आसान नहीं होता है सन्यास लेना और इसका मार्ग

सन्यास लेने या देने की चीज नहीं है। यह एक मानसिक भाव है, जिसके प्रति आकर्षण परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होता है। दीक्षा, आचरण के नियम, वेशभूषा, विधि आदि सम्प्रदाय या आश्रम विशेष या गुरु विशेष के होते है; पर संन्यास में इसकी कोई उपयोगिता नहीं है।
जब किसी भावनात्मक चोट से या स्वयं की विचार शक्ति से भौतिक जगत से मोह टूटता है, तो व्यक्ति स्वयं और स्वयं के जीवन का कारण तलाशने लगता है। सन्यास का प्रारंभ यहाँ से होता है। इसके लिए कोई नियम नहीं है। विधियाँ और नियम भौतिक साधनाओं के लिए होते है। सन्यास पूर्णतया भावनात्मक ज्ञानमार्ग है, जो विचार शक्ति, तर्क शक्ति, मनन शक्ति के द्वारा भौतिकता का बेध कर अंतिम सत्य तक पहुँचाता है।

सन्यास लेना सबके बस की बात नहीं है सन्यासी जीवन बीतना बेहद कठिन और मुश्किलों भरा होता है। सन्यासी बनने के लिए एक व्यक्ति को सभी तरह के मोह माया का त्याग कर अपने आपको अपने इष्ट की आराधना में जीवन समर्पित करना होता है। शून्य की तरफ लगातार बढ़ते जाना सन्यासी की दिनचर्या में शामिल होता है।

श्री कृष्ण ने इसका एक सरल मार्ग बताया है। सब कुछ करो, पर उससे ‘राग’ मत रखो। स्वतंत्र होकर अपने और जगत के सत्य को जानने का प्रयत्न करो। गुरु का मार्ग निर्देशन और उपदेश सन्यास रुपी उपलब्धि का ईंधन होता है। पर यह सभी भाव प्रधान तर्क प्रधान होते है। विधि प्रधान नहीं।

इस संसार में कोई किसी के लिए प्रिय नहीं होता। सभी अपने ही लिए प्रिय होते है। यहाँ कुछ भी शाश्वत नहीं। न तो जीवन, न ही जीवन के सुख। हम नहीं जानते कि हम क्या है? कहाँ से आते है, कहाँ चले जाते है। इस सत्य को जानने के लिए प्रयत्नशील होना ही सन्यास धारण करना है। न तो कपिल को किसी ने दीक्षा दी थी, न ही शंकराचार्य को या आदिनाथ को। जो आचरण, नियम, व्रत के कठोर बन्धनों में बंधा है, वह सन्यासी कैसा? वह तो पाशबद्ध अज्ञानी है। स्मरण रखे। श्री कृष्ण से बड़ा सन्यासी कोई नहीं था और राजा जनक जैसे लोगों को भी महान सन्यासी कहा जाता है।

रास्ता बहुत कठिन
सन्यासी बनना आसान नहीं होता है। एक सन्यासी का जीवन बिताने के लिए बहुत से नियमों का पालन करना होता है। परिवार का त्याग, एक समय भोजन करना, ब्रह्राचर्य का पालन करना, जमीन पर सोना, मांगकर भोजन करना, भीड़ भाड़ से एक अलग रहना जैसे तमाम तरह के कठिन कार्यो को करना पड़ता है।
सबको नहीं मिल पाती दीक्षा
सन्यास की दीक्षा हर किसी को नहीं मिल पाती। दीक्षा लेने के लिए कठिन रास्तों से गुजरना पड़ता है। दीक्षा लेने से पहले इस बात की जांच पड़ताल की जाती है वह व्यक्ति सन्यासी बनने लायक या नहीं। इस परीक्षा को पास करने में 6 महीने से 12 साल तक का समय लग जाता है।

सबसे पहले पंच गुरू दीक्षा
सन्यासी बनने की सबसे पहले दीक्षा होती है पंच गुरू दीक्षा। इसमें सन्यास लेने वाले व्यक्ति को चोटी, रुद्राक्ष, लंगोटी और भभूत से स्नान करना होता है।

पिंडदान दीक्षा
सन्यासी बनने से पहले अपने जीवित परिजनों सहित खुद का पिण्डदान करना होता है। खुद का पिण्डदान करने पर वह व्यक्ति सन्यासी जीवन में प्रवेश करता है और सन्यासी कहलाता है।

तपन संस्कार
सन्यासी जीवन ग्रहण करने वाला व्यक्ति रात में शमशान घाट की धूनी से स्नान करना पड़ता है। फिर सुबह को आचार्य उस सन्यासी को वैदिक मंत्रो से उसे नया नाम देते हैं।

दिगंबर दीक्षा
एक सन्यासी को दिगम्बर दीक्षा से भी गुजरना पड़ता है। यह दीक्षा धर्म ध्वजा के नीचे दी जाती है। इस प्रक्रिया में सन्यासी को ध्वजा के नीचे 24 घन्टे तक हाथ में दण्ड और मिट्टी का पात्र लेकर खड़ा रहना पड़ता है। फिर एक दूसरा सन्यासी उस उसका लिंग भंग करता है। इस दीक्षा के बाद न तो वह सन्यासी पलंग में सो सकता है न ही सिले वस्त्र पहन सकता है। इसके बाद साधू की पूजा शिव समान होती है।

किसी सन्यासी के सन्यास ग्रहण के दौरान सारी प्रक्रियाएं गुप्त रखी जाती है। इस दीक्षा में किसी बाहरी सदस्यों का निमंत्रण नहीं दिया जाता अलग-अलग अखाड़ोंं के नियम अलग-अलग होते हैं।

-Legend News

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