क्‍या ब्लैकमेल करने या यौन उत्पीड़न का ज़रिया बन गया है Confession ?

Confession. अंग्रेज़ी के इस शब्द से सबसे पहले तब सामना हुआ जब स्कूल के आखिरी दिन एक ‘Confession सेशन’ बुलाया गया.
इस सेशन में सभी दोस्त खुलकर अपने दिल की बात एक दूसरे के सामने रख रहे थे. वे बता रहे थे कि उन्हें किससे प्यार था, किस पर क्रश था, कौन सा टीचर पसंद नहीं था, किसने सबसे बड़ी शरारत की थी’ और भी कई राज़दार बातें साझा हो रही थीं.
यानी Confession का मतलब था किसी पर पूरा भरोसा कर अपने दिल में छिपे राज़ खोल देना, उनका इज़हार करना, जिससे मन में कोई बोझ बाकी ना रह जाए.
इस Confession की एक बड़ी शर्त थी कि सेशन खत्म होने के बाद कोई इस बारे में बात नहीं करेगा, जो भी कन्फ़ेस किया जाएगा वह इस चार दीवारी के भीतर ही बंद होकर रह जाएगा.
लेकिन तब इस बात का इल्म नहीं था कि यही Confession किसी को ब्लैकमेल करने या इससे भी ज़्यादा खतरनाक किसी के यौन उत्पीड़न का ज़रिया बन सकता है.
ब्लैकमेलिंग और यौन उत्पीड़न
केरल में हाल ही में एक चर्च के चार पुजारियों पर एक विवाहित महिला ने सालों से कथित यौन उत्पीड़न और ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया है. इसने भारतीय चर्च में कन्फेशन (अपनी ग़लतियों को कबूल करने) की पवित्रता के दुरुपयोग पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं.
महिला ने आरोप लगाया कि 16 साल की उम्र से लेकर शादी हो जाने तक एक पादरी ने उनका यौन उत्पीड़न किया.
शादी के बाद जब उस महिला ने यह बात चर्च के एक दूसरे पादरी के सामने कन्फ़ेस की तो उस पादरी ने भी कथित तौर पर उस महिला का यौन उत्पीड़न किया.
पूरी तरह से निराश होकर यह महिला जब पादरी-काउंसलर के पास गई, तो वहां भी उस महिला के साथ कथित दुर्व्यवहार हुआ.
ऐसा ही एक और मामला पंजाब के जालंधर के पादरी से जुड़ा हुआ सामने आया, जालंधर के ये पादरी केरल के कोट्टायम ज़िले से थे, जहां की एक नन ने उन पर साल 2014 से 2016 तक कथिततौर पर यौन उत्पीड़न करने के आरोप लगाए.
इन दोनों मामलों ने चर्च में कन्फ़ेशन की पवित्रता पर सवालिया निशान खड़े कर दिए.
इसके बाद राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने इन दोनों मामलों का संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट भेजी है.
इस रिपोर्ट में राष्ट्रीय महिला आयोग ने सरकार से चर्च में होने वाली कन्फ़ेशन की प्रक्रिया पर रोक लगाने की सिफ़ारिश की है.
आयोग का कहना है कि कन्फ़ेशन के चलते महिलाओं की सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है.
सिफ़ारिशें-
केरल के चर्च में रेप और यौन उत्पीड़न के बढ़ते मामलों की एक केंद्रीय एजेंसी के ज़रिए जांच करवानी चाहिए.
कन्फ़ेशन की परंपरा पर रोक लगनी चाहिए क्योंकि इसकी वजह से महिलाओं को ब्लैकमेल किया जा सकता है.
केरल पुलिस और पंजाब पुलिस को एफ़आईआर पर तेज़ी से काम करना चाहिए अभियुक्तों पर आरोप तय करने चाहिए.
पीड़िताओं को राज्य सरकार की तरफ से पूरी मदद पहुंचाई जानी चाहिए.
क्या होता है कन्फ़ेशन?
यह जानना भी दिलचस्प है कि चर्च में कन्फ़ेशन की प्रक्रिया कैसे होती है और इसे क्यों किया जाता है.
दिल्ली के विकासपुरी इलाक़े में ‘अवर लेडी ऑफ़ ग्रेसेस’ चर्च में पादरी फ़ादर दीपक सोरेंग इस बारे में विस्तार से बताते हैं.
फ़ादर सोरेंग बताते हैं कि कन्फ़ेशन करने के लिए चर्च में अलग जगह बनाई जाती है, इस जगह पर कन्फ़ेशन करने वाला व्यक्ति और चर्च का पादरी जाता है. इन दोनों के बीच एक ‘डाइवर्जन’ होता है.
जब कोई भी आदमी कन्फ़ेशन कर रहा होता है तो उस जगह पादरी के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति मौजूद नहीं होता.
कन्फ़ेशन की महत्ता को बताते हुए फ़ादर सोरेंग कहते हैं, ”बाइबिल के दूसरे चैप्टर में कन्फ़ेशन का ज़िक्र मिलता है, इसमें परमेश्वर कहते हैं कि जब सामान्य लोग रोजमर्रा के काम के लिए बाहर निकलते हैं तो वे कई अच्छे-बुरे कामों में शामिल हो जाते हैं, जितने भी पाप वो अपने जीवन निर्वाह के लिए करते हैं उनका प्रायश्चित करना बेहद ज़रूरी होता है. इसलिए परमेश्वर कहते हैं कि अपने पापों को ईश्वर का प्रतिनिधि मानते हुए चर्च के पादरी के सामने बताया जाए.”
फ़ादर सोरेंग यह भी बताते हैं कि आमतौर पर छोटे बच्चे कन्फ़ेशन नहीं करते क्योंकि उन्हें अच्छे या बुरे कामों का ज्ञान नहीं होता. जब कोई बच्चा 9 या 10 साल का हो जाता है तब वह कन्फ़ेशन करने योग्य होता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस उम्र के बाद ही कोई अच्छे-बुरे कामों में फ़र्क समझ सकता है. समझदार होने की उम्र के बाद बच्चों को पाप और पुण्य का ज्ञान भी दिया जाता है.
इस बात की कितनी गारंटी होती है कि कन्फ़ेशन वाली बात कभी बाहर ज़ाहिर नहीं की जाएगी?
इस सवाल के जवाब में फ़ादर सोरेंग कहते हैं कि यह विश्वास का मामला है, अगर पादरी के सामने कोई अपने गुनाह क़बूल कर रहा है तो इसका मतलब है वह आदमी अपना दिल साफ़ कर रहा है, ऐसा करने में पादरी उसकी मदद करता है. इसलिए यह भरोसे की ही बात है कि पादरी उनके राज़ किसी के सामने जाहिर नहीं करेंगे.
लेकिन अगर कोई पादरी राज़ उजागर कर दे या उसका ग़लत फ़ायदा उठाए तो क्या हो?
इस पर फ़ादर सोरेंग की आवाज़ में चिंता महसूस की जा सकती है. वे थोड़ा रुककर बोलते हैं, ”आज तक तो मेरी नज़र में ऐसा कोई मामला नहीं आया, लेकिन अगर कोई पादरी ऐसा करता है तो सबसे पहले उन्हें पादरी के पद से हटा दिया जाएगा और फिर उनके ख़िलाफ़ उचित कदम भी उठाए जाएंगे. हालांकि बाइबिल में इस मामले में सज़ा का कोई प्रावधान नहीं है.”
महिला आयोग की सिफ़ारिश कितनी सही?
अगर महिला आयोग की सिफ़ारिश के अनुसार चर्च से कन्फ़ेशन की प्रक्रिया पर रोक लगा दी जाती है तो क्या इसका ईसाई धर्म पर असर पड़ेगा.
इस पर फ़ादर सोरेंग कहते हैं कि वैसे तो धर्म पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि कन्फ़ेशन के बिना भी लोग प्रार्थना करने आएंगे ही, बस अपने गुनाहों को किसी के सामने ज़ाहिर ना कर पाने की मुश्किल लोगों के लिए खड़ी हो जाएगी.
बीबीसी ने महिला आयोग की इसी सिफ़ारिश के संबंध में अखिल भारतीय क्रिश्चियन काउंसिल के महासचिव जॉन दयाल से भी संपर्क किया.
जॉन दयाल ने बीबीसी को एक लिखित जवाब में कहा, ”महिला आयोग की चेयरमैन बीजेपी की सदस्य हैं और वे बिना इस मामले को जाने एक नेता की तरह बोल रही हैं. पूरे भारत में लगभग दो करोड़ कैथोलिक और ऑर्थोडॉक्स ईसाई हैं जो कन्फ़ेशन की प्रक्रिया का पालन करते हैं. यौन उत्पीड़न से जुड़े मामले पेरिस के चर्च में भी आए, वहां क़ानून के मुताबिक उन आरोपी पादरियों को सज़ा सुनाई गई, इसलिए भारत में भी क़ानून को अपना काम करना चाहिए. हम चर्च में पारदर्शिता का समर्थन करते हैं”.
इस बीच, केंद्रीय मंत्री अल्फोंस कन्नथनम ने राष्ट्रीय महिला आयोग की इस सिफ़ारिश का तीखा विरोध किया है. फ़ेसबुक पोस्ट में अल्फोंस ने लिखा, “ये सरकार का आधिकारिक रुख नहीं है. राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने जो कदम उठाया है, सरकार का उससे कोई लेना-देना नहीं है. ये रेखा शर्मा की निजी राय है.”
-BBC

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