सिंधी समुदाय के इष्टदेव भगवान झूलेलाल की गाथा

Ishtadev of Sindhi community saga of God Jhulelal
सिंधी समुदाय के इष्टदेव भगवान झूलेलाल की गाथा

सिन्धी समुदाय के इष्टदेव वरूणावतार भगवान झूलेलाल जी की जयंती चैत्र मास की दूज को मनायी जाती है। इस बार 29 मार्च गुरूवार को सिन्धी समुदाय एक बार फिर उत्साह के साथ भगवान झूलेलाल का जन्मोत्सव मना रहा हैं। प्रस्तुत है इस संदर्भ में विशेष लेख.. ..

सिंधी समुदाय के इष्टदेव भगवान झूलेलाल की गाथा

ये भारत भूमि मानव के कल्याण हेतु परम्पराओं एवं स्वयं भगवान के अवतरित होने की गाथाओं से भरी पड़ी है। अनेक बार भक्तों को संकट से उबारने के लिए परमपिता परमात्मा ने स्वयं अवतरित होने की कृपा की है। हम स्मरण कर रहे हैं, भगवान -हजयूलेलाल साहब का।
उन दिनों सिंधु के ऐतिहासिक नगर “ठड्डा” में एक ऐसे शासक का शासन था जो बड़ा ही क्रूर, कट्टर तथा धर्मान्ध था। उसने अपने निकटम सहयोगियों के बहकावे में आकर अपनी हिंदु प्रजा पर अत्याचार आरम्भ कर दिये और साथ-साथ यह चेतावनी भी दी कि अगर हिंदु जन, जनेऊ और चोटी त्याग कर धर्म परिवर्तन नहीं करेंगे तो उनकी सम्पूर्ण सम्पत्ति जब्त करके उन्हें मौत के घाट उतार दिया जायेगा।

विशाल मछली पर दिये दर्शन

प्रदेश के हिंदुओ में आतंक फैल गया सभी अत्याचार सहने को विवश हुए किंतु अपने धर्म से विमुख नहीं हुये। अंत में विवश होकर
उन्होंने क्रूर शासक से एक सप्ताह का समय मांगा। सिंध की प्रजा जल –
देवता वरूण देवता की उपासक थी। वहां के सभी बच्चे व जवान सिंधु के तट पर पहुंचे तथा अन्न जल त्याग कर संकट हरने हेतु वरूण देवता का स्मरण करने लगे। भक्तों को संकट में देखकर वरूण भगवान का मन द्रवित हो उठा, तभी अचानक सिंधु नदी की लहरें आसमान को छूने लगीं और लहरों पर विशाल मछली पर विराजमान एक ब्रह्म स्वरूप दिव्य
पुरुष दृष्टिगोचर हुये और वे पलक -हजयपकते ही अंर्तध्यान हो गये। तत्पश्चात बादलों के गर्जन के साथ ही एक आकाशवाणी गूंज उठी, “मेरे प्रिय भक्त जनों! दुष्ट के पापों का घड़ा भर चुका है। अतः आज से सात
दिनों के पश्चात नसरपुर नगर के भक्त रतन राय, की धर्मपत्नि माता देवकी के गर्व से मैं जन्म लेकर तुम्हारे कष्ट निवारण करूगां।” इस प्रकार सन् 951, विक्रम संवत् 1007 के चैत्र शुक्ल द्वितीय को शुक्रवार के दिन श्री रतनराय के घर में एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम “उदयचंद” रखा गया। उन्हें “उडेरोलाल, -झूलेलाल, अमरलाल,लालसाई, दरियाशाह, वरूण देवता,जिंदा पीर एवं अन्य कई नामों से सम्बोधित किया गया। इसे दैवीय शक्ति का ही चमत्कार सम-हजये कि वह दिव्य बालक शीघ्र जवान हो गया तथा चमत्कारी शूरवीर तथा सर्वगुण सम्पन्न सिद्ध हुआ।

संहार नहीं, किया हद्य परिवर्तन
श्री -झूलेलाल रक्तपात नहीं चाहते थे उन्होंने दरबार में जाकर शासक को सम-हजयाया कि हर धर्म में ईश्वरीय शक्ति एक ही है। सब एक परमपिता की संतान हैं, किंतु अज्ञानी शासक नहीं माना। तब श्री झूलेलाल ने अपनी दैवीय शक्ति के द्वारा शासक का हदय परिवर्तन कर दिया। क्योंकि वह पापियों का संहार नहीं करना चाहते थे। बल्कि उनका हदय परिवर्तन कर उन्हें सम-हजयाना चाहते थे कि किसी की जाति सम्प्रदाय में कोई अंतर नहीं । सभी प्रभु की आंख के तारे हैं। विकृत, धर्मान्ध,घृणा, ऊंच-नीच एवं छुआछूत की दीवारें तोड़ दो तथा अपने हदय में मेलमिलाप,भाईचारे,सहिष्णुता सौहार्द, एकता व धर्मरिपेक्षता के दीप जलाओं। उसके बाद श्री -झूलेलाल ने नगर-नगर भ्रमण कर साम्प्रदायिक सद्भाव, एकता एवं अखण्डता का प्रचार किया। 1020 (964 ई0) के भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी पर वरूणावतार श्री-झूलेलाल अचानक जल समाधि लेकर अंतध्र्यान हो गये। उस पवित्र स्थान पर हिंदु प्रजा ने मंदिर बनवाया जहां अखण्ड ज्योति जलती रहती है। वहीं कुछ स्थानों पर उनका जिंदापीर एवं ख्वाजा खिज के नामों से स्मरण किया जाता है।
साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रवर्तक श्री-हजयूलेलाल अधर्म पर धर्म की जीत में
प्रतीक है। उन्होंने कट्टरपंथी तत्वों का मर्दन कर धर्म निरपेक्षता का नारा बुलंद किया। उनके उच्च आदर्शों का स्मरण करते हुए तथा स्वयं को राष्ट्रीय धारा के साथ जोड़ते हुए सिंधी समुदाय के लोग उनकी पावन जयंती बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। “आयोलाल” के गगनभेदी नारों से वातावरण गूंज उठता है।

प्रस्तुति -किशोर इसरानी ‘‘लेखक एवं विचारक‘‘
मीडिया प्रभारी-सिन्धी पंचायत, मथुरा
9045952577

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