इसराइल ने कहा, मानवाधिकारों पर पाखंड की सबसे अच्छी मिसाल है पाकिस्तान

इसराइल ने पाकिस्तान को लेकर कड़ी टिप्पणी की है. ऐसे कम ही मौक़े आते हैं, जब इसराइल ने पाकिस्तान को लेकर खुलेआम इस तरह बोला हो. हालांकि पाकिस्तान इसराइल को लेकर हमेशा हमलावर रहा है.
गुरुवार को पाकिस्तान के एक आधिकारिक ट्विटर हैंडल फॉरन मिनिस्टर्स पब्लिक डिप्लोमैसी से एक ट्वीट किया गया था.
इस ट्वीट में लिखा गया था, ”आज संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में कब्जे में लिए गए फ़लस्तीनी इलाक़े और पूर्वी यरुशलम में मानवाधिकारों की भयावह स्थिति पर एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया है. इस बैठक को पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी संबोधित करेंगे और यूएनएचआरसी से क्या उम्मीद है, उसकी चर्चा करेंगे.”
पाकिस्तान के इसी ट्वीट के जवाब में इसराइली विदेश मंत्रालय के महाप्रबंधक अलोन उश्पिज़ ने पाकिस्तान पर तीखा तंज किया है. उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा है, ‘मानवाधिकार ‘चैंपियन’ पाकिस्तान हक़ीक़त में शीशे के घर में रह रहा है. मध्य-पूर्व में इसराइल एकमात्र लोकतंत्र है, उसे पाकिस्तान यूएनएचआरसी में ज्ञान दे रहा है. ये पाखंड की सबसे अच्छी मिसाल है.”
इस ट्वीट के साथ अलोन ने अमेरिकी विदेश मंत्रालय की पाकिस्तान में मानवाधिकारों पर तैयार की गई रिपोर्ट का लिंक भी लगाया है. इस रिपोर्ट में पाकिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है.
अलोने के इस ट्वीट को इसराइल के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से भी ट्वीट किया गया है. गुरुवार को यूएनएचआरसी में इसराइल के ख़िलाफ़ प्रस्ताव के पक्ष में जिन 24 देशों ने मतदान किया था, उनमें से पाकिस्तान भी एक था.
पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव के पास होने का स्वागत किया है. पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की तरफ़ से कहा गया है, ”पाकिस्तान ने यूएनएचआरसी में ऑर्गोनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी की तरफ़ से कब्जे वाले फ़लस्तीनी इलाक़े और और पूर्वी यरुशलम में मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए प्रस्ताव रखा था, जिसे स्वीकार कर लिया गया है. हम इसका स्वागत करते हैं.”
यूएनएचआरसी के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा, ”पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के साथ मानवाधिकारों का समर्थन करता रहेगा.”
”फ़लस्तीनियों के उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है. दो हफ़्तों तक फ़लस्तीनियों पर इसराइल जुल्म ढाता रहा. पीड़ित और आक्रामक देश की तुलना एक साथ नहीं की जा सकती. फ़लस्तीनियों का यह अधिकार है कि वे सम्मान के साथ जी सकें और वे अपने भविष्य का फ़ैसला ख़ुद कर सकें.”
गुरुवार को क़ुरैशी ने फ़लस्तीनियों के बहाने कश्मीर का भी मुद्दा उठाया. क़ुरैशी ने फ़लस्तीनियों की तुलना कश्मीरियों से की और कहा कि कश्मीर के मामलें में संयुक्त राष्ट्र को अहम भूमिका निभानी चाहिए.
संयुक्त राष्ट्र आम सभा के प्रमुख वोल्कान बोज़्किर अभी पाकिस्तान में हैं और इस्लामाबाद में क़ुरैशी ने वोल्कान से मुलाक़ात के बाद ही फ़लस्तीनियों के साथ कश्मीर का मुद्दा जोड़ा. वोल्कान बोज़्किर तुर्की के राजनयिक हैं और तुर्की कश्मीर के मामले में पाकिस्तान के साथ खुलकर रहता है.
गुरुवार को क़ुरैशी ने कहा, ”जम्मू-कश्मीर और फ़लस्तीनियों में समानता है. दोनों जगह के नागरिकों के मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है. हमारी मांग है कि दोनों जगह के नागरिकों को आत्मनिर्णय का अधिकार मिले. दोनों मामलों में संयुक्त राष्ट्र को बढ़-चढ़कर भूमिका अदा करनी चाहिए.”
संयुक्त राष्ट्र की 75वीं आम सभा के अध्यक्ष वोल्कान बोज़्किर ने कहा कि फ़लस्तीनियों के मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र की सुस्ती उसकी विश्वसनीयता को नुक़सान पहुँचाने वाली रही है.
पाकिस्तान के जिओ टीवी के अनुसार बोज़्किर ने इस्लामाबाद में नेशनल डीफेंस यूनिवर्सिटी में कहा, ”फ़लस्तीनियों के मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र की उपेक्षा के कारण इसकी विश्वसनीया प्रभावित हुई है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भी इस मामले में नाकाम रहा है. सुरक्षा परिषद इसराइल के ख़िलाफ़ एक प्रस्ताव तक नहीं पास कर पाया.”
उन्होंने कहा, ”सैकड़ों फ़लस्तीनियों की जान गई है. मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन किया गया है. यहाँ जल्द ही दो स्वतंत्र देश बनाने की ज़रूरत है. मध्य-पूर्व में फ़लस्तीनियों का मुद्दा सुलझाए बिना शांति और स्थिरता नहीं आ सकती.”
बोज़्किर ने इस दौरान कश्मीर का भी हवाला दिया और कहा कि उनकी भावना पाकिस्तान के साथ है. उन्होंने कहा कि वे भारत और पाकिस्तान से बातचीत के ज़रिए समस्या सुलझाने का आग्रह करते हैं.
पाकिस्तान और इसराइल
पाकिस्तान ने इसराइल को अब तक एक संप्रभु मुल्क के तौर पर मान्यता नहीं दी है. दोनों देशों में कोई औपचारिक संबंध भी नहीं है. पिछले 11 दिनों तक इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच चले संघर्ष में पाकिस्तान खुलकर फ़लस्तीनियों के साथ रहा. इसके लिए पाकिस्तान ने सभी इस्लामिक देशों को भी साथ आने की अपील की. तुर्की और पाकिस्तान दोनों इसराइल के ख़िलाफ़ बढ़-चढ़कर बोलने में आगे रहे.
हालांकि तुर्की ने इसराइल को मान्यता दे रखी है. तुर्की मुस्लिम बहुल देशों में इसराइल को मान्यता देने वाला पहला देश था. दोनों देशों के बीच औपचारिक संबंध भी हैं.
2010 में इसराइल ने एक पोत में सवार 10 टर्किश नागरिकों को मार दिया था. ये सभी फ़लस्तीनियों के लिए मदद लेकर ग़ज़ा जा रहे थे. इसके बाद से दोनों देशों के रिश्ते पटरी से उतर गए. टर्किश राष्ट्रपति अर्दोआन इसराइल पर हमलावर रहे हैं और उन्होंने रूसी राष्ट्रपति पुतिन से इसराइल को कड़ा सबक़ सिखाने के लिए भी कहा था.
पाकिस्तान में भी इसराइल से रिश्ते बहाल करने की बहस होती है लेकिन किसी भी सरकार ने इस पर कोई पहल नहीं की. हालांकि पिछले साल इस्लामिक देश यूएई, बहरीन, मोरक्को और सूडान ने इसराइल से रिश्ते सामान्य कर लिए थे. जब भी इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच टकराव होता है तो पाकिस्तान में फ़लस्तीनियों के समर्थन में बड़ी भीड़ सड़कों पर उतरती है.
इमरान ख़ान भी सऊदी अरब वाली बात ही दोहराते हैं कि जब तक 1967 की सीमा के तहत फ़लस्तीन एक स्वतंत्र मुल्क नहीं बन जाता है तब तक इसराइल से राजनयिक रिश्ते कायम नहीं होंगे. पाकिस्तान में सत्ता हो या विपक्ष या सिविल सोसाइटी सभी इसराइल के ख़िलाफ़ खड़े रहते हैं.
हालांकि पाकिस्तान चीन में वीगर मुसलमानों को लेकर चुप रहता है. चीन में वीगर मुसलमानों को पर जुल्म को लेकर कई रिपोर्ट सामने आ चुकी हैं लेकिन पाकिस्तान यहां ख़ामोश रहता है. हाल ही में शाह महमूद क़ुरैशी से वीगर मुसलमानों के लेकर सीनएनएन की पत्रकार ने सवाल पूछे थे.
वीगर मुसलमानों पर चुप्पी
सीएनएन की पत्रकार बिआना गोलोड्रीगा ने क़ुरैशी से पूछा था कि अगर आपके लिए हर मानव जीवन की अहमियत है तो आप चीन में वीगर मुसलमानों को लेकर क्यों चुप रहते हैं जबकि दुनिया के कई देश कह रहे हैं कि चीन जनसंहार कर रहा है?
पाकिस्तानी विदेश मंत्री इस सवाल का जवाब देने में लड़खड़ाते दिखे थे.
उन्होंने कहा था, ”देखिए… मेरी सरकार इन मुद्दों पर हमेशा बोलती है. आपको पता है कि चीन हमारा बहुत नज़दीक का दोस्त है. हम इस मामले में डिप्लोमैटिक चैनल का इस्तेमाल करते हैं. हम हर मामले पर सार्वजनिक रूप से बात नहीं कर सकते.”
बिआना ने क़ुरैशी के इस जवाब पर पूछा था कि अगर चीन आपको फंड देता है तो क्या आप वीगर मुसलमानों के मानवाधिकारों पर चुप रहेंगे, आप गज़ा में मानवाधिकारों की बात ख़ूब करते हैं लेकिन वीगर पर कुछ नहीं बोलेंगे?
इसके जवाब में क़ुरैशी ने कहा था, ”चाहे गज़ा हो या कश्मीर, हम मानवाधिकारों के उल्लंघन पर बोलेंगे.” हालाँकि क़ुरैशी ने तब भी चीन और वीगर मुसलमानों का नाम नहीं लिया था.
-एजेंसियां

50% LikesVS
50% Dislikes

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *