शारीरिक सेहत के साथ-साथ मानसिक सेहत पर भी ध्‍यान देना जरूरी

अगर आप अपनी शारीरिक सेहत को लेकर सजग हैं लेकिन मानसिक सेहत पर बिलकुल ध्यान नहीं देते तो वक्त आ गया है कि आप अपनी मेंटल हेल्थ पर भी ध्यान देना शुरू कर दें। ऐसा हम इसलिए कह रह हैं क्योंकि लैन्सेट साइकायट्री नाम के जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी की मानें तो देश में हर 7 में से 1 भारतीय गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित है और यह आंकड़े साल 2017 के हैं।
देश की 20 करोड़ आबादी मानसिक बीमारी से पीड़ित
इस स्टडी में कहा गया है कि डिप्रेशन और एंग्जाइटी यानी बेचैनी सबसे कॉमन मानसिक बीमारियां और देशभर में इन 2 समस्याओं से पीड़ित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यह स्टडी ‘इंडिया स्टेट लेवल डिजीज बर्डन इनिशिएटिव’ ने किया है। भारत में साल 1990 से लेकर 2017 यानी 27 सालों तक के आंकड़ों के आधार पर यह स्टडी की गई है। यह रिपोर्ट सोमवार को जारी की गई। इस स्टडी में कहा गया है कि भारत के 19.7 यानी करीब 20 करोड़ लोग मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं और यह हमारी कुल आबादी का 14.3 प्रतिशत हिस्सा है। इनमें से 4.6 करोड़ लोग डिप्रेशन और 4.5 करोड़ लोग एंग्जाइटी से पीड़ित थे।
डिप्रेश और एंग्जाइटी की मुख्य वजह है स्ट्रेस
एम्स में साइकाइट्री के प्रोफेसर और इस स्टडी के मुख्य शोधकर्ता डॉ. राजेश सागर ने कहा, डिप्रेशन और एंग्जाइटी इन दोनों समस्याओं की मुख्य वजह स्ट्रेस ही है। वहीं बच्चों की बात करें तो उनमें डराने-धमकाने की वजह से ये दो मानसिक समस्याएं हो जाती हैं। इतना ही नहीं, सामाजिक ढांचे में हो रहे बदलाव की वजह से भी मानसिक बीमारियां बढ़ रही हैं। पहले संयुक्त परिवार होते थे और लोग अपने स्ट्रेस और परेशानी को परिवार वालों से शेयर करके मन हल्का कर लेते थे लेकिन अब एकल परिवार में ऐसा संभव नहीं।
अधेड़ लोग डिप्रेशन से ज्यादा पीड़ित
इसके अलावा स्टडी में यह भी कहा गया है कि अधेड़ लोग डिप्रेशन से ज्यादा पीड़ित हैं जो भारत में बुढ़ापे की तरफ बढ़ती आबादी को लेकर चिंता को दिखाता है। साथ ही इसमें कहा गया कि डिप्रेशन का संबंध भारत में खुदकुशी के कारण होने वाली मौतों से भी है। कुल बीमारियों के बोझ में मानसिक विकारों का योगदान 1990 से 2017 के बीच दोगुना हो गया जो इस बढ़ते बोझ को नियंत्रित करने की प्रभावी रणनीति को लागू करने की जरूरत की तरफ इशारा करता है।
सुधार और इलाज की गति है बेहद धीमी
डॉ सागर आगे कहते हैं, इस बोझ को कम करने के लिए मानसिक स्वास्थ्य को सामने लाने के लिए सभी साझेदारों के साथ हर स्तर पर काम करने का वक्त है। इस अध्ययन में सामने आया है कि बचपन के मानसिक विकारों के बोझ में सुधार की गति बहुत धीमी है। देश के कम विकसित राज्यों में आचरण संबंधी विकार हैं जिसकी ठीक से जांच-पड़ताल करने की जरूरत है।
-एजेंसियां

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