विष्णु-महेश के अवतार भगवान श्री दत्तात्रेय महाराज ने स्वयं, कबूतर, पृथ्वी, सूर्य, पिंगला, वायु, मृग, समुद्र, पतंगा, हाथी, आकाश, जल, मधुमक्खी, मछली, बालक, कुरर पक्षी, अग्नि, चंद्रमा, कुमारी कन्या, सर्प, तीर (बाण) बनाने वाला, मकडी़, भृंगी, अजगर और भौंरा (भ्रमर) को अपने चौबीस गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया है। यदि भगवान दत्तात्रेय जी के इस भाव को हृदय में धारण कर लिया तो जीवन में अनेकों उत्तम एवं कल्याणकारी मार्ग प्रशस्त हो उठेंगे।

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-कप‍िल शर्मा , सच‍िव,
श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा

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