10 मई 1857 को हुआ था आग़ाज प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम का

आज 10 मई है। इस दिन का भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है। 1857 में भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम इसी दिन आरंभ हुआ था।

आज 10 मई है। इस दिन का भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है। 1857 में भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम इसी दिन आरंभ हुआ था। 1857 वह वर्ष है, जब भारतीय वीरों ने अपने शौर्य की कलम को रक्त में डुबो कर काल की शिला पर अंकित किया था और ब्रिटिश साम्राय को कड़ी चुनौती देकर उसकी जडें हिला दी थीं। 1857 का वर्ष वैसे भी उथल.पुथल वाला रहा है।

1857 की क्रान्ति इसलिये और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि ठीक सौ साल पहले सन् 1757 में प्लासी के युध्द में विजय प्राप्त कर राबर्ट क्लाइव ने अंग्रेजी राज की भारत में नींव डाली थी। विभिन्न इतिहासकारों और विचारकाें ने इसकी अपने.अपने दृष्टिकोण से व्याख्यायें की हैं।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और महान चिन्तक पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि यह केवल एक विद्रोह नहीं था, यद्यपि इसका विस्फोट सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था, क्योंकि यह विद्रोह शीघ्र ही जन विद्रोह के रूप में परिणित हो गया था। बेंजमिन डिजरायली ने ब्रिटिश संसद में इसे राष्ट्रीय विद्रोह बताया। प्रखर विचारक बीडी सावरकर व पट्टाभि सीतारमैया ने इसे भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम, जान विलियम ने सिपाहियों का वेतन सुविधा वाला मामूली संघर्ष. व जान ब्रूस नार्टन ने जन.विद्रोह कहा।

मार्क्सवादी विचारक डा0 राम विलास शर्मा ने इसे संसार की प्रथम साम्राय विरोधी व सामन्त विरोधी ान्ति बताते हुए 20वीं सदी की जनवादी क्रान्तिकायों की लम्बी श्रृंखला की प्रथम महत्वपूर्ण कड़ी बताया। प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक विचारक मैजिनी तो भारत के इस प्रथम स्वाधीनता संग्राम को अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखते थे और उनके अनुसार इसका असर तत्कालीन इटली, हंगरी व पोलैंड की सत्ताओं पर भी पड़ेगा और वहाँ की नीतियाँ भी बदलेंगी।

1857 की ान्ति को लेकर तमाम विश्लेषण किये गये हैं। इसके पीछे राजनैतिक.सामाजिक.धार्मिक.आर्थिक सभी तत्व कार्य कर रहे थे, पर इसका सबसे सशक्त पक्ष यह रहा कि राजा.प्रजा, हिन्दू.मुसलमान, जमींदार.किसान, पुरूष.महिला सभी एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुध्द लड़े। 1857 की ान्ति को मात्र सैनिक विद्रोह मानने वाले इस तथ्य की अवहेलना करते हैं कि कई ऐसे भी स्थान थे, जहाँ सैनिक छावनियाँ न होने पर भी ब्रिटिश सत्ता के विरूध्द ान्ति हुयी।

इसी प्रकार वे यह भूल जाते है कि वास्तव में ये सिपाही सैनिक वर्दी में किसान थे और किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के हनन का सीधा तात्पर्य था कि किसी.न.किसी सैनिक के अधिकारों का हनन, क्योंकि हर सैनिक या तो किसी का पिता, बेटा, भाई या अन्य रिश्तेदार है। यह एक तथ्य है कि अंग्रेजी हुकूमत द्वारा लागू नये भू.राजस्व कानून के खिलाफ अकेले सैनिकों की ओर से 15000 अर्जियाँ दायर की गयी थीं।

डॉ0 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के शब्दों में. सन् 1857 की क्रान्ति को चाहे सामन्ती सैलाब या सैनिक गदर कहकर खारिज करने का प्रयास किया गया हो, पर वास्तव में वह जनमत का राजनीतिक.सांस्कृतिक विद्रोह था। भारत का जनमानस उसमें जुड़ा था, लोक साहित्य और लोक चेतना उस क्रान्ति के आवेग से अछूती नहीं थी। स्वाभाविक है कि ान्ति सफल न हो तो इसे विप्लव या विद्रोह ही कहा जाता है।
यह क्रान्ति कोई यकायक घटित घटना नहीं थी, वरन् इसके मूल में विगत कई सालों की घटनायें थीं, जो कम्पनी के शासनकाल में घटित होती रहीं। एक ओर भारत की परम्परा, रीतिरिवाज और संस्कृति के विपरीत अंग्रेजी सत्ता एवं संस्कृति सुदृढ हो रही थी तो दूसरी ओर भारतीय राजाओं के साथ अन्यायपूर्ण कार्रवाई, अंग्रेजों की हड़पनीति, भारतीय जनमानस की भावनाओं का दमन एवं विभेदपूर्ण व उपेक्षापूर्ण व्यवहार से राजाओं, सैनिकों व जनमानस में विद्रोह के अंकुर फूट रहे थे।

इसमें कोई शक नहीं कि 1757 से 1856 के मध्य देश के विभिन्न स्थानों पर भिन्न.भिन्न वर्गों द्वारा कई विद्रोह किये गये। यद्यपि अंग्रेजी सेना बार.बार इन विद्रोहों को कुचलती रही पर उसके बावजूद इन विद्रोहों का पुन: सर उठाकर खड़ा हो जाना भारतीय जनमानस की जीवटता का ही परिचायक कहा जायेगा।

1857 के विद्रोह को इसी पृष्ठभूमि में देखे जाने की जरूरत है। अंग्रेज इतिहासकार फॉरेस्ट ने एक जगह सचेत भी किया है कि. 1857 की ान्ति हमें इस बात की याद दिलाती है कि हमारा साम्राय एक ऐसे पतले छिलके के ऊपर कायम है, जिसके किसी भी समय सामाजिक परिवर्तनों और धार्मिक ान्तियों की प्रचण्ड वालाओं द्वारा टुकडे.टुकडे हो जाने की सम्भावना है।

अंग्रेजी हुकूमत को भी 1757 से 1856 तक चले घटनामों से यह आभास हो गया था कि वे अब अजेय नहीं रहे। तभी तो लार्ड केनिंग ने फरवरी 1856 में गर्वनर जनरल का कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व कहा था कि मैं चाहता हूँ कि मेरा कार्यकाल शान्तिपूर्ण हो। मैं नहीं भूल सकता कि भारत के गगन में, जो अभी शान्त है, कभी भी छोटा सा बादल, चाहे वह एक हाथ जितना ही क्यों न हो, निरन्तर विस्तृत होकर फट सकता है, जो हम सबको तबाह कर सकता है। लार्ड केनिंग की इस स्वीकारोक्ति में ही 1857 की क्रान्ति के बीज छुपे हुये थे।

1857 की क्रान्ति की सफलता.असफलता के अपने.अपने तर्क हैं पर यह भारत की आजादी का पहला ऐसा संघर्ष था, जिसे अंग्रेज समर्थक सैनिक विद्रोह अथवा असफल विद्रोह साबित करने पर तुले थे, परन्तु सही मायनों में यह पराधीनता की बेड़ियों से मुक्ति पाने का राष्ट्रीय फलक पर हुआ प्रथम महत्वपूर्ण संघर्ष था।

अमरीकी विद्वान प्रो0 जी0 एफ0 हचिन्स के शब्दों में 1857 की क्रान्ति को अंग्रेजों ने केवल सैनिक विद्रोह ही कहा क्योंकि वे इस घटना के राजद्रोह पक्ष पर ही बल देना चाहते थे और कहना चाहते थे कि यह विद्रोह अंग्रेजी सेना के केवल भारतीय सैनिकों तक ही सीमित था। परन्तु आधुनिक शोध पत्रों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह आरम्भ से सैनिक विद्रोह के ही रूप में हुआ, परन्तु शीघ्र ही इसने लोकप्रिय विद्रोह का रूप धारण कर लिया।

वस्तुत: इस ान्ति को भारत में अंग्रेजी हुकूमत के विरुध्द पहली प्रत्यक्ष चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। यह आन्दोलन भले ही भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति न दिला पाया होए लेकिन लोगों में आजादी का जबा जरूर पैदा कर गया।

1857 की इस ान्ति को कुछ इतिहासकारों ने महास्वप्न की शोकान्तिका कहा है, पर इस गर्वीले उपम के फलस्वरूप ही भारत का नायाब मोती ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों से निकल गया और जल्द ही कम्पनी भंग हो गयी। 1857 के संग्राम की विशेषता यह भी है कि इससे उठे शंखनाद के बाद जंगे.आजादी 90 साल तक अनवरत चलती रही और अंतत: 15 अगस्त, 1947 को हम आजाद हुए !

मेरठ से कुछ यूं उठी थी क्रांति की ज्‍वाला

जब औरतों ने कहा कि तुम चूडियां पहनकर घरों में बैठो:
मेरठ की बख्ताबरी देवी, भगवती देवी त्यागी, हबीबी खातून गुर्जर, शोभा देवी ब्राह्मामणी, मामकौर गडरिया, भगवानी देवी, इंदरकौर जाट, जमीला पठान आदि सहित मेरठ-मुजफ्फरनगर की 255 महिलाएं फांसी चढ़ी। कुछ लड़ते-लड़ते शहीद हुई। असगरी बेगम को तो पकड़कर जिंदा जला दिया था। इतना ही नहीं मेरठ सदर बाजार की वेश्याओं ने 85 सैनिकों की गिरफ्तारी के बाद कहा था कि ‘लाओ अपने हथियार हमें दो हम जंग करके उन बहादुर सिपाहियों को जेल से अपने आप आजाद करा लेंगे, तुम चूड़ि‍यां पहनकर घरों में बैठो।’

इतिहास के वो तीन दिन थे खास
9 मई 1857 की सुबह परेड ग्राउंड पर मेरठ की तीनों रेजीमेंट के सिपाहियों के सामने कारतूस लेने से इनकार करने वाले तीसरी अश्वसेना के 85 सिपाहियों का कोर्ट मार्शल कर दिया गया। जानबूझकर हजारों सैनिक इस घटना के दौरान मूक बने रहे। सिपाहियों को अपमानित करने के बाद विक्टोरिया पार्क स्थित जेल में भेज दिया गया।

85 सिपाहियों को जेल से मुक्त कराया
10 मई की शाम 5 बजे गिरजाघर घंटा बजता है। इसके बाद 6:30 बजे इन्हीं सिपाहियों ने अपने साथी 85 सिपाहियों को जेल से मुक्त कराया। ब्रिटिश सेना के प्रतीकों को हिंसा और आगजनी का शिकार बनाया। इस दौरान कई गोरों की हत्या कर दी गई। सिपाहियों की कई टोलियां पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत ‘दिल्ली चलो’ अभियान को अंजाम देती हुई दिल्ली पहुंच गईं।

14 मई को दिल्ली पर क्रांतिकारियों का कब्जा
11 मई की सुबह सैनिक मेरठ से बड़ी संख्‍या में दिल्ली पहुंचे। यहां बहादुर शाह का फरमान ब्रिटिश अधिकारियों को दिया गया कि वे दिल्ली के शस्त्रागार को शाही सेना के सुपुर्द कर दें। मारो फिरंगी अभियान के बाद 14 मई को दिल्ली पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया। इस तरह से 10 मई 1857 प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम में एक खास द‍िन बन गया था।

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